हरियाणा और पंजाब की जमीन पर क्यों फल-फूल रहे हैं डेरे?

विवाद , नई दिल्ली , शुक्रवार , 01-09-2017


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प्रदीप सिंह

नई दिल्ली / चंडीगढ़। हरियाणा के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के समाज विरोधी और अनैतिक कृत्यों ने शासन और समाज के लिए खतरा पैदा कर दिया। बलात्कार के अपराध में जब डेरा प्रमुख को सजा सुनाई गई तो डेरा समर्थक एवं गुरमीत के अनुयायी सड़क पर उतर कर पुलिस के खिलाफ संघर्ष करने लगे। पुलिस और डेरा समर्थकों के बीच हुए संघर्ष में लगभग पचास लोगों की जान गयी और सैकड़ों घायल हुए। ऐसे में यह सवाल उठता है कि डेरा समर्थकों का अंधविश्वास के हद तक जाकर अपने गुरु के समर्थन और डेरा के अथाह संपत्ति और प्रभाव का राज क्या है ?

पंजाब और हरियाणा के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में डेरों का बहुत महत्व है। पंजाब-हरियाणा में डेरा और यूपी बिहार में मठ या आश्रम का एक ही अर्थ है। राज्य में डेरों की उत्पत्ति और विकास के पीछे एक लंबा  इतिहास है। सिख पंथ से पहले राज्य में मुस्लिम सूफियों तथा नाथ योगियों के डेरे रहे हैं। अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के साथ ही उदासी डेरा है। नानकसर नामधारी और बाबा राम थमन डेरा सिख पंथ के उदय के साथ ही अस्तित्व में आए। एक समय तक डेरे सामाजिक सुरक्षा और धार्मिक एकता के प्रतीक रहे हैं। सिख पंथ की स्थापना के साथ ही पंथ में गुरुओं का स्थान बहुत ऊंचा रहा है। अधिकांश सिख गुरू पंथ की रक्षा के साथ ही तत्कालीन मुगल शासकों से अपने विरोध के लिए भी जाने जाते हैं। जिसके कारण डेरों का स्वरूप सैनिक छावनियों की तरह बनता गया। लोगों की भावनाएं डेरों से जुड़ती गयीं। लेकिन बाद में सिख पंथ के इतर भी पंजाब में कई डेरे अस्तित्व में आए। जिसका मूल कारण कथित निचली जातियों के साथ असम्मानजनक व्यवहार रहा है। नए डेरों ने एक बार फिर से बराबरी और जाति के सवाल को प्रमुखता से उठाया। और ऐसे डेरे कुछ क्षेत्रों और जातियों के प्रमुख बन गए।

सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा का मुख्यालय

सामाजिक और आर्थिक भेदभाव के कारण बढ़ते डेरे

सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक भेदभाव डेरों के उद्गम और विकास के प्रमुख कारण हैं। सिख धर्म के आदर्श और मूल में तो जाति भेद का विरोध और सबके साथ बराबरी करने का सिद्धांत है। लेकिन समय के साथ शारीरिक श्रम करने वालों और कथित निचली जातियों को सिख पंथ अपनाने के बावजूद जातिभेद का शिकार होना पड़ा। सिख पंथ तो अपने डेरों को हर जाति और धर्म के लिए खुला बताता है। लेकिन व्यवहार में आज भी दलित जातियों का हर स्तर पर जातीय भेदभाव का सामना और उत्पीड़न का शिकार होना आम बात है।

पंजाब में दलितों की स्थिति बहुत दयनीय है। राज्य के मालवा, माझा और दोआबा में डेरों के विकास का यह बहुत बड़ा कारण है। इन इलाकों में आज भी पिछड़ी और दलित जाति के लोगों को सम्मानजनक स्थान नहीं मिला है। आज भी ऊंची जाति के लोग उनको सम्मान देने से इनकार कर रहे हैं। आज पंजाब की हालत यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जाट सिखों और दलित सिखों के अलग-अलग गुरुद्वारे हैं। कई जगह जहां पर दलितों के गुरुद्वारे अलग नहीं हैं वहां पर लंगर में दलितों की पंगत अलग होती है। ऐसी स्थित में नए-नए डेरों और बाबाओं का उदय हुआ। ऐसे डेरों और बाबाओं ने एक बार फिर से बराबरी का संदेश देकर दलितों-पिछड़ों में अपनी मजबूत स्थिति बना ली।  

पंजाब में कुल नौ हजार डेरे

एक अध्ययन के मुताबिक पंजाब में कुल नौ हजार डेरे हैं। इनमें से तकरीबन पंद्रह डेरे तो ऐसे हैं जिनके अनुयाइयों की संख्या एक लाख से एक करोड़ के बीच है। नामधारी, डेरा सच्चा सौदा, डेरा संतपुरी वाला, निरंकारी, राधा स्वामी सत्संग व्यास, डेरा बाबा बूढ़ा दल, दिव्य ज्योति जागृति संस्थान (नूरमहल) डेरा बेगोवाल, डेरा बाबा भनियारा वाला, डेरा सचखण्ड बल्लां, डेरा नानकसर आदि ऐसे डेढ़ दर्जन डेरे हैं जिनके अनुयायी पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड के अलावा विदेशों में भी बड़ी संख्या में हैं। विदेशों में बसने वाले डेरा भक्त इन डेरों को करोड़ों रुपये दान राशि के रूप में पहुंचाते हैं। अक्सर, डेरों के प्रमुख विदेशों के दौरे इसी काम के लिए करते हैं। इन डेरों के अनुयायी सभी जातियों से हैं लेकिन इनमें बड़ी संख्या दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों की है। जो आर्थिक रूप से विपन्न हैं। डेरों का मूल काम धर्म का प्रचार है और वे संतवादी विचारधारा का होने का दावा करते हैं। कई मामलों में यह सच भी दिखता है। जाति और धर्म के आधार पर डेरों में भेदभाव कम दिखता है। डेरों की शिक्षा-दीक्षा बहुत सरल है। डेरे भक्तों को जटिलता से दूर रहने की प्रेरणा देते हैं।

डेरों का सामाजिक कार्य

डेरों के साथ भारी संख्या में अनुयाइयों के जुड़ने का कारण इनके द्वारा चलाए जाने वाले सेवा केन्द्र भी हैं। डेरे स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्र, नशा मुक्ति केन्द्र के अलावा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लड़कियों का सामूहिक विवाह भी कराते हैं। दलित और आर्थिक रूप से गरीब लोग यहां आकर स्वयं को सम्मानित महसूस करते हैं। डेरा सच्चा सौदा के भक्तों में भी बड़ी संख्या दलितों की है। पंजाब में इसका एक बड़ा केन्द्र बठिंडा जिले के सलाबतपुरा में है। अक्सर विवादों में रहने वाले इस डेरे में आने वाले प्रेमी (भक्त) नशामुक्ति के लिए आते हैं। हालांकि डेरों का नशा भी प्रेमियों में पागलपन की हद तक हैं। डेरा प्रेमी सत्संग के लिए तिपहिया और चौपहिया वाहनों में हर रविवार अलग-अलग केंद्रों पर लाखों की संख्या में जमवाड़ा करते हैं।

डेरा सचखण्ड बल्लां द्वारा संचालित अस्पताल

पंजाब का दलित समाज और डेरा सचखण्ड बल्ला

कुछ समय पहले वियना में बाबा रामानंद की हत्या के बाद विवादों में आया डेरा सचखण्ड बल्लां दलित सिखों में सर्वाधिक प्रतिष्ठित डेरा है। इस डेरे ने दलितों में चेतना जगाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। वर्ष 1920 के आद्य धर्म आंदोलन ने पंजाब में दलितों में चेतना पैदा करने का बड़ा काम किया और इसमें डेरा सचखण्ड बल्ला की बहुत बड़ी भूमिका रही है। आद्य धर्म आंदोलन का उदय कथित निचली जाति के लोगों में सम्मान हासिल करने के लिए प्रयासों के बीच हुआ। इसी के चलते दलित पंजाब में संगठित भी हुए और आद्य धर्म आंदोलन ने इन लोगों को अलग पहचान दी। यह आंदोलन गुरू रविदास को उनके धर्मगुरू के रूप में आद्य प्रकाश को पवित्र पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करता है। कुछ समय पहले हुए बवाल जिसमें डेरा सचखण्ड बल्लां में आने वाले लोगों की हत्या के बाद पंजाब में दलितों ने गहरी नाराजगी दर्ज कराई। इस हत्याकांड के बाद सिखों और गैर सिखों में मतभेद बहुत गहरा गए। स्थिति यहां तक पहुंच गयी कि पंजाब में मौजूद सैकड़ों दलित गुरुद्वारों से गुरु ग्रंथ साहिब को हटा दिया गया। इन गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब की जगह आद्य ग्रंथ का प्रकाश कर दिया गया। दलितों में इसको लेकर मतभेद भी हुए। अब इन डेरों में बाबू मंगूराम और रविदास डेरों द्वारा चिन्हित आद्य धर्म आंदोलन की शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक जोर दिया जाता है। पंजाब के आद्य धर्मी दूसरे दलितों के मुकाबले राज्य में अधिक संपन्न और जागरूक हैं। शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने उन्हें चेतनशील बनाया है तो आर्थिक मजबूती भी प्रदान की है। दोआबा के इलाके से जो लोग विदेशों में जाकर बसे हैं उन्होंने यहां शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए काफी धन पहुंचाया है।

पिछले आठ दशक से अधिक समय में दलित चेतना के परिणामस्वरूप रविदासी एक मजबूत और स्वायत्त जाति धर्म के रूप में उभरकर आया है। उनका आदर और श्रद्धा गुरुग्रंथ के लिए प्रथम रहा है। क्योंकि इसमें गुरु रविदास के उपदेशों को भी समाविष्ट किया गया है। लेकिन हाल के दिनों में आद्य ग्रंथ ने इसे थोड़ा कम किया है। वर्षों से रविदासी अपने प्रतीक और प्रार्थनाओं का प्रचार करते रहे हैं, ये प्रतीक और प्रचार ही उन्हें पंजाब के सिखों से अलग करते हैं। पंजाब में जाति सामाजिक विरोध का एक महत्वपूर्ण हथियार और आधार है। इसी कारण रविदासियों के लिए स्वायत्त जाति धर्म की पहचान विकसित करना एक तरह की मजबूरी भी है। इसी कारण रविदासी जट्ट सिखों के साथ मतभेदों के चलते वे अपनी श्रद्धा उनमें नहीं जताते।

पंजाब में कुल आबादी का साठ प्रतिशत सिख हैं। यहां पर दलितों की संख्या भी पैंतीस प्रतिशत के लगभग है। पंजाब विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के मुताबिक अब दलित आपस में दूसरे का अभिवादन जय गुरू देव कहकर करते हैं। सामने वाले इसका उत्तर धन गुरु देव कहकर देते हैं। समाजशास्त्र के प्रोफेसर मंजीत सिंह के मुताबिक, ‘‘दलितों को अपनी जनसंख्या के मुकाबले जमीन में बहुत कम हिस्सा मिला है। इससे भी ऊपर दलितों के साथ ज्यादती यह है कि सिख पंथ वैज्ञानिकता के आधार पर जाति का विरोध करता है। लेकिन पंथ में भारी संख्या में लोग दलितों के साथ भेदभाव करते हैं।’’ आज ये मतभेद और विभाजन बहुत प्रखर हो चुके हैं। दलित अपने आपको कई मामलों में बहिष्कृत महसूस करते हैं। दोआबा इलाके में तो दलितों की संख्या कई जगह चालीस प्रतिशत से भी ऊपर है।

 रविदास संप्रदाय का डेरा

पंजाब का आद्य धर्म और मंगूराम

19 वीं सदी के मध्यकाल में ही पंजाब की दलित राजनीति में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव को महसूस किया जाने लगा था। इसके बाद हरित क्रांति के साथ-साथ इस बदलाव को और अधिक करीब से महसूस किया गया। हरित क्रांति में हालांकि दलितों का योगदान बहुत बड़ा था लेकिन उन्हें इसमें अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिली। क्योंकि पंजाब में अधिकांश दलित खेतिहर मजदूर थे। लेकिन इसके बावजूद दलितों में आर्थिक विकास देखने को मिला। इधर, अंग्रेजों ने दलितों को कुछ कामों में लगाया। छावनियों के विस्तार के साथ-साथ जूते बनाने, चमड़े की बेल्ट और बैग बनाने में चर्मकार समुदाय के लोगों को अंग्रेजों ने काफी काम दिया। यह वह दौर था जब दलितों को विकास में हिस्सेदारी महसूस होने लगी। इसी बीच यहां पर सामाजिक सुधार आंदोलनों के बहाने भटके हुए हिन्दुओं और दलितों को वापस मुख्यधारा में लाने की मुहिम शुरू हुई। शुद्धि की इस मुहिम के बहाने सिख सुधारकों ने जातिवाद को बढ़ावा देने से रोक दिया लेकिन यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

सन् 1920 में जब आद्य धर्म आंदोलन की शुरुआत हुई तो मंगूराम ने इसे बहुत तेज गति दी। मंगूराम पंजाब की दोआबा की उसी धरती के एक उद्यमी चर्मकार के पुत्र थे जहां आज भी दलित बहुत अधिक संवेदनशील और चैकस हैं। होशियारपुर जिले के गंगोवाल गांव में जन्मे मंगूराम ने जिस तरह से अपने निजी जीवन में सामाजिक उपेक्षा और उत्पीड़न को झेला था, वह उन्हें लगातार इसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित करता था। मंगूराम को दलित उत्पीड़न और सामाजिक उपेक्षा के खिलाफ आवाज उठाने के खिलाफ प्रेरित करने में आर्य समाज की भी एक बहुत बड़ी भूमिका थी। वह आर्य समाज के एक स्कूल में पढ़े। मंगूराम के पिता ने अपने कारोबार से कुछ धन बचाकर उन्हें पढ़ने के लिए अमेरिका भेज दिया। वह अमेरिका से 1925 में जब भारत लौटे तो उस वक्त तक वह वामपंथ से बहुत प्रभावित हो चुके थे। स्वदेश आने के तुरंत बाद ही वो गदर आंदोलन में सक्रिय हो गए। आर्य समाज और दूसरी कई जात-पात का विरोध करने वाली संस्थाओं से सहयोग लेकर मंगूराम ने दलित चेतना अभियान शुरू कर दिया। मंगूराम के प्रयासों के परिणामस्वरूप ही 1931 में आद्य धर्म को जनगणना में एक अलग धर्म के रूप में मान्यता मिल गई। उधर, दलित संगठन ने इस धर्म की घोषणा भी कर दी। अपनी घोषणा में इस संगठन ने कहा, ‘‘ हम हिन्दू नहीं हैं। हम सरकार से मांग करते हैं कि हमारा धर्म आद्य धर्म है और जनगणना में इसी का उल्लेख किया जाए। ’’

सन् 1931 की जनगणना में पंजाब के 4,18,797 लोगों ने अपना धर्म आद्य धर्म लिखवाया। दोआबा के होशियारपुर और जालंधर जिले के अस्सी प्रतिशत दलितों ने इस जनगणना में स्वयं को आद्य धर्म लिखवाया। आद्य धर्म की मुहिम के बहाने चर्मकारों का एक बड़ा वर्ग संगठित हो गया। आज यहां पर आद्य धर्मी बहुत संपन्न हैं। लाखों की संख्या में दोआबा इलाके के आद्य धर्मी आस्ट्रेलिया, इटली, जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन में हैं। यह अगल बात है कि इस धर्म में बिखराव भी जल्दी शुरू हो गया। मंगूराम पंजाब विधानसभा के सदस्य चुने गए। इससे धर्म के लोगों में काफी नाराजगी हुई। उन्हें मंगूराम का राजनीति में जाना ठीक नहीं लगा।  जिसके कारण आजादी से ठीक एक साल पहले 1946 में रविदास मण्डल नाम की एक नई संस्था का गठन हो गया।

डेरा के भक्त

पूना पैक्ट और आद्य धर्म में बिखराव

अब आद्य धर्म टूट रहा था। कई जगह यह पूरी तरह टूट चुका था। 1932 में पुणे में महात्मा गांधी और डॉ भीमराव आंबेडकर के बीच हुए समझौते के बाद इसकी कमर टूट गई। दलितों को हिन्दुओं की अनुसूचित जाति में शामिल कर लिया गया। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर को दलितों को आरक्षण का लाभ दिलाने की दृष्टि से लिया गया था। अगर इन्हें हिन्दू धर्म की अनुसूचित जातियों में नहीं रखा जाता तो आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। 24 मई 2009 में वियना में संत रामानंद की हत्या के बाद फिर से आद्य धर्म की बात उठने लगी। सवाल फिर वही था कि दलितों के साथ पंजाब में अन्याय हो रहा है लेकिन सवाल पर सवाल यह था कि अगर आद्य धर्म बनाया गया तो आरक्षण के लाभ से दंलितों को वंचित होना पड़ेगा। इस सवाल पर दलित दो भागों में बंट गए। दलितों के एक डेरे से फरमान जारी हुआ कि 2010 की जनगणना में चर्मकार समुदाय के सभी लोग अपना धर्म आद्य धर्म लिखवाएंगे। लेकिन दूसरी तरफ से विरोध हुआ और कहा गया कि ऐसा हरगिज नहीं होना चाहिए।

आज इस सवाल पर पंजाब के आद्य धर्मी दो भागों में बंटे हैं। हां, एक बात जरूर है जातीय तनाव को हटाने में डेरों की भूमिका पर अब सवालिया निशान लगने लगे हैं। हालांकि डेरों में कहा जाता है कि किसी भी स्थिति में जात-पात में विश्वास नहीं रखना। लेकिन संत रामानंद की वियना में हत्या के बाद पंजाब में हुए दंगे हमें आद्य धर्म और डेरों की पृष्ठभूमि ही नहीं उनकी उपयोगिता, व्यवहारिकता और क्या डेरे जातीय तनाव को कम करने में भूमिका निभा रहे हैं, जैसे सवालों पर सोचने को मजबूर किया है।

 

 










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