उग्रवाद, अशिक्षा और गरीबी की देन हैं डेरे

विवाद , नई दिल्ली , शनिवार , 02-09-2017


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प्रदीप सिंह

नई दिल्ली/चंडीगढ़। पंजाब को धार्मिक और सामाजिक रूप से गहरे प्रभावित करने वालों डेरों का उदय कब और कैसे हुआ? लंबे समय से कैसे फल-फूल रहे हैं डेरे? करोड़ों की संख्या में इनके भक्तों  की संख्या और इनकी शिक्षा सहज ही मन में सवाल पैदा करती है। इनके शिष्यों की संख्या और इनके दावे किसी भी शिक्षित और सजग व्यक्ति के जेहन को झकझोरता है। दरअसल, डेरा वह स्थान है जहां एक खास मत को मानने वालों का मुख्यालय होता हैं। देश के दूसरे हिस्सों में जहां यह स्थान मठों और मंदिरों को प्राप्त है वहीं महत्व पंजाब और हरियाणा में डेरों का है।

पंजाब और इसके साथ सटे हरियाणा में हजारों की संख्या में छोटे-बड़े डेरे हैं। इन डेरों की शाखाएं देश के अन्य राज्यों के अलावा यूरोपियन और कई पश्चिमी देशों में भी हैं। अधिकांश डेरों में एक जीवित गुरु होता है और उसको मानने वाले को भक्त, शिष्य, सेवादार या प्रेमी कहते हैं। कुछ डेरों के गुरु वंश परंपरा से आते हैं तो कुछ गुरुओं के योग्य शिष्यों के बीच से ही चुने जाते हैं। 

पंजाब और हरियाणा में साधुओं के डेरों की परंपरा बहुत पुरानी है। दोनों राज्यों में नाथ, गिरी, सतनामी और दूसरे संतों के छोटे बड़े डेरे हैं, लेकिन हाल के लगभग  चार दशक में सिखों के बीच से अध्यात्म की नई धारा की बात करने वाले सैकड़ों डेरों का उदय हुआ है। पंजाब और उसके साथ सटे हरियाणा के सिरसा, फतेहाबाद और अंबाला में दर्जनों बड़े डेरे उभरे हैं।

पंजाब में उग्रवाद का दौर खत्म होते ही शुरू हुआ डेरों का दौर

पंजाब के पुराने डेरों की बात छोड़ दी जाए तो अधिकांश नए डेरे सिखी की परंपरा से हटकर एक नई और मध्यमार्गी आध्यात्मिक धारा की बात करते हैं। इनसे जुड़ने वाले अधिकांश सिख रविदास और मजहबी समुदायों के लोग हैं। पंजाब में उग्रवाद के दौर के बाद इनकी संख्या और इनके भक्तों की संख्या में तेजी से विस्तार हुआ है। उग्रवाद से पीड़ित और त्रस्त लोग इन डेरों के प्रमुखों के संपर्क में आए, इनमें महिलाओं की संख्या अधिक थी। उग्रवाद की सबसे अधिक कीमत महिलाओं और दलितों को चुकानी पड़ी। दरअसल, किसी भी प्राकृतिक आपदा, युद्ध, दंगा या आतंकवादी,उग्रवादी घटनाओं की कीमत सबसे ज्यादा कमजोरों को ही चुकानी पड़ती है। पंजाब में सिख उग्रवाद के समय भी यही हुआ। घर के पुरुष सदस्यों की मौत के बाद बेसहारा हुए परिवारों को डेरों में ठौर मिला। जहां इनको रहने की जगह के अलावा खाना-पीना भी मिलता था। धीरे-धीरे ये आध्यात्मिक गुरुओं के रूप में प्रतिस्थापित हो गए और इनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी। पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रौनकीराम कहते हैं कि, ‘‘शांति की तलाश में डेरों से जुड़ने वालों में हताश और निराश लोगों की संख्या अधिक होना स्वाभाविक है।’’

गश्त करती पंजाब की पुलिस

नशा मुक्ति केंद्र के रूप में डेरे

अधिकांश डेरों का दावा है कि वे नशा छुड़ाते हैं। डेरों के नशा छुड़वाने के फंडे से भी पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के लाखों नशेड़ियों की पत्नियां इन डेरों से पतियों की नशा मुक्ति के लिए जुड़ गईं। पंजाब-हरियाणा के डेरों पर अध्ययन करने वाले समाजशास्त्री प्रोफेसर जितेंद्र प्रसाद कहते हैं कि, ‘‘ निश्चित रूप से पंजाब में डेरों की ताकत का राज नशे से जुड़ा है और भारी संख्या में नशेड़ी इसे छोड़ने के लिए डेरों के संपर्क में आते हैं।’’ डेरों का दावा है कि वे नशा छुड़वाते हैं। एक तरफ डेरे नशा छुड़वाने का आंकड़ा दिनोंदिन बढ़ा कर बता रहे हैं वहीं पर पंजाब सरकार की रिपोर्ट कहती है कि राज्य की युवा पीढ़ी नशे के गर्त में डूबी है। आश्चर्यजनक यह है कि जिन इलाकों में डेरे हैं वहां पर नशे का कारोबार और नशेड़ियों की संख्या सर्वाधिक है। बकौल रौनकीराम निश्चित रूप से डेरों का यह दावा झूठा है।

पंजाब के डेरों के प्रभाव में आकर कई लोग नशा छोड़ चुके हैं। इस बात में एक हद तक सच्चाई भी है। दिल्ली में काम करने वाले नीरज बताते हैं कि, ‘‘मेरे पिताजी घर में रोज पीकर आते थे। जब से डेरे में जाना शुरू किया, पिताजी का आशीर्वाद लिया और प्रवचन सुने, उन्होंने शराब छोड़ दी।’’ फतेहगढ़ साहिब की वीरमती कौर ऐसा ही कुछ बताती हैं। वह कहती हैं कि, ‘‘उसका पति शमशेर सिंह रोज शाम को शराब के नशे में धुत होकर आता था और उसे लात-घूंसों से मारता था, तीन साल पहले उसने मोगा जिले के एक डेरे में जाना शुरू किया, तब से उसके घर में शांति है। अब वह सुबह समय से मजदूरी पर जाता है और शाम को ठीक समय पर आता है। अब हमारा परिवार हर महीने डेरा नूरमहल जाता है।’’

ऐसे लोगों की संख्या लाखों में है जो डेरों के आशीर्वाद से नशा छोड़ने की बात करते हैं। लेकिन ठीक इसके विपरीत समूचा पंजाब पूरी तरह नशे में डूबा है। पंजाब सरकार के सामाजिक सुरक्षा विभाग द्वारा पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय को सौंपी गई और राज्य के पुलिस विभाग द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में हर 10  में 3 लड़कियां एक या उससे अधिक ड्रग का सेवन करती हैं। कॉलेज जाने वाले 10 में से 7 छात्र ड्रग्स के आदी हैं। राज्य में प्रति व्यक्ति  शराब की खपत देश में सर्वाधिक है।

पंजाब का दलित समाज

मालवा इलाके में जहां कर्ज और गरीबी के चलते राज्य के सर्वाधिक किसान आत्महत्याएं करते हैं। मालवा में 64 प्रतिशत परिवारों में कम से कम एक व्यक्ति ड्रग का सेवन करता है। दोआबा जहां से लाखों लोग विदेश गए हैं, में 65 प्रतिशत घरों में कोई न कोई नशे का आदी जरूरत है। यही स्थिति माझा के इलाके की भी है। कुल 70 फीसदी पंजाब नशे के जाल में फंसा है। पंजाब के डेरों में लाखों लोग आते हैं और उनका दावा है कि उनके यहां आने वाले नशा छोड़ देते हैं, तब भी पंजाब में नशे का इतना बड़ा संकट कैसे है।  

कई डेरों में जाने के बाद अनेक युवतियां अपने घर-परिवार के सदस्यों से मिलने तक के लिए राजी नहीं होती? ऐसा भी क्या नशा है डेरों का ? पंजाबी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एचएए भट्टी कहते हैं दरअसल, यहां गरीब और खासतौर से पंजाब के समाज में उपेक्षित दलितों को बराबरी का व्यवहार मिलता है लेकिन यहां धनी परिवारों की बेटियां और बेटे आकर सब भूल जाते हैं।

गरीबी और अशिक्षा भी एक कारण

डेरों से जुड़ने वालों की अधिकांश संख्या आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की है। इसका सीधा कारण यह है कि सरकार आम लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में नाकाम रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मूलभूत जरूरतों से वंचित लोग पहले नशा के जाल में फंसते है फिर परिवार के लोग उन्हें नशा मुक्ति के नाम पर डेरों की तरफ ले जाते हैं। समाजशास्त्री भी इसकी पुष्टि करते हैं। समाजशास्त्री रौनकीराम कहते हैं कि,‘‘राज्य सरकार लोगों को जीवन जीने के लिए जरूरी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पा रही है। आम सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण गरीब लोग डेरों में राहत तलाशते हैं। ’’

खेत में पंजाब का किसान

पंजाब कृषि प्रधान राज्य है और राज्य की कुल जनसंख्या का तीस प्रतिशत दलित हैं, लेकिन देश में जमीन और रोजगार के साधनों पर दलितों का सबसे कम हिस्सा है। डेरों के अनुयायियों में सबसे अधिक संख्या दलितों की ही है। लेकिन अधिकांश डेरों के मुखिया दलित नहीं हैं। एक अध्ययन के मुताबिक डेरों में एक खास वर्ग अर्द्ध शिक्षित और निरक्षर लोगों का है। चंडीगढ़ स्थिति सेंटर फॉर रूरल रिसर्च एंड इंडस्ट्रियल डवलपमेंट के जनसंख्या निदेशक प्रोफेसर अश्विनी कुमार के मुताबिक, ‘‘डेरों में समाज के उपेक्षित वर्ग के लोग अधिक संख्या में जाते हैं और उन्हें वहां कहीं न कहीं बराबरी का व्यवहार दिखता है। समाज के आंतरिक कमजोरियों को दूर करने के बजाय डेरे ऐसी  कमजोरियों का लाभा उठाकर अपने को मजबूत करते रहे हैं।’’ डेरों के दावे और हकीकत में फासला देखने को तो मिलता है लेकिन यही फासला तो राजनीतिक दलों और सरकारों में भी व्याप्त है। दरअसल, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक संगठनों के ही कंधे पर समाज की कमजोरियों को दूर करने का भार होता है। लेकिन ये सब अपने कर्तव्यों को भूलकर केवल अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में लगे हुए हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर निर्मल सिंह कहते हैं, डेरावाद ने अंधविश्वास और जातपात को बढ़ावा दिया है। जट्ट सिखों के संगठन भी इससे बच नहीं पाये। राजनेताओं और राजनीतिक दलों ने भी  डेरों का अपने स्वार्थों के लिए खूब इस्तेमाल किया।










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