डेरा और राजनीति के बीच नाभिनाल का रिश्ता

विवाद , , शनिवार , 26-08-2017


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली /चंडीगढ़। पंजाब और हरियाणा की राजनीति में विभिन्न डेरों का इतना प्रभाव है कि वे राजनीतिक दलों का समर्थन करके हार-जीत का समीकरण बदलते रहे हैं। डेरों से समर्थन लेने के लिए हर राजनीतिक दल उनके पास पहुंचता रहा है । कांग्रेस, भाजपा, अकालीदल और इंडियन नेशनल लोकदल के प्रमुख नेताओं का इन डेरों के साथ कैसा संबंध है यह मौके-बेमौके उनके मत्था टेकने की तस्वीरों से समझा जा सकता है। दोनों राज्यों में चुनावों के समय विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं को डेरा प्रमुखों से मिलने का इंतजार करते देखा गया है। लाखों अनुयायी और करोड़ों का साम्राज्य डेरा को अथाह शक्ति मुहैया कराते हैं। पंजाब-हरियाणा की राजनीति में डेरा प्रमुखों का फरमान राजनीतिक दलों के भविष्य तय करते रहे हैं। पंजाब-हरियाणा में डेरों के उदय और उनके सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव ने राजनीतिक दलों को बौना साबित कर दिया है। डेरों के बढ़ते प्रभाव का कारण सिर्फ राजनीति का उनके सामने घुटने टेकना ही नहीं है। बल्कि डेरों के उदय और विकास का कारण पंजाब-हरियाणा के सामाजिक और आर्थिक ढांचे में निहित है। 

हरियाणा के मंत्री अनिल विज और गुरुमीत राम रहीम

सामाजिक विषमता और गैर बराबरी से डेरा को मिलता है खाद -पानी

पंजाब-और हरियाणा का सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक ताना-बाना कुछ जातियों तक सीमित है। कृषि से लेकर सत्ता के शीर्ष तक जाट और जाट सिखों का बोलबाला रहा है। हरियाणा में जाट तो पंजाब में जाट सिखों का समाज, राजनीति और आर्थिक संसाधनों पर कब्जा रहा है। सच्चाई यह है कि पंजाब-हरियाणा में दलित और पिछड़े समाज मुख्यधारा से लेकर राजनीति तक में  बाहर हैं। दोनों राज्यों में उन्हें प्रभावशाली जाट और जाट सिखों के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। पंजाब में दलितों की स्थिति दयनीय है। राजनीति के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक रूप से वे भेद-भाव के शिकार होते रहे हैं। ऐसे में डेरा सच्चा सौदा, संत निरंकारी और डेरा सच्चा बल्लां आदि दलित सिखों और गरीब लोगों के साथ भावनात्मक रूप से खड़ा दिखता है। डेरों के सामाजिक,धार्मिक बराबरी का संदेश और स्कूल,अस्पताल जैसे कार्य राज्य सरकारों से ज्यादा प्रभावी तरीके से काम करते हुए दिखते हैं। ऐसे में पंजाब-हरियाणा की यह सामाजिक-राजनीति और धार्मिक-आर्थिक विषमता डेरों के लिए खाद-पानी का काम करता है। डेरों के बढ़ते आर्थिक और सामाजिक प्रभाव में दोनों राज्यों के पिछड़ी और दलित आबादी की बड़ी भूमिका है।

यह सच है कि दोनों राज्यों के दलित-पिछड़े आबादी के साथ अन्य लोग भी डेरों के अनुयायी हैं। जो डेरा प्रमुखों के फरमान को भगवान का आदेश मानते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को व्यापक समाज के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की चिंता करने के बजाय पांच साल में एक बार डेरा प्रमुखों के आगे झुक कर उनके अनुयाईयों का वोट पाना आसान लगने लगा है। चुनावों के समय डेरा प्रमुखों की जायज-नाजायज मांगों को मानने और सत्ता में आने पर उन्हें विशेष रियायत देने का खेल यहीं से शुरू होता है।

डेरा सच्चा सौदा का साम्राज्य  

डेरा सच्चा सौदा का मुख्यालय हरियाणा के सिरसा जिले में है। डेरा प्रमुख का असली नाम गुरमीत सिंह है। वह अपने को सारे धर्मों और जातियों को एक बराबर मानने वाला बताता है। इसी कारण वह अपने समर्थकों को इंसा और अपने को गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा कहता है। राजस्थान के श्रीगंगानगर के गुरुसरमोडिया गांव में जन्मे गुरमीत राम रहीम का धार्मिक और आर्थिक कारोबार देश-विदेश में फैला है। सिरसा में लगभग 700 एकड़ खेती की जमीन है और डेरा के अंदर ही कृषि आधारित विभिन्न प्रोडक्ट आश्रम में बनते हैं। आश्रम में बनने वाले प्राॅडक्ट और भक्तों से मिलने वाला चंदा डेरों के आर्थिक समृद्धि का जरिया है। अनुयाईयों के रूप में डेरों को फ्री में श्रम शक्ति भी उपलब्ध है।

सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के किलेनुमा आश्रम में तीन अस्पताल, एक इंटरनेशनल आई बैंक, गैस स्टेशन और मार्केट कॉम्प्लेक्स है।  दुनिया में डेरा के करीब 250 आश्रम और लाखों अनुयायी फैले हैं। डेरा सच्चा सौदा की स्थापना 1948 में शाह मस्ताना महाराज ने की थी। शाह मस्ताना महाराज के बाद डेरा के गद्दीनशीन शाह सतनाम महाराज बने। उन्होंने 1990 में अपने अनुयायी संत गुरमीत सिंह को गद्दी सौंपी थी। डेरा का दावा है कि यह संस्था किसी भी राजनीतिक या व्यावसायिक संबंधों से अलग एक गैर-लाभकारी ट्रस्ट सोसाइटी है। डेरा सच्चा सौदा का साम्राज्य अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और तो और यूएई तक फैला है। दुनियाभर में डेरे के करीब पांच करोड़ अनुयायी होने का दावा है। इनमें से करीब 25 लाख अनुयायी तो अकेले हरियाणा में हैं। गुरमीत राम रहीम सिंह लग्जरी गाड़ियों के काफिले में चलते हैं। उनके आसपास सुरक्षाकर्मियों की पूरी फौज रहती है। महिला कमांडों भी उनकी सुरक्षा के लिए मुस्तैद नजर आती हैं। राम रहीम खुद फिल्में बनाते और उनमें अभिनय करते हैं।

 केंद्रीय मंत्री विजय गोयल और गुरुमीत राम रहीम

डेरा का राजनीतिक प्रभाव

पंजाब -हरियाणा की राजनीति में डेरों का प्रभाव जगजाहिर है। दोनों राज्यों में डेरा सच्चा सौदा ,राधा स्वामी सतसंग न्यास, संत निरंकारी, डेरा सच्चखंड बल्लां और दिव्य ज्योति संस्थान का भी अच्छा प्रभाव है। नकोदर में बाबा मुरादशाह, कपूरथला में डेरा बेगोवाल, मस्तराम जी जटाणा और भटिंडा में डेरा रूमी वालों का बहुत प्रभाव है। हरियाणा के सिरसा में स्थित गुरमीत सिंह का डेरा सच्चा सौदा ऐसा अकेला गढ़ रहा है जो सीधे तौर पर अपने समर्थकों को राजनीतिक लाइन देता रहा है। डेरा का हरियाणा और पंजाब के मालवा क्षेत्र में व्यापक प्रभाव है। पंजाब का मालवा क्षेत्र नशा, किसानों की आत्महत्या और जाट सिखों और दलितों के बीच संघर्ष के कारण भी चर्चा में रहता है। उक्त सारे मुद्दों पर डेरा लाइन लेता रहा है। डेरा ब्लाक स्तर पर बनाई गई समितियों के सहारे राजनीतिक संदेश भी देता है। जाहिर है कि राजनीतिक दलों को भी ऐसा गढ़ भाता है जो उनकी सीधी मदद करे। एक ऐसा गढ़ जो जातीय आधार पर भी वोटरों को सुनिश्चित करे। 

डेरा सच्चा सौदा का हरियाणा के नौ जिलों की करीब तीन दर्जन विधानसभा सीटों पर अच्छा खासा दखल है। सूबे में 20 लाख से 25 लाख उनके अनुयायी हैं। इस बार के चुनाव में बीजेपी ने डेरा का समर्थन होने से उचाना कलां, टोहाना, अंबाला सिटी, हिसार, नारनौंद, बवानी खेड़ा, भिवानी, शाहबाद, थानेसर, लाडवा, मौलाना और पेहवा सीटों पर जीत दर्ज की थी।

पंजाब के  मालवा क्षेत्र के 13 जिले डेरा सच्चा सौदा के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। सूबे की 117 विधानसभा सीटों में से 65 सीटें मालवा इलाके से आती हैं । इन सीटों पर डेरा समर्थक हार जीत में अहम भूमिका अदा करते हैं । यही वजह है कि पंजाब चुनाव के दौरान तकरीबन हर पार्टी के नेता डेरा सच्चा सौदा की चौखट पर सिर झुकाने आते हैं।

बीजेपी के नतमस्तक मंत्री 

डेरा सच्चा सौदा के दरबार में बीजेपी नेता सिर्फ हाजिरी नहीं लगाते, बल्कि कई मंत्री बाकायदा डेरा को अनुदान भी देते रहे हैं। इनमें एक केंद्रीय मंत्री और तीन हरियाणा के मंत्री शामिल हैं । हरियाणा के शिक्षा मंत्री राम विलास शर्मा ने डेरा मुखी के जन्मदिन पर 51 लाख रुपये डेरा को अनुदान देने का ऐलान किया था। इससे पहले रुमाल छू प्रतियोगिता को बढ़ावा देने के लिए खेल मंत्री अनिल विज ने 50 लाख रुपये और सहकारिता राज्यमंत्री मनीष ग्रोवर ने खेल लीग के दौरान 11 लाख रुपये का अनुदान दिया था। इतना ही नहीं केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल भी स्टेडियम बनाने के लिए 30 लाख रुपये की मदद कर चुके हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 










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