सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस

हमारा समाज , नई दिल्ली , शनिवार , 30-09-2017


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उपेंद्र चौधरी

इतिहास का एक दौर पूरी दुनिया में अंधकार युग की तरह जाना जाता है।अंधकार युग,यानी ऐसी अवधि,जिसमें सत्ता,तर्क या संवेदना से नहीं,बल्कि आवेग से चलती थी। सत्ता में बने रहना ही शासकों का सबसे बड़ा उद्देश्य था।इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सत्तासीन या सत्ता पिपासु हर तरह के जायज़-नाजायज़ हथकंडे अपनाते थे।सही मक़सद के लिए लड़ रहा व्यक्ति अगर शासन के आड़े आता,तो उसके क़त्ल से भी सत्ता पिपासुओं को कोई गुरेज नहीं था। ऐसी हत्याओं से दुनिया का इतिहास भरा पड़ा है।

आख़िर उस तरह की हत्याओं और अनाचारों पर सवाल क्यों नहीं उठ पाता था।उसकी वजह भी ‘सत्य की वह निर्मिति’ ही थी,जिसमें असल सच से न सिर्फ़ टकरा जाने की बर्बरता थी,बल्कि असल सच को नक़ली सच साबित करने में कोई कोर कसर भी नहीं छोड़ी जाती थी। ‘ईश्वर के प्रतिनिधि’ या ‘गॉड ग्रेस’ या ‘जिल्ल-ए-इलाही’ ऐसी ही उपाधियां थीं,जिसे तानकर कोई भी शासक स्वयं को ‘निर्मित नैतिकता’ में हर अनाचार को कर गुज़रने की परमिट हासिल कर लेता था। इस ‘निर्मित सच’ के सुरक्षा कवच की व्याख्या वह पंडितों,मौलवियों या पादरियों से  करवा लेता था,जिन पंडितों,मौलवियों और पादरियों के बारे में आम आवाम का मानना होता था कि वह ईश्वर को जानता है,सत्य को पहचानता है।ईश्वर को जानने और पहचानने वाला ही जब किसी शासक के साथ खड़ा था,तो शासकों को भला चुनौती कौन दे सकता था ? जो कोई चुनौती दे पाता,उसे अनीश्वरवादी क़रार देकर जीने के हक़ से वंचित कर देना बहुत आसान था।यही कारण है कि अपने हिसाब के पंडित,मौलवियों और पादरियों-पुजारियों को राज्य संरक्षण हासिल होता था।ऐसा होना दोनों के हक़ में था।लिहाज़ा राजनीतिक शासक और धार्मिक शासक दोनों सहअस्तित्व के आपसी गठबंधन से बंधे होते थे। इस गठबंधन के ज़ोर से आवाम पर बड़े-बड़े टैक्स भी लगाये जाते थे। मर्ज़ी के हिसाब से उन करों को उगाहा भी जाता था।जिस क्षेत्र के आवाम में होश-ओ-हवास थे,वहां राजनीतिक फ़ैसले के तहत अनेक प्रतिबंध लगा दिये जाते थे ताकि उनके होश को ठिकाने लगाये जा सके। ठीक उसी कसौटी पर सत्ता और शासन की सुविधा के मुताबिक़ बड़ी-बड़ी छूट भी दी जा सकती थी।

मध्ययुग का दौर अंधकार युग शायद इसीलिए कहलाता है,क्योंकि हर बात की व्याख्या शासक की नज़रों से की जाती थी और की गयी उस व्याख्या को आवाम की नज़रों में फिट कर दी जाती थी।इसके लिए हर तरह के पैंतरे अपनाये जाते थे। इन पैंतरों में नहीं आने वालों के सामने अनेक तरह के भय का माहौल तैयार किया जाता था। अपनी नज़रों से सच देखने वालों को कभी-कभी भीड़ जुटाकर,भीड़ के सामने ही हाथियों के पैरों तले कुचलवा दिया जाता था,सरेआम फ़ांसी पर चढ़ा दिया जाता था। ये सब इसलिए कि जनता के बीच एक क्रूर मिसाल पेश की जा सके और जनता अपने ‘ईश्वर के उस प्रतिनिधि’ की कही गयी हर बातों को सर झुकाकर मान लेने की परंपरा से इन्कार करने की हिमाक़त नहीं कर सके।

मध्ययुग के अंधेरे में भी कहीं-कहीं तर्क और संवेदना के लौ टिमटिमते थे।आविष्कार भी हो रहे थे,सुधार भी चल रहे थे।चूंकि यह मंज़र अपवाद था।यही कारण है कि दुनिया भर के मध्ययुग को अंधकार युग कहा गया।किसी युग विशेष में अंधकार तभी फ़ैलता है,जब विचारों में ठहराव आ जाता है।आधुनिक युग इसी मायने में भिन्न माना गया कि यहां हर पल एक नया विचार आ जा रहा है,हर पल एक नयी सोच हमारे पहले की सोच को हिला कर आगे बढ़ जाती है।इसके बने रहने की पहली शर्त ही है कि विचार-विमर्श की प्रक्रिया निरंतर रहे।विरोध का स्वर ही आधुनिक सोच का वह इंजन है,जो हमारे बदलाव की गाड़ी को आगे बढ़ा रहा है।यह इंजन जिस दिन काम करना बंद कर देगा,पूरी गाड़ी में ठहराव आना तय है।ऐसी कोशिशें फिर से दिखने लगी हैं।

अंधकार युग

आश्चर्य की बात है कि उस अंधकार युग से निकलने के लिए एक मध्ययुगीन कवि ने शानदार रास्ता दिखाया था। वह रास्ता उस युग के लिए तो प्रसंगिक था ही,आज के दौर में भी यह उतना ही सही दिखता है। रामचरितमानस के रचनाकार ने व्यक्ति,परिवार,समाज से लेकर हर तरह की सत्ता तक को एक नायाब सुझाव दिया था। सुझाव इसलिए कि पीड़ित और पीड़क के भेद कम से कम हो सके,शासन का इस्तेमाल शमन या दमन के लिए नहीं हो सके। परिवार से लेकर संसार तक को सुझाव देने वाले उस कवि का अपनी रचना की शुरुआत में ही दावा है कि वो जो कुछ कह रहे हैं,वह सबकुछ उनके अनेक पुराणों,ग्रन्थों और तर्कशास्त्रों के सुविचारित अध्ययन पर आधिरत है।सुविचारित इसलिए कि काल और सत्ता की कसौटी पर कसा गया एक ऐसा विचार,जो कालातीत भी है और सत्तातीत भी है।यानी हर काल और हर सत्ता के लिए ज़रूरी है। मौजूदा काल और सांस्कृतिक मिजाज़ होने का दावा करने वाली सत्ता के लिए इस विचार करना विशेष रूप से ज़रूरी है।क्योंकि तुलसी उसी परंपरा से आते हैं,जिस परंपरा से आने का दावा यह शासन करता है।तुलसी ने उन्हें सुझाव दिया है:  

सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस |

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ||

तुलसीदास के इस दोहे का अर्थ हैमंत्रीवैद्य और गुरु ;ये तीनों यदि भय या लाभ की आशा से हित की बात न कहकर प्रिय बोलने के लिए विवश हों,तो क्रमशः राज्यधर्म एवं शरीरइन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है |

बताया जाता है कि तुलसीदास ने लगभग 126 साल का जीवन जिया था।अपनी अद्भुत् कृति,रामचरितमानस की रचना उन्होंने नव्वे साल की उम्र में की थी। तुलसी की बतायी जा रही उम्र और उस उम्र में की गयी अद्भुत रचना यह बताने के लिए पर्याप्त है कि बढ़ी हुई उम्र किसी के चुक जाने का आधार नहीं होती। ऐसे पके पकाये लोगों से सलाह लेने में भी कोई बुराई नहीं है। मगर सलाह लेने का आग्रह अक्सर ही अहंकार का शिकार हो जाता है। मानस के कवि ने अहंकार के परिणाम को लेकर सचेत करते हुए कहा है :

तुलसी जे कीरति चहहिंपर की कीरति खोइ।

तिनके मुंह मसि लागहैंमिटिहि न मरिहै धोइ।।

यानी जो लोग दूसरों की प्रतिष्ठा को ख़त्म करके खुद की प्रतिष्ठा चाहते हैं,ऐसे लोगों की प्रतिष्ठा नहीं रह पाती है। ऐसे व्यक्ति के मुंह पर ऐसी कालिख पुत जाती है कि वो कितना भी कोशिश करे,वह कालिख कभी नहीं मिट पाती है।यानी उनका अपमान उनके व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा बन जाता है। आज भी इतिहास के अनेक शासक इससिए याद आते हैं,क्योंकि उसके अहंकार और मूर्खता ने उन्हें मोहम्मद शाह यानी रंगीला’ या मोहम्मद-बिन-तुगलक यानी ‘सनकी बादशाह’ बना दिया था। 

 

 

 










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