क्यों लिया सुप्रीम कोर्ट ने छोटे “गब्बर” का पक्ष?

आड़ा-तिरछा , , बृहस्पतिवार , 05-07-2018


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वीना

4 जुलाई, 2018 को जनचौक के पहले पन्ने पर एक के बाद एक लगी दो ख़बरों को पढ़ कर पहले तो मुझे हंसी आई। पर फिर उत्सुकता हुई जानने की कि आखि़र मामला क्या है?

पहली ख़बर का शीर्षक है “आरटीआई में खुलासा: लोया केस में महाराष्ट्र सरकार रोहतगी को देगी फीस के तौर पर 1 करोड़ 21 लाख रूपये” 

और दूसरी ख़बर है – “एलजी नहीं केजरीवाल हैं दिल्ली के बॅास - सुप्रीम कोर्ट” अब इन ख़बरों में ऐसा क्या है जो हंसने या सोचने पर मजबूर करता है। इन दोनों ख़बरों से संबंधित मामलों में सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा और बीजेपी मुख्य भूमिका में हैं।

दिल्ली से संबंधित फ़ैसले में कहा गया है कि “हमारे संविधान में तानाशाही या अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है।“ जो लोग जज लोया के मामले में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर नज़र रखते आ रहे हैं उनके लिए सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी जुमले से ज़्यादा कुछ नहीं। 

सीबीआई जज बीएच लोया की हत्या की जांच होनी चाहिये ये चीख़-चीख़कर बयान करते तमाम सबूतों को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा ने अपनी समझ के आधार पर जांच के योग्य नहीं पाया था और जांच मांगने वाली सभी याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया था। जबकि पूरा देश जानना चाहता है कि आखि़र जज लोया के साथ क्या हुआ? क्यों उनकी मौत हुई या फिर उनकी हत्या की गई? 

और इसी फै़सले के लिए जिसे देने का दीपक मिश्रा ने पहले ही मन बना लिया था और जता भी दिया था, महाराष्ट्र सरकार जनता की मेहनत की गाढ़ी कमाई में से 1 करोड़ 21 लाख रूपये फिज़ूल में वकील मुकुल रोहतगी की जेब में ठूसने वाली है। हरीश साल्वे अभी बाक़ी हैं। 

जज साहब वही हैं, संविधान भी अभी तक वही है। और जज साहब के इन दोनों फै़सलों से प्रभावित होने वाली पार्टी भी एक है, भाजपा। पर पहले से दूसरे मामले तक आते-आते जज साहब के अंदाज़ बदल गए हैं। 

पहले मामले यानि जज लोया केस में जस्टिस दीपक मिश्रा शायद खुद को ही संविधान समझने की भूल कर बैठते हैं और फिर अराजकता और तानाशाही की सीढ़ियां बड़े मज़े में चढ़ते जाते हैं। जबकि दूसरे में शायद उन्हें याद आ गया या कि याद करा दिया गया है कि इस देश का संविधान वो या कोई और नहीं संविधान स्वयं ही है। 

इस बदलाव के पीछे आखि़र मामला-माजरा कुछ है या यूं ही जज साहब की समझ का मौसम बदल गया!

जैसे कि आजकल ज़ोर-शोर से बताया जा रहा है कि ये पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान, इंसाफ और अपनी साख़ को दाव पर लगाया हो। पहले भी इंदिरा गांधी आपातकाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट की स्वायत्तता को कटघरे में खड़ा कर चुकी हैं। तो किसी तड़ीपार (जो अब राजनीति का चाणक्य हो गया है) से सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीमों की मोहब्बत हो जाए तो क्या बुरी बात है?

जो भी हो, इससे एक बात तो ज़ाहिर हो गई कि भारत के 70 साल के लोकतंत्र का हासिल ये है कि जनता की औक़ात कुछ नहीं है। इंसाफ यहां बेमानी है। 

संविधान-कानून-व्यवस्था-मिलिट्री-पुलिस सब गब्बर नेताओं के हाथ में लहराता हंटर है। जनता बसंती और तथाकथित वामपंथ अपनी शूद्र मानसिकता से जकड़ा हुआ वीरू है जो दूर खड़ा-खड़ा चिल्लाता रहता है - ”बसंती इन कुत्तों के आगे मत नाचना।“  

आजकल वीरू वामपंथ और जनता बसंती को बसंती की घोड़ी धन्नों (तीसरे मोर्चे) का इंतज़ार है जो गब्बर से जान बचा कर या गब्बर को ठेंगा दिखाकर मदद मांगने भाग गई थी। क्या पता धन्नो एंड फैमिली वीरू वामपंथ और जनता बसंती को गब्बर के ज़ुल्मों सितम से निजात दिलाने का दम रखते हों। कानून ठाकुर और व्यवस्था जय तो पहले ही पाला बदल कर गब्बर के खेमे में आराम फ़रमा रहे हैं। 

ये ख़बरें क्या इस चंबल नौटंकी में फेरबदल की तरफ इशारा कर रही हैं? रमेश सिप्पी की शोले में तो नहीं था पर हमारे लोकतंत्र की शोले स्क्रिप्ट में गब्बर का गुरु भी लाज़िमी है। ये गुरु न हो तो लोकतंत्र के शोलों का समाजवाद की राख में तब्दील होने का ख़तरा बना रहता है। 

गब्बर के ये गुरु (अडानी-अंबानी, टाटा-बिड़ला आदि-आदि) ही बताते हैं कि समाजवाद ऐसी राख है जो तब बनती है जब टैलेंट के अंगारों पर बराबरी का पानी उड़ेल दिया जाता है। तब क्रिएटिविटी और अविष्कार मर जाते हैं। समाजवाद में ठाकुर-गब्बर जय-वीरू एक हो जाएंगे और जनता बसंती से कहेंगे - “जा तू आज़ाद है…नाच या मत नाच…तेरी मर्जी़।“

इसलिए गुरु गब्बर को समझाते हैं कि समाजवाद का शोले बोरिंग आईडिया है। इस पर किसी को दांव नहीं लगाना चाहिये। लोकतंत्र के शोले में एक्शन है, कॅामेडी है, ड्रामा है, विलेन हैं, हीरो-हीरोइन हैं, कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं। पनामा है, स्विट्ज़रलैंड है। तोप हैं, एटम-परमाणु बम हैं, पाकिस्तान है, अमरीका है, चीन है। फुल मनोरंजन! 

और इसीलिए गब्बर और उसके गुरु दांव लगाते हैं लोकतंत्र के शोले पर। लोकतंत्र के शोले में गब्बर एक राज सिंहासन है। कोई व्यक्ति विशेष नहीं। जैसे स्वर्ग में इंद्र किसी देवता का नाम नहीं।  जो स्वर्ग की गद्दी पर बैठता है उसे इंद्र कहा जाता है। 

लोकतंत्र के शोले में गुरुओं-गब्बरों का रिश्ता बदलता रहता है। कब किस वैराइटी का गब्बर चाहिये ये गुरुओं की मर्ज़ी। कभी उन्हें गूंगा गब्बर रास आता है। कभी 56 इंच का बड़बोला। और कभी अगर बसंती (जनता) चकमा दे दे तो धन्नो और उसका परिवार भी बाज़ी मार सकते हैं। पर गुरु सबके गुरु हैं। धन्नो एंड पार्टी के गब्बरों के भी। 

पहली ख़बर में जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में बीजेपी, अमितशाह, मोदी के हक़ में फैसला दिया गया था। जबकि कानून और संविधान ने इसकी इजाज़त उन्हें नहीं दी थी। यानि ठाकुर गब्बर (मोदी) के बाल (अमितशाह) को भी नहीं छू सकता। जब तक कि गुरुओं का गब्बर से दिल न भर जाए।

जस्टिस दीपक मिश्रा सुप्रीम कोर्ट में अपनी मनमानी चला रहे थे। इस बात का पता देश-दुनिया को तब चला जब सुप्रीम कोर्ट के ही चार वरिष्ठ जज मीडिया के सामने आए। क्योंकि वो संविधान और लोकतंत्र की ऐसी-तैसी होते देख नहीं पाए। चारों जज जब जस्टिस दीपक मिश्रा को देश के संविधान-कानून का सम्मान करने के लिए न मना सके तो मीडिया के सामने सुप्रीमकोर्ट के कीचड़ को उड़ेल दिया।

बजाय इसके कि जस्टिस दीपक मिश्रा ये कीचड़ साफ़ करते, दिन-ब-दिन उसमें लमलेट होते चले गए। नियम के हिसाब से बेंच बनाने का मामला हो, मोदी एंड पार्टी से जुड़े मामले या सुप्रीम कोर्ट में नए जजों की नियुक्ति। हर मामले में वो मोदी-अमित शाह की हां में हां मिलाते रहे।

अमितशाह उनको और देश को बताते रहे कि सुप्रीमकोर्ट में जो हो रहा है संविधान के हिसाब से हो रहा है। 

ऐसी पार्टी जिसकी छवि दंगा पार्टी की हो उसका अध्यक्ष जो तड़ीपार का तमगा साथ लिए घूमता हो, जिस पर हत्या के साथ-साथ और भी अपराधों के मुकदमें चल रहे हों। जो 2002 में अपने साहेब के साथ गुजरात में मुसलमानों को चुन-चुनकर तलवार-त्रिशूल, गैस सिलेंडर, टायर-पेट्रोल से जलवा-मरवा-कटवा रहे थे। उनकी औरतों-बच्चियों के साथ बलात्कार करवा, कोख चिरवाकर बच्चों को तलवार की नोक पर सजवा रहे थे। जिनके सिपहसालार छोटे-छोटे मासूम बच्चों को दीवारों से दे-देकर मार उनके चिथड़े बिखेर रहे थे वो, देश को बता रहे हैं कि उनके राज में जो होता है सब संविधान के मुताबिक होता है!

पर दूसरी ख़बर में जस्टिस मिश्रा बीजेपी के गब्बर यानि मोदी सरकार को चुनौती दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है – “दिल्ली के उप राज्यपाल स्वतंत्र तरीके से काम नहीं कर सकते हैं। वे दिल्ली सरकार के नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। उनको मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह लेनी चाहिए”। फैसले में कहा गया है कि “हमारे संविधान में तानाशाही या अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है।“ चलो! जस्टिस दीपक मिश्रा को याद तो आया (भले ही गुरुओं ने इशारा किया हो) या अब पता तो चला कि हमारे संविधान में तानाशाही या अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है।

ऊपर की दोनों ख़बरों से दो बातें निकलकर आती हैं। एक तो ये कि लोकतंत्र के शोले में आपातकाल की स्थिति है और गुरुओं में वर्तमान गब्बर को भूतकाल में पहुंचाने पर विचार हो रहा है। या  वर्तमान गब्बर को बनाए रखने के लिए दिल्ली के “लिटिल” गब्बर को फिर नचाया जाएगा। नाच मेरी जान… ऐसी-वैसी, लंगड़ी-टूटी चाहे जैसी हो पर कुर्सी मिलेगी!!! 

(वीना पत्रकार, व्यंग्यकार और फिल्मकार हैं।)



 




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Himmat Singh :: - 07-06-2018
शानदार लिखा है