नाम से देहदान तक : अमर नदीम...कभी न मरने वाला दोस्त

श्रद्धांजलि , , शुक्रवार , 11-08-2017


death-tribute

मुकुल सरल

डॉ. अमर नदीम, ओवेस अहमद दौराँ और मनोज पटेल हमने एक दिन में इन तीन क़लमकारों-साहित्यकारों को खो दिया।

अमर नदीम यानी कभी न मरने वाला दोस्त...वाकई अपना नाम सार्थक कर गए। नदीम देहदान कर गए हैं। उनका शव आज अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज को सौंप दिया गया। पिछले दिनों गुजरे कवि अजित कुमार ने भी देहदान कर यही मिसाल कायम की थी।

62 वर्षीय प्रगतिशील कवि-शायर अमर नदीम उर्फ अमर ज्योति अलीगढ़ में ज्ञान सरोवर में अपनी पत्नी बैंक प्रबंधक अर्चना उर्फ मीता के साथ रहते थे। अभी पहली अगस्त को उनका जन्मदिन था और उनके चाहने वाले उन्हें बधाई दे रहे थे। नदीम सोशल मीडिया ख़ासकर फेसबुक पर भी काफी सक्रिय थे। मनोज सिंह ने उन्हें याद करते हुए उनकी एक ग़ज़ल अपनी वॉल पर लगाई-

साँस ही संत्रास है तो राम जाने

हर हँसी उपहास है तो राम जाने.

 

मरुस्थल में जल दिखे, अच्छा शगुन है

और यदि आभास है, तो राम जाने.

 

अब कोई अवतार रावण का न होगा;

राम को विश्वास है तो राम जाने.

 

इस समंदर में हलाहल है, अमृत है;

जल की तुझको प्यास है तो राम जाने.

 

कोई वैदेही भला क्यों साथ भटके!

राम का वनवास है, तो राम जाने.

अपने काव्य संग्रह 'आँखों में कल का सपना है' के विमोचन के मौके पर कवि-गीतकार गोपालदास नीरज (मध्य में) के साथ अमर नदीम (दाएं)। साभार 

लेखक-पत्रकार धीरेश सैनी लिखते हैं कि अमर नदीम साहब के निधन की खबर दोस्त अमोल सरोज ने फोन पर दी। अमोल बहुत दुखी थे। उन्होंने एक साधारण सी लग सकने वाली क़ीमती बात कही कि नदीम साहब फेसबुक पर एक बेहतरीन इंसान की तरह रहे। उनकी शायरी, कविताओं और उनके लिखे में समाज की चिंताएं शामिल रहती थीं। फेसबुक पर हममें से बहुत कम लोग इंसान की तरह रह पाते हैं।

प्रतिभाओं के चिल्लपों के दौर में अमर नदीम लिखने, पढ़ने, रचने की अपनी सक्रियता के रूप में उदाहरण हैं। यह हैरानी से ज्यादा सीखने की बात है कि एक्सीडेंट ने उन्हें बिस्तर पर पटक दिया तो भी उन्होंने काम नहीं रुकने दिया।

कवि-लेखक कात्यायनी ने लिखा है -

``चलने-फिरने तक की असर्मथता के बावजूद साथी अमर नदीम के अध्‍ययन और सृजन का अनवरत सिलसिला कभी रुका नहीं। बिस्‍तर पर लेटे-लेटे उन्‍होंने कार्ल मार्क्‍स की जेल्‍डा कोट्स लिखित सुप्रसिद्ध जीवनी का अनुवाद कर डाला था। इसी वर्ष लैंग्‍सटन ह्यूज़ की चुनी हुई कविताओं का उनके द्वारा किया गया अनुवाद 'स्‍थगित स्‍वप्‍न' नाम से प्रकाशित हुआ है। इन दिनों वे परिकल्‍पना प्रकाशन के लिए मार्क्‍स-एंगेल्‍स के बारे में उनके समकालीनों के संस्‍मरणों के एक दुर्लभ संकलन के अनुवाद में व्‍यस्‍त थे। साथी अमर नदीम की ग़ज़लों के दो संकलन 'आँखों में कल का सपना है' और 'मैं न कहता था' प्रकाशित हो चुके थे और लगभग इतनी ही ग़ज़लें अभी अप्रकाशित हैं।``

उन्हीं की ग़ज़लों के कुछ शेर हैं- 

बाग़बां बन के सय्याद आने लगे;

बुलबुलों को मुहाजिर बताने लगे

भाईचारा! मुहब्बत! अमन! दोस्ती!

भेड़ियों के ये पैग़ाम आने लगे

... 

सच्चाई का दम भरता है;

कोई दीवाना लगता है।

कन्धों पर है बोझ आज का,

आँखों में कल का सपना है।

... 

कभी हिंदुत्व पर संकट, कभी इस्लाम ख़तरे में;

ये लगता है कि जैसे हैं सभी अक़वाम ख़तरे में।

पुजेंगे गोडसे और गोलवरकर, फिर तो आयेगा

कबीर ओ गौतम ओ नानक का हर पैग़ाम खतरे में।

... 

अपने बारे में वह कहते हैं कि

अपनी धरती के साथ रहता हूं

उसके सब धूप-ताप सहता हूं

पूस जैसा कभी ठिठुरता हूं

और कभी जेठ जैसा दहता हूं

सब परिन्दों के साथ उड़ता हूं

सारी नदियों के साथ बहता हूं

जागता हूं सुबह को सूरज सा

शाम को खण्डहर सा ढहता हूं

इसमें तुम भी हो और ज़माना भी

यूं तो मैं अपनी बात कहता हूं

लेखक-अनुवादक मनोज पटेल नहीं रहे।

'पढ़ते-पढ़ते' चले गए मनोज पटेल 

लेखक-अनुवादक और पढ़ते-पढ़ते ब्लॉग चलाने वाले युवा मनोज पटेल हमारे बीच नहीं रहे। उनके बारे में रामजी तिवारी लिखते हैं-

मनोज पटेल के साथी राजेश जी से बातचीत हुई है। वे उनके साथ ही पुस्तक मेले में आते थे। उन्होंने बताया कि लगभग बीस दिन पहले उन्हें गले के कैंसर का पता चला था। वे लोग मुम्बई गए हुए थे। वहां इलाज भी शुरू हुआ। कीमोथेरेपी हुयी। फिर वे तीन दिन पहले अम्बेडकरनगर आये। वे ठीक ही थे कि आज सुबह उन्हें सांस लेने में तकलीफ शुरू हुई। उन्हें लखनऊ ले जाया गया, लेकिन बचाया नहीं जा सका। 

मनोज पटेल का ब्लॉग।

लेखक-आलोचक आशुतोष कुमार लिखते हैं कि मनोज पटेल ने फेसबुक पर लंबी ग़ैरहाज़िरी के बाद इस एक अगस्त को इन मार्मिक पंक्तियों के साथ वापसी की थी।

ऐनक? किसको पड़ी है उनकी

वे धुंधला जाते हैं चुम्बन के समय

रगड़ खाते हैं पलकों से

गंध और आवाज़ को कर देते हैं मंद

आंसुओं को भटका देते हैं रास्ते से... 

और किसी काम नहीं आते जब आप तलाश रहे होते हैं उसे 

जो खो गया है. 

[ वेरा पावलोवा ] 

(वेरा पावलोवा के नए कविता संग्रह "एल्बम फॉर द यंग (ऐंड ओल्ड)" से. रूसी से अंग्रेजी अनुवाद : स्टीवन सीमोर)

दोस्त उनके लौटने का जश्न मना रहे थे, बिना समझे कि वे तो बस विदा लेने आए थे! विदाई सलाम, अज़ीज़ दोस्त।

दिवंगत शायर ओवेस अहमद दौराँ। (फाइल फोटो)

शायर दौराँ भी नहीं रहे

प्रगतिशील शायर, लेखक और आत्मकथा मेरी कहानी के लिए प्रसिद्ध ओवेस अहमद दौराँ भी इस दुनिया से रुखसत कर गए। उन्होंने भी हमें शानदार ग़ज़लें और नज़्में दी। उन्हीं को याद करते हुए

उनके कुछ शेर आप सबके लिए...

 

ऐ हम-नफ़सो! शब है गिराँ जागते रहना 

हर लहज़ा है याँ ख़तरा-ए-जाँ जागते रहना 

 ऐसा न हो ये रात कोई हश्र उठा दे 

उठता है सितारों से धुआँ जागते रहना 

अब हुस्न की दुनिया में भी आराम नहीं है 

है शोर सर-ए-कू-ए-बुताँ जागते रहना 

ये सेहन-ए-गुलिस्ताँ नहीं मक़्तल है रफ़ीक़ो! 

हर शाख़ है तलवार यहाँ जागते रहना 

बे-दारों की दुनिया कभी लुटती नहीं 'दौराँ

इक शम्अ लिए तुम भी यहाँ जागते रहना 

... 

चुप रहोगे तो ज़माना इस से बद-तर आएगा 

आने वाला दिन लिए हाथों में ख़ंजर आएगा 

हाथ में मिशअल लिए हर सम्त पहरे पर रहो 

रात की चादर लपेटे हमला-आवर आएगा 

... 

हर साँस को महकाइए अब देर न कीजे 

इक फूल सा खिल जाइए अब देर न कीजे 

सन्नाटा हर इक रूह को अब डसने लगा है 

इक गीत कोई गाइए अब देर न कीजे 

इस अहद-ए-शरर-बार पे फिर अम्न की शबनम 

बरसाइए बरसाइए अब देर न कीजे 

 










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