दिलीप कुमार ने कादर खान के हुनर को समझा तो कादर खान ने अमिताभ को अपने हुनर से नवाजा

श्रद्धांजलि , , बृहस्पतिवार , 03-01-2019


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पुण्य प्रसून वाजपेयी

जन्म काबुल में। पिता कंधार के। बचपन मुफलिसी में बीता। संघर्ष जिन्दगी की पहचान थी। 1973 में फिल्म दाग से फिल्मी सफर की शुरुआत हुई। पहचान डायलाग डिलिवरी की बनी। फिल्म कोई भी हो। स्क्रिप्ट राइटर कोई भी हो लेकिन खुद के डायलाग खुद ही लिखेंगे। और डायलाग इतने असरदार की फिल्मों की पहचान ही डायलाग किसने लिखा इससे बनने लगी। और उस शख्स की मौत की खबर जब बरस के पहले ही दिन आई तो 70-80 के दशक में फिल्मों के शौकीनों में नास्टाल्जिया छा गया।

जाहिर है जिसने भी 70-80 के दशक को लड़कपन में जिया है। स्कूल से भाग कर फर्स्ट डे फस्ट शो देखा है उसके लिये नायकों की छवि के बीच चाहे अनचाहे ये शख्स रगों में दौड़ने लगा। फिर चाहे नायकों की कतार में दिलीप कुमार हों या राजेश खन्ना य़ा फिर अमिताभ बच्चन या गोविन्दा ही क्यों ना हों। चाहे-अनचाहे इस शख्स की अदाकारी और स्क्रीन पर डायलग डिलीवरी की टाइमिंग और हास्य की अदाकारी मौत की खबर के साथ काकटेल बन कर हर जहन में समायी जरूर। लेकिन कल्पना कीजिये जिन्दगी को जिस अंदाज में किसी शख्स ने बचपन में अपनाया हो और मौका मिला तो अपनी भोगी हुई जिन्दगी को डायलाग के आसरे पर्दे पर उभार दिया। और देखने वालों ने इसे दिल से महसूस किया।

लेकिन इस समझ को बहुत कम लोग जानते होंगे कि जिन हालातों को कादर खान के पिता ने अफगानिस्तान में रहते हुये जिया उस दौर में अतिवामपंथी सोच रुसी और चीनी मिजाज को जीते हुये अफगानिस्तान भी पहुंची थी। यानी गुलामी के दौर में वर्ग संघर्ष का अनकहा सच। कादर खान को तो उनकी मां लेकर बंबई आ गईं क्योंकि उससे पहले कादर खान के तीन भाई अफगानिस्तान में जन्म के चंद दिनों में ही मर चुके थे। तो जगह हालात बदलने की ख्वाइश समेटे कादर खान की मां इकबाल बेगम बंबई आईं। पर जिन्दगी की जद्दोजहद में कादर खान को बंबई के रंग नहीं मिले बल्कि खुद की खामोशी और हालात के संघर्ष ने कब्रिस्तान में ढकेल दिया।

जहां घंटों कादर खान बैठे रहते। वहां उनकी आवाज कोई सुनने वाला नहीं था तो अपने भीतर के आक्रोष को जोर-जोर से बोलने में कोई परेशानी भी नहीं थी। वाकई ये किसी को भी अजब लग सकता है कि कैसे कोई बच्चा कब्रिस्तान या कहें श्मशान में बैठ कर अपने भीतर के सवालों को बोल-बोल कर बाहर करता होगा। पर ये हकीकत है कि कब्रिस्तान के माहौल ने बालक कादर खान की जिन्दगी में बंबई के रंग भर दिये। रंगों के खोने के बाद कब्रिसतान में कभी किसी ने बालक कादर खान को चिल्लाते हुये देखा ।

अपने भीतर के सवालों से जूझते कादर खान के बोल में किसी को नाटकीयता दिखायी दी तो किसी को हकीकत के शब्द सुनायी दिये । और इसी कड़ी में उस दौर में थियेटर के कलाकार अशरफ खान ने कादर खान से पूछ लिया अभिनय करोगे । अभिनय तो किया ही नहीं है । जानता भी कुछ नहीं हूं । कोई बात नहीं अदाकारी सीखी नहीं जाती सिर्फ डायलाग याद करने होते हैं । और लंबे लंबे डायलाग याद कर बोलने होते हैं । ये तो बहुत आसान है । और संभवत इतने ही संवाद के बाद अशरफ खान कब्रिस्तान से कादर खान को उस माहौल में ले गये जो बाप के संघर्ष और कब्रिस्तान की खामोशी से बिल्कुल अलग था । और कादर खान का मतलब क्या हो सकता है ये और किसी ने नहीं पहली बार दिलीप कुमार ने महसूस किया । क्योंकि नाटकों को करते वक्त कादर खान के डायलग बोलने के अंदाज को यूसुफ भाई यानी दिलीप कुमार ने महसूस किया । किसी के कहने पर दिलीप कुमार जब कादर खान के डायलग बोलने के अंदाज को देखने-सुनने थियेटर पहुंचे ।

नाटक के दौरान दिलीप कुमार ने महसूस किया कि कादर खान उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्व हैं । तो नाटक खत्म होने के बाद कादर खान को अपने साथ फिल्म में काम करने का आफर देने से नहीं चूके । उस दौर में दिलीप कुमार को लेकर तपन सिन्हा ने सगीना फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी । जेके कपूर फिल्म प्रोड्यूस कर रहे थे । कमोवेश शूटिंग शुरु होने वाली थी । पर कादर खान के डायलाग डिलीवरी को देखकर दिलीप कुमार ने खास तौर पर पूरी फिल्म में सिर्फ एक डायलाग की जगह कादर खान के लिये तपन सिन्हा को बोलकर निकाली । अल्ट्रा लेफ्ट के आंदोलन और वर्ग संघर्ष के बीच एक गरीब मजदूर के संघर्ष को दिखलाती इस फिल्म में सिर्फ दिलीप कुमार ही नहीं बल्कि अनिल चटर्जी और कल्याण चटर्जी के साथ अपर्णा सेन सरीखे कलाकर थे जो फिल्म में अतिवाम आंदोलन चला रहे थे ।

लेकिन उनके नेता के तौर पर कादर खान की एंट्री वैचारिक तौर पर सगीना फिल्म की ही नहीं बल्कि सगीना महतो के चरित्र को जीते दिलीप कुमार को भी परिभाषित करते हैं । महज नब्बे सेकेंड के डायलाग में बतौर लीडर कादर खान का संबोधन और वामपंथी नेता की भूमिका में सवाल करते बंगाली थियेटर के महान कलाकार अनिल चटर्जी थे । तो कल्पना कीजिये 1974 की फिल्म सगीना में कादर खान को कैसे डायलाग के लिये दिलीप कुमार तैयार करते हैं और तपन सिन्हा कादर खान के लिये कौन सा डायलाग लिखते हैं । कुछ इस तरह है फिल्मी अंदाज.... " आज मैं आप लोगों के सामने एक साधारण मजदूर की बात करना चाहता हूं जिसकी छाती में एक शेर का दिल है । जो गरीब है । लेकिन जिसके अल्फाज परिवर्तन की वादी में बदलते हैं । उसका नाम है सागीना महतो । सगीना दो रुपये रोज का मजदूर है । लेकिन करोड़ों की लागत से बनी जिस कंपनी में वह काम करता है वह उसके नाम से डरती है । इसीलिये सगीना जैसे लोगों की हमारे संगठन में जरुरत है । इसलिये हमारे नये साथी वहां जायें और उसे संगठन में शामिल करने का प्रयास करें । 

[ अनिल चटर्जी ] सगीना के मुताल्लिकात ये भी मशहूर है कि उसे शराब की लत और लंफंगेपन की आदत है । 

[कादर खान ] लफंगे वह विदेशी कैपटलिस्ट हैं जो सदियों से गरीब मजदूर जनता का खून पीते आये हैं । सगीना को अगर शराब की लत है तो उसे हम धिक्कार कर अलग नहीं कर सकते ।

[ अनिल चटर्जी ] ठीक है शराबी को भी हम अपनी छाती से लगा लेंगे जरूर लेकिन उसके बाद हमारी जंग के अंजाम का क्या होगा । 

[ कादर खान ] अगर इस जंग में कामयाबी हमारी नियम है अनीरुद्द बाबू तो हमे इस देश के हर सागीना को अपने साथ लाना होगा । ये लड़ाई गरीब मजदूर जनता की लड़ाई है । ये लड़ाई सगीना महतो की लड़ाई है ।

और पूरी फिल्म में कादर खान का ये डायलाग दिलीप कुमार के कद को बढ़ाता है । वाम संघर्ष को पैनापन देता है । तो क्या आजाद भारत में जब राजेश खन्ना का दौर था । प्रेम काहनियां हर दिल अजीज थीं तब वाम संघर्ष को लेकर या कहें वर्ग संघर्ष के आसरे सागीना महतो को तपन सिन्हा ने रचा । ये समाज के भीतर के विद्रोही पन का उभार था और इसी कड़ी में याद कीजिये फिल्म मुकद्दर का सिकंदर । पूरी फिल्म अमिताभ बच्चन के ही इर्द-गिर्द रेंगती है । हालांकि फिल्म में कई महान कलाकार हैं । विनोद खन्ना और अमजद खान तक । पर फिल्म के शुरू में अमिताभ के लिय़े जो डायलाग कादर खान बोलते हैं वह पूरी फिल्म में अमिताभ का पीछा करती रहती है । और संयोग से ये डायलाग डिलीवरी कब्रिस्तान में है । यानी चाहे अनचाहे कादर खान खुद से [ बचपन की याद ] बाहर 1978 में रिलीज हुई फिल्म मुकद्दर का सिकंदर के वक्त तक बाहर निकल नहीं पाये थे । तो कब्रिसतान में बालक अमिताभ बच्चन जब अपनी मां को लेकर पहुंचते हैं । और रो रहे हैं तब फकीर के तौर पर कादर कान की एन्ट्री होती है । और डायलग के शब्द इसलिये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इसे कादर खान ने ही लिखा । जरा अंदाज देखिये...." किसकी कब्र पर रो रहे हैं। 

[ बालक ] हमारी मां मर गई है । 

[कादर खान] देखो चारों तरफ देखो । इनमें भी कोई किसी की मां । कोई किसी की बहन है । कोई किसी का भाई है । पर शबो गम में मिट्टी के नीचे सभी दबे पड़े हैं । ' मौत पर किसकी रिश्तेदारी है, आज इनकी तो कल हमारी बारी है। 

' बेटे इस फकीर की एक बात याद रखना, जिन्दगी का अगर सही लुत्फ उठाना है तो मौत से खेलो। सुख में हंसते हो तो दुख में कहकहे लगाओ । जिन्दगी का अंदाज बदल जायेगा ।

" जिन्दा हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं, मुर्दों से बदतर हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं।" 

सुख को ठोकर मार, दुख को अपना । अरे सुख तो बेवफा है , चंद दिनों के लिये आता है और चला जाता है । पर दुख तो अपना साथी है , अपने साथ रहता है । 

पोंछ ले आंसू....पोंछ ले आसूं । दुख को अपना ले । तकदीर तेरे कदमों में होगी , तू मुकद्दर का बादशाह होगा .......

और इस लंबे डायलाग के बाद स्क्रीन पर अमिताभ की एन्ट्री होती है जहां वह गीत बजता है ....रोते हुये आते हैं सब ..हंसता हुआ जो जायेगा ....वो मुकद्दर का सिंकदर कहलायेगा । 

उस दौर में शोले और बाबी के बाद सबसे कमाई वाली फिल्म मुकद्दर का सिकंदर ही रही । और सोवियत संघ में जब इस फिल्म ने धूम मचायी तो रुसी कादर खान के डायलाग ही ज्यादा बोलते सुनाई दिये । 

मौत की खबर ने अमिताभ बच्चन को कितना विचलित किया ये 2018 के आखरी दिन मौत की गलत खबर आने पर भी अमिताभ ने ट्वीट कर बेटे सरफराज के हवाले से सही खबर की जानकारी दी । और अगले ही दिन यानी बरस बदलते ही 2019 की पहली खबर कादर खान की मौत की आई तो अपनी सफल फिल्मों की कतार में कादर खान को मान्यता देने से भी अमिताभ ट्वीट करने से नहीं चूके । लेकिन जिन दो कलाकारों की याद ऐसे मौके पर आई उसमें एक कलाकार राजेश खन्ना तो हैं नहीं लेकिन फिल्म रोटी समेत आधे दर्जन फिल्मों में कादर खान के लिखे शब्द ही राजेश खन्ना ने बोले और सुनने वालों ने तालियां बजायी लेकिन यूसुफ भाई [ दिलीप कुमार ] तो जिन्दा हैं पर वह उम्र के जिस पड़ाव पर हैं और जिस बीमारी से ग्रस्त हैं । उसमें वह अपनी कोई प्रतिक्रिया तो दे नहीं पायेंगे और ना ही दे पाये । लेकिन फिल्म सगीना में तो सायरा बानो भी थीं । और अगर सायरा बानो ने दिलीप कुमार को कादर खान की मौत की जानकारी दी होगी तो आंखों में आंसू तो दिलीप कुमार के भी भर आये होंगे ।

(वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी का ये लेख उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)








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