पुण्य तिथि पर विशेष : सामाजिक न्याय के पहरुआ केदारनाथ सिंह

स्मृतिशेष , , बुधवार , 13-12-2017


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सत्येन्द्र पीएस

“बाबू जी” 

(7 सितंबर 1938-13 दिसंबर 2012)

पूर्वी उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले सबसे बड़े योद्धा के रूप में केदारनाथ सिंह का नाम प्रमुख है। हाशिए पर खड़ा समाज हमेशा उनकी चिंता का विषय रहा। उनके समर्थक आज भी सम्मान से उन्हें “बाबू जी” कहते हैं। 

एक जनसभा के दौरान एंकरिंग करते हरवंश सिंह भल्ला (बाएं), केदारनाथ सिंह (बाएं से दूसरे खड़े हुए), विश्वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह यादव और मुफ्ती मोहम्मद सईद (बैठे हुए क्रमशः बाएं से दाएंं)। फोटो साभार

बात 18 दिसम्बर 1990 की है। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू किए जाने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी) की सरकार गिर गई थी। गोरखपुर के तमकुही कोठी मैदान में मांडा के राजा और 1989 के चुनाव के पहले देश के तकदीर कहे जाने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह की सभा होने वाली थी। ‘सामाजिक न्याय के मसीहा’ का पहला और मेगा शो गोरखपुर में हुआ। 

पिपराइच के विधायक केदारनाथ सिंह को सभा का संयोजक बनाया गया, महराजगंज के सांसद हर्षवर्धन सिंह कार्यक्रम करा रहे थे। कुल मिलाकर कार्यक्रम में तत्कालीन विधायक केदारनाथ सिंह, हर्षवर्धन और मार्कंडेय चंद की अहम भूमिका थी।

प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, जो जनता दल (स) में चले गए थे। इसका गठन चंद्रशेखर ने जनता दल को तोड़कर किया था। चंद्रशेखर करीब 40 सांसदों के साथ कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री थे। 

गोरखपुर में सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गई। इसी बीच 17 दिसंबर को एक अज्ञात सा संगठन ‘सवर्ण लिबरेशन फ्रंट’ उभरा। उसने चेतावनी दी कि किसी भी हालत में वीपी की सभा नहीं होने दी जाएगी। अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) का आरक्षण लागू होने का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पिछले दरवाजे से विरोध कर रही थी। आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन खुलेआम आरक्षण के विरोध में मैदान में कूद पड़े थे। 

सभा के एक दिन पहले केदारनाथ सिंह के आवास परिसर में बम विस्फोट भी हुआ। इस मामले में न तो किसी का नाम सामने आया, न गिरफ्तारी हुई। हालांकि पुलिस व्यवस्था और सख्त कर दी गई। केदारनाथ सिंह ने मीडिया में बयान जारी कर ऐलान किया कि सभा हर हाल में और हर कीमत पर होगी। इस तरह की कायराना हरकत करने से अब पिछड़ा वर्ग दबने वाला नहीं है। 

कुल मिलाकर आरक्षण विरोधियों व आरक्षण समर्थकों के बीच सीधी जंग शुरू हो चुकी थी। निशाने पर थे सैंथवार समाज से आने वाले पिछड़े वर्ग के एकमात्र ताकतवर नेता केदारनाथ सिंह।

वीपी सिंह ने उस रैली में कहा, “भूख एक ऐसी आग है कि जब वह पेट तक सीमित रहती है तो अन्न और जल से शांत हो जाती है और जब वह दिमाग तक पहुंचती है तो क्रांति को जन्म देती है। इस पर गौर करना होगा। गरीबों के मन की बात दब नहीं सकती और अंततः उसके दृढ़ संकल्प की जीत होगी।” 

सिंह ने कहा, “गरीबों की कोई बिरादरी नहीं होती। दंगों में मारे जाने वाले लोग हिंदू और मुसलमान नहीं, हिंदुस्तान के गरीब लोग हैं। गरीबों के साथ हमेशा अत्याचार होते रहे हैं। इस शोषण अत्याचार को बंद करके समाज के पिछड़े तबके के लोगों को ऊपर उठाना होगा।”

इस सभा के दौरान चौधरी अजित सिंह का सर फट गया, शरद यादव को भी चोटें आईं। लालू प्रसाद और पूर्व गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के भाषण के दौरान सभा स्थल पर बम फेंके गए, जिसमें दर्जनों लोग घायल हो गए। शरद यादव ने जनसभा में ही कहा कि आज की घटनाओं के पीछे भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा विश्व हिंदू परिषद का हाथ है।

यह पिछड़े वर्ग की सामाजिक जागरूकता न होने का परिणाम था कि आरएसएस व उसके अनुषांगिक संगठनों ने ओबीसी तबके से जुड़े तबकों को ही आरक्षण के विरोध में खड़ा कर दिया था। एक तरह से देखा जाए तो आज जहां मराठा, कापू, पाटीदार, जाट, गूर्जर बड़े पैमाने पर आंदोलन चला रहे हैं और हजारों की संख्या में लोगों की पिटाई हो रही है, सैकड़ों की जान चली गई, गुप्ता और मौर्य बगैर आंदोलन के आरक्षण पा गए। आज भी पिछड़े वर्ग के ज्यादातर लोग आरक्षण के पीछे अपनी जिंदगी दांव पर लगाने वालों की न तो कद्र करते हैं और न ही उन्हें सम्मान देते हैं। इन लोगों की पीढ़ियां आरक्षण की मलाई खा रही हैं और पिछड़े वर्ग की जिंदगी संवारने वाले मसीहाओं को विस्मृत कर चुकी है। 

 

गोरखपुर में हुई वीपी की इस जनसभा के बाद केदारनाथ सिंह निशाने पर आ गए। स्वाभाविक है कि आरक्षण विरोधियों के निशाने पर वह थे ही, आरक्षण समर्थकों ने भी उनकी भरपूर उपेक्षा की। ओबीसी तबके की ओर से ओबीसी आरक्षण का विरोध लगातार जारी था। ओबीसी तबके की ज्यादातर जातियों का यह मानना था कि आरक्षण होने से उनका जातीय डिमोशन हो गया है और वह अनुसूचित जाति/जनजाति बना दिए गए हैं। 

 

जनता दल के नेता शरद यादव ने 25.08.1992 से 6.11.92 तक मंडल रथ यात्रा निकाली। इसका मकसद न सिर्फ यह बताना था कि सरकार ओबीसी रिजर्वेशन को लेकर साजिश न करे, साथ ही पिछड़ा वर्ग भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो। 

शरद ने जनता को यह बताने की कोशिश की कि किस तरह से पिछड़े वर्ग के खिलाफ साजिश कर उन्हें सरकारी नौकरियों में नहीं जाने दिया। आरक्षण की नींव को समझाया। स्वतंत्रता के 40 साल बाद भी उच्च सेवाओं में देश में पिछड़े वर्ग की 60 प्रतिशत आबादी की नौकरियों में 5 प्रतिशत से भी कम हिस्सेदारी और नीति निर्धारक सरकारी पदों पर प्रतिनिधित्व न होने का मसला उठाया।

राजनेता केदारनाथ सिंह। फोटो साभार फेसबुक

केदारनाथ सिंह ने भी पूर्वांचल में पिछड़ों की आबादी को जागरूक करने का बीड़ा उठा लिया। सबसे तीखा विरोध उन्हें खुद अपनी जाति के लोगों से उठाना पड़ा। गरीबी और बहुत कठिन जीवन जी रहे लोगों को संपन्न तबका बरगला रहा था कि आरक्षण पाने से वह जातीय पद सोपान में अनुसूचित जाति/ जनजाति के समकक्ष खड़े हो जाएंगे। 

 

सिंह ने पिछड़े वर्ग, खासकर अपनी  जाति के  लोगों को यह समझाने में शेष जिंदगी खर्च कर दी कि आरक्षण पाने से कोई जाति नीची नहीं होती। समाज में कुर्मी समुदाय की भी बहुत प्रतिष्ठा है, साजिशन उन्हें सरकार के उच्च पदों पर प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। 

 

इसके साइड इफेक्ट भी हुए। जनता पार्टी में वित्त मंत्री मधुकर दिघे से भारी मतों से कांग्रेस (जे) से चुनाव जीतकर 1980 में विधानसभा से औपचारिक राजनीति की शुरुआत करने के बाद केदारनाथ सिंह का राजनीति में ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा था। उन्होंने उसके बाद लगातार राजनीति में नए आयाम स्थापित किए। लेकिन महराजगंज से लोकसभा चुनाव में वह हार गए। हालांकि उस दौर में कांग्रेस की आंधी में जहां लोग कांग्रेस के सामान्य प्रत्याशियों से एक लाख से ऊपर के मतों के अंतर से हार रहे थे, केदारनाथ सिंह महराजगंज से महज डेढ़ हजार वोट से चुनाव हारे थे। 

वीपी ने जब कांग्रेस से निकलकर अलग दल बनाया तो पूर्वांचल में उन्होंने केदारनाथ सिंह को अपने पाले में लाने की हर संभव कवायद की। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 1980 में जगजीवन राम की कांग्रेस (जे) के 18 विधायक जीतकर आए थे, और सदन में उन विधायकों के नेता थे केदारनाथ सिंह। आखिरकार वीपी की भारी भरकम कवायद के बीच कांग्रेस जे का जनता दल में विलय हो गया। विलय के मौके पर आयोजित जनसभा में वीपी के अलावा मुफ्ती मोहम्मद सईद, संजय सिंह, मुलायम सिंह यादव सहित जनता दल के तमाम दिग्गज नेता तमकुही कोठी मैदान में जमा थे। केदारनाथ सिंह 1989 में पिपराइच विधानसभा से फिर से चुनकर विधायक बन गए। वीपी के खास रहे केदारनाथ सिंह उस समय मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुए। उन्हें संगठन का काम सौंपा गया। यहां तक कि विधायी कार्रवाई में भी केदारनाथ सिंह अहम माने जाते थे। 

1989 में वर्तमान समाजवादी नेता आजम खां ने विधानसभा में राज्यपाल का अभिभाषण फाड़ डाला तो उनके खिलाफ कार्रवाई की तलवार लटकने लगी। उसमें भी केदारनाथ सिंह ने पूरे मामले की बाकायदा ड्राफ्टिंग की और विधायी नियमों व विधायकों के अधिकार को स्पष्ट कराने में अहम भूमिका निभाई। आखिरकार आजम खां के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने पाई। 

हालांकि 1990 के आरक्षण आंदोलन के बाद केदारनाथ सिंह को कभी पूर्वांचल में उभरने नहीं दिया गया। उन्हें उन पिछड़ों ने ही लगातार उपेक्षित किया, जिनके हक के लिए उन्होंने लाठियों, गोलियों व बम का मुकाबला किया। 

केदारनाथ सिंह पिपराइच से भी लड़े, जहां अमूमन 80 प्रतिशत दलित और पिछड़े वर्ग के लोग हैं। उसके बाद वह गोरखपुर से सांसद का चुनाव भी लड़े। लेकिन पिछड़े तबके ने कभी उनका साथ नहीं दिया और लगातार चुनाव हारते रहे। यह अलग बात है कि समाजवादी पार्टी के पुरोधा मुलायम सिंह यादव ने उन्हें अपने साथ बनाए रखा और भरपूर सम्मान भी दिया। किन्ही वजहों से केदारनाथ सिंह सपा से नाराज हो गए। उस समय उन्हें तत्कालीन बसपा पुरोधा कांशीराम ने अपने पास बुलाया और बसपा से उन्हें न सिर्फ टिकट दिया, बल्कि पार्टी कैडर को पूरी तरह से सक्रिय होकर साथ देने का निर्देश भी दिया। लेकिन उसके बाद वह न कभी सांसद का चुनाव जीते, न विधायक का। 

शुरुआती जीवन

केदारनाथ सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के राजपुर गांव के एक संपन्न परिवार में हुआ। उनके पिता श्रवण कुमार सिंह इलाके के जमींदार थे। उनकी माता रामरती सिंह भी एक संपन्न जमींदार परिवार की थीं। अत्यंत सुविधासंपन्न परिवार में 7 सितंबर 1938 को जन्मे केदारनाथ सिंह की शिक्षा दीक्षा में कोई कमी नहीं रही और उन्हें बेहतरीन कॉलेजों में पढ़ने का मौका मिला। लेकिन पिपराइच के दलित पिछड़े इलाके की गरीबी ने उनके दिलो दिमाग पर गहरा असर डाला। शुरुआत में जहां उनके पिता ने परोक्ष रूप से स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की, स्वतंत्रता के बाद पिपराइच क्षेत्र से कांग्रेस के नेता अक्षयबर सिंह को लगातार 3 बार चुनाव जिताने में अहम भूमिका निभाई, वहीं केदारनाथ सिंह ने कांग्रेस से अलग वंचित तबके की आवाज बनना उचित समझा। शारदा सिंह से विवाह के बाद वह पारिवारिक जीवन में उतरे। उनके 4 पुत्र हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं।

2012 में निधन

केदारनाथ सिंह अंतिम समय तक वंचित तबके की लड़ाई लड़ते रहे। देश में सांप्रदायिक हिंसा की प्रयोगशाला रहे गोरखपुर में उन्होंने लगातार समरसता के लिए आवाज बुलंद की। 13 दिसंबर 2012 को उनका निधन हो गया। 

पिछड़ा वर्ग भले ही जातियों के खांचे में हिचकोले खा रहा है, लेकिन पिछड़े वर्ग का बुद्धिजीवी तबका अभी भी केदारनाथ सिंह के उस सपने पर काम करने में लगा हुआ है कि लोग जातियों का खांचा छोड़कर वर्गीय हित की ओर बढ़ें और समतामूलक समाज स्थापित कर राष्ट्रनिर्माण में अहम भूमिका निभाएं। 

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)










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