टट्टू निकला 56 इंच का शेर!

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 07-04-2018


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वीना

वो कह-कह के हल्कान हो गए कि ये जेलें तुम्हारे लिए हैं। ये अदालतें और उनका इंसाफ उनके लिए। ये मानते ही नहीं थे।

ये जो दलित-आदिवासियों के अत्याचारों से सवर्णों को सुरक्षा देने वाले दो इंसाफ पसंद न्यायाधिकारी हैं इनको कोटि-कोटि धन्यवाद। इनके अलावा जो बाकी हैं, उन चार विद्रोहियों को छोड़कर। उनको भी धन्यवाद!

अगर ये न होते तो क्या पता, आने वाले और 50 साल झोपड़ों से न निकलते वो लोग जो अपने बलबूते पर पहली बार 2 अप्रैल के बंद में उतरे। गटर में नरक की रोज़ी को क़िस्मत समझते रहते कुछ और साल।

कुछ और साल न समझ आता इन्हें कि ये सत्ता पर कब्ज़ा किये हुए उन टट्टुओं की लीद उठा रहे हैं जो असल में सवारी हैं सेठों-साहूकारों की। उनकी, जो उनके मुँह का निवाला, पैरों की ज़मीन हड़प रहे हैं। बैंको को लूट कर विदेशों में ऐश कर रहे हैं।  जो उनके पेट, हक़ अधिकार, सम्मान के क़ातिल हैं। लुटेरे हैं उनकी मेहनत के।

नहीं देख पाते कुछ और साल कि इन टट्टुओं के मुँह सिल दिये गए हैं। और इनकी गर्दन पर लटके हुए हैं मीडिया के भोंपू।

उफ़्फ़! कैसा लगता है जब पता चले कि 56 इंच का शेर टट्टू से ज़्यादा कुछ नहीं!

पर ये भोंपू टट्टू अभी देंगे आदेश कुछ और साल। उन्हें, जो जिस्म-जान बेच कर कट्टा-तमंचा, त्रिशूल खाने-पीने ओढ़ने-बिछाने को तैयार हैं। उन्हें लगेंगे अभी कुछ और साल समझने में जो 2 अप्रैल के बंद के ख़िलाफ़ 10 अप्रैल के बंद को उतावले हैं।

इसलिए हे अपनी आत्मा बचाने वाले चार न्याय परस्तों, तुम ख़ामोश रहो। बोलने दो उनको जिनकी आत्मा पर टट्टुओं का कब्ज़ा है। इन्ही की ज़बान में है वो शफा जो सड़कों पर उन जुलूसों के सैलाब उतारेगी जिनसे टट्टू और उन पर लदे उनके मालिक खौफ़ खाते हैं। घबराते हैं उस दृश्य की कल्पना मात्र से जिसमें कि -

पीछे-पीछे चला आता है आज़ादी की ज़िद करता हुआ जुनूनी सैलाब...और आगे-आगे लुंगीबाज़ टट्टू और उनके मालिक। जान बचाने की जल्दी ने बेचारों को निक्कर, धोती, पैंट, थ्री पीस पहनने का मौक़ा ही नहीं दिया। लुंगी के नीचे लँगोटी बांधना तक भूल गए..! पीछे-पीछे साम्राज्यवाद से आज़ादी... मनुवाद से आज़ादी... भुखमरी से आज़ादी... आगे-आगे टट्टुओं- मालिकों की पसीना मार भागम-भाग...गिर-पड़, धर-पकड़, भाग...भागम-भाग... और देखते ही देखते टट्टुओं-मालिकों की लुंगियाँ उलट जाती हैं...!

(वीना पत्रकार-व्यंग्यकार और फिल्मकार हैं।)










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????? ?????? :: - 04-08-2018
वीना जी का व्यंग्य सत्ता में बैठे लोगों उनके भक्तों व मीडिया पर गहरी चोट करता है तथा यह विश्वास दिलाता है कि आजादी के नारे लगाने वालों की जीत निश्चित है तथा भविष्य भी उन्हीं का है। अच्छे लेख के लिए वीना जी को बहुत-बहुत बधाई।