पानीपत का लोकतांत्रिक युद्ध और चक्करवर्ती सम्राट का धर्मसंकट

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 16-03-2019


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भूपेश पंत

चक्करवर्ती सम्राट के सामने अजीब सा धर्मसंकट आ खड़ा हुआ है। अचानक उन्हें पता चला है कि वो और शाही विदूषक जिस लोकतंत्र को खुद में आत्मसात कर चुके थे वो ही लोकतंत्र अब पानीपत के तीसरे युद्ध में जन्ता की आवाज़ बन कर अपने भीमकाय रूप में उनसे कई सवालों के जवाब मांग रहा है। सम्राट को जन्ता की परवाह नहीं लेकिन अपने भक्तों की चिंता है जिनकी गुमराही उन्हें सत्ता की चौखट तक ससम्मान ले जाती है। सम्राट ने एंटायर पॉलिटिकल साइंस में पढ़ा है कि आक्रमण में ही श्रेष्ठ बचाव है इसलिए वो अब आक्रमण के लिये तैयार हैं।

शाही विदूषक (सम्राट के कक्ष में दाखिल होते हुए) - 'ऐसा कैसे हो गया सम्राट? दो पड़ोसी राज्यों ने हमारे खिलाफ़ दुरभिसंधि कर ली? आपके साथ झूले में लिये झौंके आज हमारी तरफ़ फिर आग बरसाने लगे।'

सम्राट (एकटक घूरते हुए) - 'सरकार जवाब दे?'

विदूषक (हड़बड़ाते हुए) - 'अरे सम्राट.. अभी तो सरकार आप ही हो और हर बात की जिम्मेदारी भले ही विपक्ष की है, फिर भी सुन कर कुछ अटपटा लगता है.. खैर..... (अरे यार ये फिर याद आ गया)..'

सम्राट (प्रश्नवाचक मुद्रा में)- 'तो फिर क्या करें हमें तो इसी तरह जवाब मांगने की आदत है, जवाब देने की नहीं। ऐसा करो हमारे नाम बदल सलाहकार से कहो कि विपक्ष का नाम ही सरकार रख दे।'

विदूषक (दोनों हाथों को मलते हुए) - 'लेकिन वो तो लंबी प्रक्रिया है और ऐसा चुनाव के बाद ही हो पाएगा। तब तक क्या करें?'

सम्राट (अचानक से) - 'नेहरू जवाब दो?'

विदूषक (चौंकते हुए) - 'लेकिन नेहरू अब कहां से आकर जवाब देंगे।'

सम्राट - 'तभी तो उनसे पूछ रहा हूँ कि पटेल के साथ क्या किया जवाब दो? वो तो आएंगे नहीं सफाई देने, पढ़ी लिखी जन्ता ही आएगी तो आए... फेकफुक के गोलों और चिड़िया बमों से पिट कर जाएगी।'

विदूषक (दाढ़ी खुजाते हुए) - 'लेकिन नेहरू ही क्यों सम्राट... पटेल ने तो अपने जमाने में हमारे परिवारों को ही कुछ समय के लिये कमरे में बंद कर दिया था।'

सम्राट - 'हां... लेकिन वो हमारे लौहपुरुष के पेटेंट को स्थापित करते हैं जिससे हमें मार्गदर्शन मिलता है। तुम समझ रहे हो ना?'

विदूषक (हंसते हुए) - 'हा हा.. आप भी बहुत दूर की कौड़ी लाते हो सम्राट।'

सम्राट (गर्व के साथ) - 'जब तक मेरे भक्त मेरे साथ हैं मेरे लिए सबकुछ मुमकिन है। मैं सरकार होते हुए भी विपक्ष से जवाब तलब कर सकता हूँ क्योंकि मैंने तो सिर्फ़ सवाल ही रटे हैं।'

विदूषक - 'सम्राट.. आपने सवालों को भी जवाब की तरह रट लिया है यही तो आपकी ख़ासियत है। भक्तों को आपसे सवाल पूछने की हिम्मत नहीं और विपक्ष खुद आपके बिछाए सवालों के जाल में उलझा हुआ है।'

सम्राट (चेहरे पर कड़वाहट भरते हुए) - 'बस... लेकिन मैं उस बहेलिये की तरह गलती नहीं करना चाहता जो फड़फड़ाते परिंदों को एक होने से नहीं रोक सका और अपने जाल से भी हाथ धो बैठा। मैंने प्रपंचतंत्र में ये कहानी अलग अंदाज से पढ़ी है।'

विदूषक - 'आप भूल गये सम्राट... प्रपंचतंत्र की पूरी किताब मैंने ही तो लिखी है जिसका आपने पांच साल पहले सत्तावरण किया था। जान की माफी मिले तो एक सवाल पूछूं? आपने इस कहानी से क्या सीखा सम्राट...?'

सम्राट (माफ करने का इशारा करते हुए) - 'दरअसल मैंने एंटायर पॉलिटिकल साइंस और प्रपंचतंत्र की सीखों को मिला कर ये लोकतंत्र गढ़ा है जो हमारे ठगबंधन का प्रतीक बन चुका है। मैं लोक और तुम तंत्र। जन्ता आज कसमसा रही है लेकिन इस बार भी आदी हो जाएगी। एक दिन वो लोकतंत्र के नाम पर सिर्फ़ हमें याद रखेगी। चारों तरफ झूठ नाम के सच का बोलबाला होगा और आज़ादी के बाद पैदा हुई पीढ़ी कभी उसे पहचान नहीं पाएगी। यही गांधी जी को उनके डेढ़ सौवीं जयंती पर हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।'

विदूषक - 'तो फिर इस बार इन परिंदों को एक होने से कैसे रोकेंगे?'

सम्राट (अर्थपूर्ण मुस्कुराहट के साथ) - 'इस बार बहेलिया अपने साथ कुछ तोते भी लेकर आया है। उन्हें उड़ा दिया तो वो परिंदों को आपस में उलझा कर रखेंगे। चूहों को पहले ही बहेलिये ने रोटी देकर मग्न कर दिया है। अब न तो जाल कटेगा और न ही उड़ पाएगा।'

विदूषक - 'आज तो आपको दिल से बोलने को जी चाहता है वाह सम्राट वाह। आपने प्रपंचतंत्र के उपदेशों को सही रूप में आत्मसात किया है।'

चक्करवर्ती सम्राट और शाही विदूषक ठहाका लगाते हुए रिमोट से टीवी पर सुदूरदर्शन चैनल लगाते हैं। उसमें राज्य की एकता का संदेश इस गीत के रूप में जन्ता को दिया जा रहा है.. 'एक चिड़िया.. अनेक चिड़ियाँ, दाना चुगने बैठ गयी थीं....'

(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

 








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