कोई कैसे आपको भूल सकता है, प्रणव दा!

श्रद्धांजलि , , रविवार , 29-07-2018


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मनोज भक्त

नक्सलबाड़ी आंदोलन के एक अप्रतिम साथी को हमने खो दिया है। जनता की पगध्वनि सुनकर हजारों छात्रों-नौजवानों ने कॉलेज और कैरियर को ठुकरा कर हमेशा के लिए खुद को इस आंदोलन का हिस्सा बना लिया था। उस वक्त कॉ विनोद मिश्र, कॉ. धुर्जटी प्रसाद बक्सी (प्रणव दा) और कॉ बीबी पांडे (अभी समकालीन लोकयुद्ध के संपादक और कंट्रोल कमीशन के अध्यक्ष) आरई कॉलेज दुर्गापुर के छात्र थे। ये भी उन्हीं छात्रों में से थे। भीषण दमन से आंदोलन ठिठक गया था। राज्य प्रायोजित हत्याओं से देश में आतंक फैलाया जा रहा था और अंतत: आपातकाल में जनता के अधिकारों को छीन लिया गया था। लेकिन ये रुके नहीं। अंडर ग्राउंड होकर इन्होंने आंदोलन को फिर खड़ा किया। पार्टी को फिर से तैयार किया। कॉ प्रणव दा ने एक दक्ष नेता और संगठक की हैसियत से भारत के कई हिस्सो में पार्टी संगठन तैयार करने में निर्णायक भूमिका निभायी। खुली पार्टी के रूप में भाकपा माले को क्रांतिकारी जन पार्टी के रूपांतरण में विशिष्ट योगदान किया। आज जब फासीवाद के खिलाफ फैसलाकुन लड़ाई की ओर जनता बढ़ रही है, प्रणव दा का जाना गहरे तौर पर विचलित करता है। यह एक बड़ी जिम्मेवारी हम सबके सामने ले आयी है।

यह कोई अनहोनी नहीं थी। हम सब को पता था कि प्रणव दा – कॉ धुर्जटी प्रसाद बक्सी जी हमारे बीच बस अब कुछ ही दिन हैं। वे फिर लौटकर साथियों से पूछने वाले नहीं हैं कि मुझे भूल तो नहीं गए! हेपेटाइटिस बी से जंग करीब-करीब वे जीत ही चुके थे। वे हमेशा की तरह अपनी जिम्मेवारियों के साथ सामान्य थे। उनकी जिम्मेवारियां भी आसान नहीं थीं। आज के बंगाल में उन्हें वाम आंदोलन के निर्माण में खास भूमिका लेनी थी। मजदूर आंदोलन को इस फासीवादी दौर से निपटने के लिए सक्षम भी करना था और उसमें धार भी देनी थी। उनकी जिम्मेवारियों को इस तरह अलग-अलग कर देखने में आसानी होती है, लेकिन वे पार्टी के एकीकृत कार्यभार से इस कदर जुड़े थे कि वो क्षेत्रों, विभागों और जनसंगठनों के विभाजनों को सीमा नहीं बनने देता था। 

अभी हाल में पार्टी महाधिवेशन ( 23-28 मार्च, 2018, मनसा, पंजाब) को सफल करने के लिए वे पूरी सक्रियता और उत्साह के साथ लगे थे। हालांकि अब लग रहा है कि उस समय भी वे इस होनी से जूझ रहे थे। लेकिन उसे जबरन पीछे धकेल रहे थे। उनका वजन कम हो गया था। चेहरे पर हमेशा की तरह मौजूद आतिथ्य की आड़ में वे कुछ छिपा रहे थे। 24 मई को डॉ समीर का फोन आया कि प्रणव दा का किसी बेहतर कैंसर हॉस्पिटल में ईलाज जरूरी है। उस समय तक के टेस्ट से डॉक्टरों को आशंका थी कि उन्हें लीवर कैंसर है। फिर एक के बाद दूसरे टेस्ट ने उस आशंका की पुष्टि कर दी। यही नहीं, बक्सी जी को घेरे में ले चुकी इस जानलेवा बीमारी के ईलाज के रास्ते करीब-करीब बंद हो गये थे। उनकी शरीर की हालत ऐसी नहीं थी कि केमियोथेरेपी या रेडियोथेरेपी की जा सके। एक बार उनकी हालत बिगड़ी तो उन्हें कोलकाता स्थित पीजी के एसएसकेएम में भर्ती किया गया।

कामरेड डीपी बक्शी की अंतिम विदाई।

फिर वे धीरे-धीरे बात करने लगे। लगा कि सब ठीक हो गया है। इस बीच लोग विभिन्न राज्यों से आकर उनसे मिल रहे थे। सभी को मालूम था कि यह ‘ठीक होना’ धोखा भर है। वे पार्टी की बातें करते। लोग जानते थे कि ईलाज में पाबंद कॉ. बक्सी जी के लिए सक्रिय गतिविधियों से अलग होना कैंसर की पीड़ा से भी भारी था। कॉमरेड आपस में बक्सी जी के बारे बच-बचा के बातें कर रहे थे। मीटिंगों में जरूरी सूचना के बतौर उनके स्वास्थ के बारे में बातें रखी जा रही थीं। डॉक्टरों के ब्रीफ को बताया जाता। लेकिन इन सबके पीछे कॉमरेडों के अंदर नहीं पलटने वाली इस होनी के साथ कशमकश चल रही थी। 26 जुलाई को कोलकाता के एसएसकेएम वार्ड में बक्सी जी भोर-अंधेरे 2.35 बजे अटूट निद्रा में सो गए।

कॉमरेड जयंत गांगुली की अकस्मात मौत के बाद उन्हें 1995 में झारखंड (उस समय यह बिहार का ही हिस्सा था) के राज्य प्रभारी के रूप में जिम्मेवारी मिली। झारखंड अलग राज्य आंदोलन पार्टी का एक महत्वपूर्ण ऐजेंडा था। पार्टी के पास कॉ महेंद्र सिंह जैसे करिश्माई नेतृत्वकारी साथी थे। जादू जनता की ताकत में होता है और करिश्मा परिस्थितियां अपने साथ लेकर आती हैं। कॉमरेड महेंद्र सिंह लगातार जूझने और साहस के साथ नेतृत्व देकर इसे सच में बदल देते थे। अनुभवी साथियों का एक जत्था था। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह था कि पार्टी के पास नौजवानों का एक बड़ा जत्था पार्टी में शामिल हो रहा था। आज इन गुजर चुकी स्थितियों पर एक नजर डालने से लगता है कि कॉमरेड बक्सी ने झारखंड में पार्टी को तैयार करने के लिए बहुआयामी योजना पर काम किया। पार्टी कतारों में मार्क्सवाद-लेनिनवाद की बुनियादी समझ की पुख्ता नींव के लिए कई स्तरों पर अध्ययन-कक्षाओं का संचालन किया। तो झारखंड आंदोलन और झारखंड के बारे में एकीकृत समझ के लिए उस पर पुस्तिकाओं को तैयार करने और आंदोलनों को हर स्तर पर गति देने के लिए एजेंडा तय करने का दुष्कर काम किया। उन्होंने झारखंडी लोक संस्कृति के पहलुओं पर पार्टी की पकड़ को बढ़ाने के लिए दो दिवसीय बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन का नेतृत्व किया। 

देश की घटनाओं, पार्टी की केंद्रीय कमेटी के विचारों और देश के महत्वपूर्ण आंदोलनों से नेतृत्वकारी कमेटी को बावाकिफ रखना उनके काम का अभिन्न हिस्सा रहता था। एक बार किसी कार्यक्रम पर फैसला होने के बाद हर स्तर पर साथियों के साथ मिलकर उसका डिटेल्स तैयार करते थे। उसके अमल और उसके विकास पर नजर रखते। यह काम धैर्य का और उससे भी अधिक कदम-कदम पर खुद को सही करने का होता है। हममें से कई के लिए यह खासा कठिन होता है जब अपने खींचे हुए खाके में दूसरे साथी तब्दीली करते हैं। वे सिद्धांतों के विशिष्ट प्रयोगों पर जोर देते थे। विभिन्न मुद्दों पर खास तरह के अभियान और आंदोलनों पर। संताल परगना का बंटाईदारी आंदोलन या कोलियरियों में असंगिठत मजदूरों और कोयले सायकिल पर लादकर बेचनेवालों के साथ नियमित मजदूरों की एकता और आंदोलन का विकास, सामंती दमन के इलाकों में जनसंघर्षों के निर्माण को उन्होंने इन प्रयोगों के जरिये गति दी।

अंतिम विदाई।

झारखंड अलग होते वक्त तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने झारखंड को आदर्श पुलिस राज्य बनाने की घोषणा की थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने तेजी के साथ इस पर अमल करना भी शुरू कर दिया। झारखंड को पुलिस कैंप बना दिया गया। जगह-जगह पुलिस फायरिंग शुरू हुई। आंदोलनों को बेरहमी से कुचला जाने लगा। तपकरा में सात आदिवासियों समेत आठ लोगों को पुलिस ने मार दिया क्योंकि वे विस्थापन का विरोध कर रहे थे। इसके खिलाफ भाकपा माले के विधान सभा घेराव पर हमला किया गया। भाकपा माले महासचिव कॉ दीपंकर भट्टाचार्य समेत कई आंदोलनकारियों को बुरी तरह से घायल कर जेल भेज दिया गया। इस पूरे दौर में पार्टी को फिर आक्रामक कर आंदोलन खड़ा करने में कॉ महेंद्र सिंह और कॉ डीपी बक्सी की बड़ी भूमिका रही।

कॉ. डीपी बक्सी ने असम, ओडीसा, दक्षिण भारतीय राज्यों में संगठन विस्तार के महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम दिया। उन्होंने उड़ीसा में चिल्का झील पर टाटा और नियमागिरी में वेदांता के कब्जे के खिलाफ के साझे आंदोलनों में पार्टी का नेतृत्व किया। कॉ नागभूषण पटनायक के साथ भी उन्होंने बहुत दिनों तक काम किया। उनकी देख-रेख में ओडीसा के कोरापट-रायगड़ा-गजपति इलाकों और पुरी जिले में भाकपा माले विकसित हुई और उसने ढेर सारी वाम कतारों को भी अपनी ओर आकर्षित किया। 

कॉ. डीपी बक्सी ने अपने अनुभव, जानकारी और उम्र को नौजवानों के साथ घुलने-मिलने में कभी बाधा नहीं बनने दिया। निजी जीवन सार्वजनिक जीवन के मातहत होता है- कम्युनिस्ट पार्टी में यह किताबी उसूल नहीं होता। हमारे ज्यादातर साथी कठिन परिस्थितियों और तंगहाल पारिवारिक और निजी जीवन के साथ पार्टी और जनकार्य में लगे रहते हैं। कई बार वे भावनात्मक स्तर पर भी तनावों का शिकार हो जाते हैं। कॉ. बक्सी ऐसे साथियों से मिलते थे और उनकी कठिनाइयों को साझा करते। साथियों के साथ उनका यह संबंध हमेशा बना रहता। महिला साथियों के विकास पर वे जोर देते और आंदोलन में भागीदारी के लिए उन्हें उत्साहित करते। वे कहते थे कि सीखने के लिए जरूरी है कि आपका दिमाग दूसरों के विचारों-सुझावों को समझने के लिए तैयार हो। आप अपनी ही जानकारियों-योजनाओं और अनुभवों के बोझ से दबे हैं तो नयी स्थितियों और लोगों से आप कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे। वे खेलों में रूचि लेते। इसमें हमेशा अद्यतन रहते। बांग्ला साहित्य-कला में भी उनकी गहरी रूचि थी। 

इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र जीवन से लेकर लंबे समय तक पार्टी के पॉलित ब्यूरो के सदस्य रहे। कॉ डीपी बक्सी के क्रांतिकारी जीवन में भीषण दमन को मात देने से लेकर जनांदोलनों की जीत की बेशकीमती उपलब्धियां भरी पड़ी हैं। 17 मई 1948 को बंगाल के चुचड़ा में उनका जन्म हुआ था। उनकी पत्नी मलिना मजबूत क्रांतिकारी कम्युनिस्ट हैं और बेटी मधुरिमा भी जुझारू एक्टिविस्ट हैं। मैं उनसे उनके झारखंड प्रभारी बनने के बाद ही परिचित हो पाया और झारखंड के दायरे में ही सीमित होने की वजह से मैं उनके सीमित पहलू से परिचित हूं। मानसा में मैंने उनसे स्वास्थ्य के बारे में पूछा था। उन्होंने कहा कि ये सब छोटा-मोटा चलता ही रहता है। फिर हम लोगों ने कुछ देर तक पंजाब के साथियों द्वारा बेहतर इंतजाम और गर्मजोशी के बारे में बात क। लेकिन इसी तरह की हल्की-फुल्की बातें। फिर एसएसकेएम के उस कमरे में जहां वे अभी-अभी ठीक महसूस कर रहे थे। हंस कर बातें कर रहे थे। मैंने ठीक होकर उन्हें गिरिडीह आने को कहा। उन्होंने कहा, ‘आना ही होगा, भाजपा के खिलाफ अच्छी तैयारी करनी होगी।’

..और कोई वक्त होता तो शायद समय तय होता, टेंटेटिव ही सही। पर इस वक्त नहीं हो पाया। मेरी बात कमजोर थी। मैं असमंजस में था कि क्या ऐसा भी हो सकता था। उनकी बातों में जोर क्यों था! क्या जाने उन्हें पता था या नहीं!

(मनोज भक्त सीपीआई (एमएल) के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं। और आजकल झारखंड में रहते हैं।)


 








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