चली गई वह धार

स्मृतिशेष , , शनिवार , 13-01-2018


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राम जन्म पाठक

बमुश्किल दस-बारह दिन पहले फेसबुक पर यह खबर सरासर कर दौड़ी कि दूथनाथजी कैंसर से ग्रसित हैं। इस खबर में आश्चर्य करने जैसा कुछ नहीं था, क्योंकि यह रोग जिस तरह से फैल रहा है, लगता है कि जूड़ी-बुखार जैसा ही कोई रोग हो यह। लेकिन सच यही है कि यह रोग पचास साल पहले जितना सांघातिक था, आज भी उतना ही है। तमाम ज्ञान-विज्ञान अभी इसके आगे नत-मस्तक है। अगर इसे ‘डेथ-वारंट’ कहा जाता है, तो यह सचमुच वैसा ही है। मुझे सचमुच चिंता हुई क्योंकि वे एक तरह से मेरे ‘कथा-गुरू’ थे। मैंने एक इलाहाबादी मित्र से इसकी तस्दीक की तो उसकी प्रतिक्रिया कुछ उलट थी। इसकी वजह भी है कि वे इलाहाबाद में हमेशा एक ‘संदिग्ध’ और विवादास्पद व्यक्ति बने रहे। 

इलाहाबाद उन्हें जितना मान-सम्मान देता था, उतना ही उनसे चिढ़ता भी था। लेकिन एक हफ्ता पहले जब मैंने प्रोफेसर राजेंद्र कुमार से इसकी चर्चा की तो उन्होंने इस रोग की पुष्टि कर दी, तब मुझे तगड़ा झटका लगा था। मैं समझ गया था कि वे अब बस एक ‘अटका हुआ पत्ता’ भर हैं। और यह ‘पीत-पात’ जब 11 जनवरी की रात झर गया तो कोई अचरज नहीं हुआ। जानकर सिर्फ दुख हुआ, एक गहन दुख। दूधनाथजी के जाने से सिर्फ इलाहाबाद का ही नहीं, साहित्य का भी एक बड़ा कोना सूना हो गया है। वे साठोत्तरी कहानी के अजातशत्रु, एक अवांगर्द, एक चुनौतीबाज कथाकार और खिली-खिली और निहायत ललकारने वाली भाषा के अगुआ थे। आखिरी दम तक वे अखाड़े में जमे रहे और साहित्य में हर नई चीज पर उनकी पैनी नजर थी।

मैंने उनका एक इंटरव्यू लिया था ‘आखिरी कलाम’ छपने के बाद, वीरेन डंगवाल के कहने पर। इलाहाबाद कॉफी हाउस में वे झूंसी से चल कर आए थे। उन्हें हर नई चीज की जानकारी रहती थी। उन्होंने इस इंटरव्यू में कहा था,‘ मैं परफेक्शनिस्ट हूं, चाहे कुर्ता-पैजामा ही क्यों न सिलाना हो। हिंदी में आज मुझसे बड़ा लेखक कोई नहीं, मेरी जैसी बखानने की कला किसी के पास नहीं ।’

जब उदय प्रकाश कहानी जगत में धूमकेतु की तरह उभरे, और उनकी ‘और अंत में प्रार्थना’ हंस में छपी, तब मैं उनसे कभी-कभार मिलता रहता था, मैंने लक्ष्य किया- वे अचानक बहुत खुश थे। लेकिन उन्होंने शायद यह भी मान लिया कि इस प्रतिभाशाली कलमकार से भिड़ना कठिन है। उदय प्रकाश जैसी नई दृष्टि और बाजार की समझ उनके पास नहीं थी। दूधनाथजी का 'हल-फावड़ा' पुराना था, जबकि उदय प्रकाश के पास ‘टैक्टर’ आ गया था। तब दूधनाथजी ने अपना इलाका बदल लिया और ‘नमो अंधकारं’, ‘बहिर्गमन’ जैसी व्यक्ति हंता और चरित्र-मारक कहानियां लिखने लगे। उनके पास पंत, शमशेर, निराला आदि से सीखी हुई तत्सम, तद्भव और उर्दू-अंग्रेजी की शब्दावली को समेटे ऐसी अद्भुत भाषा थी, जिसके बल पर वे तमाम खाई-खंदक पार कर जाते थे। जहां बना तो सीधे-सीधे, नहीं भाषा का दरेरा देकर। कई जगह वे भाषा से नायाब ढंग से खेलते हैं, ऐसे कि किसी को भनक तक नहीं लगे।

दूधनाथ सिंह की कई छवियां हैं। एक जगह वे एक शिक्षक की तरह धीर-गंभीर नजर आते हैं। लेकिन इसी के बरक्स एक और छवि है लेखक की। सामान्य तौर पर देखिए तो शिक्षक और लेखक, दोनों में बहुत समता है। लेकिन एक और तल है, जहां दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। शिक्षक होने के लिए कठोर अनुशासन, अगाध मर्यादा चाहिए। लेखक के लिए वर्जना- मुक्ति और नवाचार पहली शर्त है। वे जनम पर इन दोनों के बीच सेतु बनाने का काम करते रहे। लेकिन, उनका लेखक, उनके शिक्षक पर हावी है। ऊपर से इसमें कोई द्वैत नजर नहीं आता। लेकिन वह है। इसीलिए वे अक्सर अपनी कहानियों में तमाम वर्जनाओं को तोड़ते नजर आते हैं, जो एक शिक्षक के लिहाज से घाटे का सौदा होता है।

वे मर्यादाएं नहीं तोड़ते तो एक स्कूली मुदर्रिस होकर रह जाते। वे कहते थे, ‘ मुझे तोड़-फोड़ चाहिए। मुझे तोड़-फोड़ वाली कहानियां और कविताएं अच्छी लगती हैं।’

दरअसल, वे जिस गांव और गरीबी से उठकर आए थे, उसमें थोड़ा जटिल और चंट हो जाना स्वाभाविक था। वे ऐसे नहीं होते तो शायद खेत रहते।

उनका बहुत सारा समय इलाहाबाद में बीता। और इलाहाबाद किस तरह का शहर है, यह उन्होंने अपनी ‘लौट आ ओ धार’ में लिखा है,

‘ इलाहाबाद आदिवासी मुसहर प्रजाति का शहर है। कीचड़ और दलदल में सोंटा गड़ा-गड़ा कर ये मुसहर आपको खींच कर बाहर निकाल लेते हैं। अगर आप ज्यादा फन काढ़ रहे हैं और डंसने को आकुल-व्याकुल हैं तो खट से इलाहाबादी मुसहर एक पत्थर की पटिया निकालेगा । आपका फन और जहर घिस कर आपको कंधे पर डाल लेगा और चलता बनेगा। उसके बाद भी अगर आप उसे डंसने की ताकत रखते हैं तो वह कंधे से उतारकर आपको स्थापित करेगा और कहेगा, ‘ हे नाग देवता। मेरा गद्गद् प्रणाम, कृपया ग्रहण करें।’

दूधनाथजी की शिष्यावली की पहली ‘आरबिट’ में मैं भले नहीं था, लेकिन इलाहाबाद में रहने के दौरान उनका थोड़ा-बहुत नेह और आत्मीयता की आंच मुझे मिलती रहती थी। पूरे इलाहाबाद में एक वही थे, जिनके लिए मैं ‘राम जनम’ था, बाकियों के लिए पाठकजी और दोस्तों के लिए पठकवा। मैंने अपनी कुछ कहानियां उन्हें सुनाईं और उनके कहने पर कुछ बदलाव भी किए। वे बहुत मनोयोग से सुनते थे और नए लोगों को प्रोत्साहित भी करते थे। कम से कम मुझे उन्होंने कभी हतोत्साहित नहीं किया। इलाहाबाद में दूसरे लेखकों को मैंने देखा है कि वे कहते थे, ‘रख जाओ, पढ़ लेंगे।’ और महीनों चुप्पी साधे रहते, कुछ बताते ही नहीं थे। लेकिन, दूधनाथजी तत्पर रहते थे, हर वक्त। एक बार मैं हाईकोर्ट के पीछे वाले उनके घर की दालान में कहानी का वाचन कर रहा था, वे सामने बैठे थे। 

मेरी आवाज बहुत ऊंची हो गई, सामने वाले घर की कोई लड़की बाहर निकल आई और उसे कुछ अटपटा लग रहा था शायद। लेकिन उन्होंने मुझे टोका नहीं। बाद में बताया – ‘तुम्हारी आवाज बहुत ऊंची थी।’ वे जनम भर लेखक रहे थे, वे जानते थे कि पढ़ते समय किसी को टोकना सिर्फ रोकना नहीं है, बल्कि उसे आहत करना है। वे बाज दफा जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हो जाते थे और बाज दफा जरूरत से ज्यादा क्रूर। मैंने अपने एक साथी अरविंद को उनके बारे में बहुत तीखी प्रतिक्रिया करते सुना है। उनके व्यक्तित्व का द्वंद्व था। मैंने उनके भीतर वीतरागियों जैसी निस्पृहता, दार्शनिकों जैसा औदात्य और दुखी गृहस्थों जैसा औदास्य भी देखा है। यों दुख उन्हें कुछ नहीं था, कम से कम आर्थिक दुख। लेकिन जमाने का गम उन्हें था, उनकी लेखनी बताती है।

इसी हफ्ते मेरा पहला कहानी संग्रह आया है। मैं उन्हें भेंट करना चाहता था। वे खुश नहीं, बहुत खुश हो जाते। मैं जानता हूं। मेरी भेंट स्वीकार किए बगैर वे चले गए।

इस ‘कथा-गुरु’ को क्या कहूं ।

‘आखिरी कलाम’ को आखिरी सलाम। 

(लेखक जनसत्ता में एसोसिएट एडिटर पद पर कार्यरत हैं और ‘बंदूक’ नाम से उनकी कहानियों का पहला संकलन आज ही प्रकाशित हुआ है।)

 










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