वक़्त है शूद्र ढोल की ताल पर जनेऊ-तराज़ू-तलवार के नाचने का!

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 28-07-2018


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वीना

पाकिस्तान में होने वाले चुनावों पर भारतीय मीडिया ने इस बार ही कुछ ज़्यादा ढोल-नगाड़े बजाए हैं या पहले भी यही हाल था? मुझे इसी बार ज़्यादा दिखाई-सुनाई दिया। आजकल कुछ भी देखकर उसे वैसा ही बयान करने से जैसा कि दिखाई दिया डर लगता है। अपनी अक़्ल चलाने पर आप जंगली-आदिवासी नक्सली, माओवादी, अर्बन नक्सल, आतंकवादी, वामी और जाने क्या-क्या हो सकते हैं। 

आप बस वो नहीं हो सकते जो आप ख़ुद होना चाहते हैं। आपकी आंखें चाहे जो देखें, दिमाग़ चाहे जो समझे पर आपको बोलना वही है जो मोदी-अंबानी-अडानी का राग बजाऊ मीडिया आपको बताए-सुनाए। 

वैसे ढोल बजाना एक कला है। और भारत में ये कला संगीतकारों और आधुनिक एलीट बैंड को अगर छोड़कर देखें तो कुछ ख़ास जात-जनों के नाम हुआ करती थी।

होली-दिवाली, लोहड़ी, शादी-ब्याह तो थे ही। इसके अलावा किसी ख़ास मौके़ पर किसी का मन हुआ और उसकी जेब चिल्लाती, बजाओ-बजाओ, तो भी ढोल-ताशे ढिंग-लक-लक की ताल ठोकने आ पहुंचते थे। ये ढोल मास्टर सनातन धर्म के उस आखि़री पायदान से आते हैं जहां उनका धर्म इंसान होकर इंसानी मैला ढोना-साफ करना बताया जाता है। शहरों में ये तबका सीवर-सेप्टिक टैंक सफाई के दौरान मैला खाने को भी मजबूर है। ज़हरीली गैसों से दम घुटने से जान गंवा देते हैं। और इस सब के लिए आज भी 200-250 रूपये प्रतिदिन सम्मानित मज़दूरी मानी जाती है। देश की राजधानी दिल्ली में भी। ग़रीबों के मसीहा बनकर उभरे केजरीवाल के राज में। 

दूर-दराज़ के गांवों में जहां मैले की टोकरियों से लथपथ होने भर से काम चल जाता है। जान नहीं जाती, वहां आज मेहनताना शायद दो पाई-आने से बढ़कर दो-ढाई रूपये हो गया हो।  

पवित्र बामणों के लिए अछूत करार दिए गए सफाई कामगारों का ‘‘सफाईकर्मी’’ का ओहदा उस समय ग्रहण करने योग्य हो गया जब बतौर सरकारी सफाईकर्मी कुछ सम्मानजनक तनख्वाह और अन्य सुविधाओं को पाने का वक़्त आया।

बामन-बनिया-ठाकुर नाम ही ऐसी बला का है जिनका कोई दीन-ईमान नहीं है। इन बलाओं ने अपने लिए यही ईमान-ए-विधान बनाया है कि इनका कोई ईमान नहीं। 

गंदगी साफ करने और जान देने का काम अब भी शूद्रों का ही है। सफाई शूद्र करता है और तनख्वाह व ओहदों पर सवर्ण कुंडली मारकर पसर जाता है। 

किसी बामण को सरकारी कागज़ों में ही सही ख़ुद को सफाईकर्मी दर्ज करवाना क्या मामूली बात है! शूद्र इस बराबरी के लिए जो भी दान करें थोड़ा है।

हालांकि बहुत से एहसान फ़रामोश शूद्र इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब सफाई-स्वच्छता रखने के कारण हम अछूत होने का सामाजिक अपमान झेलते रहे हैं तो अब अर्थ का फ़ायदा लेने वाले ब्राहमण, बनिया, क्षत्रिय कौन होते हैं। चौथे दर्जे की सरकारी नौकरियों पर केवल शूद्रों का हक़ होना चाहिये।

मुझे लगता है सफ़ाई से राबता रखने वाली या जबरन राबता रखवाए जाने वाली क़ौम को अपने ढोल-ताशे-नगाड़े बजाने के एकाधिकार के हनन के खि़लाफ़ भी आवाज़ उठानी चाहिये। 

साल में कुछ मौक़ों पर, बिना गंदगी से दो-चार आने हुए वाली कमाई भी इनसे झपट ली है। सूट-बूट चढ़ाए आलीशान स्टूडियो में बैठकर बेसुरा ढोल पीटने वाले बामण-बनियों और इनके चमचे-चपाटों ने। 

पहले ढोल की आवाज़ सुनकर सब आपसी दुश्मनी को ‘टाइम प्लीज़’ कहकर ढिंग-लक-लक की तान पर झूमने गली-चौराहे पर आ धमकते थे। कुछ पलों की ख़ुशी मुहैया करवाने के लिए बतौर बख्शीश एक-दो-पांच-दस के नोट कहरवा की ताल पर ठुमकते हुए ढोल वाले के हाथों में थिरकने लगते, उसकी जेब में बैठकर नाचने वालों को उकसाते। ग़म-दुश्मनी भूलकर... और जोश में...और जोश में...ढोल की ताल में ताल मिलाओ। 

आलीशान स्टूडियो में बैठे ढोल फोडू़ भी उकसाते हैं...ख़ूब उकसाते हैं...ऐसा कोहराम मचाते हैं कि अब जो दरवाज़े के बाहर ढोल वाला खड़ा है, उसकी मोहब्बत की ताल किसी को सुनाई ही नहीं देती। 

न्यूज़ स्टूडियो में हर रोज़ फटने वाले ढोल को इंसानी ख़ाल से मढ़ा जाना लाज़िमी है आज। लेकिन शूद्र ढोलों पर जानवरों की चमड़ी का इस्तेमाल सज़ा-ए-मौत का हक़दार है। क्योंकि पारंपरिक ढोल मास्टर किसी मॉब लिंचिंग पर ढोल नहीं बजाते। वो गौ हत्या की बख्शीश समेटने नहीं पहुंचते कहीं।

ये गंदी बस्तियों में रहने वाले जानते ही नहीं कि आलीशान न्यूज़ स्टूडियो की नींव में पानी की जगह खून, सीमेंट की जगह उनके जैसों की चमड़ी और ईट के बदले इंसानी हडिड्यों को चिना जाता है। 

वहां ढोल बजाने वालों को दादरा, कहरवा, तीन ताल में मास्टरी नहीं बल्कि हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान-चीन, कश्मीर, हज, लव जिहाद, कब्रिस्तान, तीन तलाक पर ताल ठोकने की लियाक़त की दरकार है। अपनी रोज़ी-रोटी के लिए ज़मीन का टुकड़ा बचाने की जद्दोजहद करने वाले किसान-आदिवासियों को नक्सली-माओवादी साबित करने का हुनर चाहिये।

पाकिस्तान का होने वाला प्रधानमंत्री इमरान ख़ान जब कहता है कि मैं भारत के साथ दुश्मनी नहीं दोस्ती का ढोल बजाना चाहता हूं तो मोदी-अंबानी मीडिया ढोल मास्टरों का ढोल चीखता है - इमरान की दोस्ती के आगाज़ को ख़ालिस दोस्ती समझकर, भारत के मुसलमानों को सुकून बख्शने की ग़लती मत कर बैठना, हिंदूराष्ट्र भक्तों। 

हमारे प्रधानमंत्री जब कहते हैं कश्मीर की समस्या गोली से नहीं गले लगने से सुलझेगी तो उनका मतलब होता है कि गोली, मासूम कश्मीरी बच्चों के सीनों को चीरती हुई, उन्हें मौत से गले मिलाएगी।  

सबका साथ सबका विकास का राग अलाप कर सिंहासन पर पसरने वाला हमारा 56 इंच प्रधानमंत्री सबसे पहले गौ-सुरक्षा का तीर चलाकर दलित-मुसलमानों के रोज़गार और जान-माल को लील गया। जब साहेब ने कहा था कि पाकिस्तान को सबक सिखाऊंगा, चीन को लाल आंख दिखाऊंगा। देश की सीमाओं को सुरक्षित बनाऊंगा तो मंशा थी चुन-चुन कर देश के भीतर अपनों की अपनों से लिंचिंग करवाना। 

तो साहेब जो प्रत्यक्ष कहते हैं अप्रत्यक्ष में उसका उल्टा होता है,  हिंदूराष्ट्र प्रेमियों। पाकिस्तान का प्रत्यक्ष में दोस्ती का वायदा और अप्रत्यक्ष में भी दोस्ती निभाने की नीयत का इरादा हमारे हिंदूराष्ट्र की लक्ष्य प्राप्ति के लिए ख़तरा है। ऐसे सिर्फ धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनते हैं हिंदूराष्ट्र नहीं।  

सूट-बूट पहनकर स्टूडियो में ढोल बजाने की क़ाबिलियत शूद्र-पारंपरिक ढोल मास्टरों में नहीं है। जो ऐसा कहकर तुम्हे गंदे नालों में पटकते हैं,  दुश्मनी के लिए जो तुम्हारा रोज़गार छीनते हैं उन्हें, हे! महोब्बत के लिए ढोल बजाने वालों, चुनौती दो। अब हो ही जाए, तुम्हारी दादरा, कहरवा की ताल पर जनेऊ-तराज़ू-तलवार का नाच।

(वीना फिल्मकार, पत्रकार और व्यंग्यकार हैं।)








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