ठेका के भरोसे उच्च शिक्षा

सम-सामयिक , नई दिल्ली , शुक्रवार , 22-09-2017


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मुकेश कुमार

नई दिल्ली। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक खबर फैली। जिसमें मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से देश भर के विश्वविद्यालयों को निर्देश जारी किया है कि वो अपने यहां सालों से खाली पड़े शिक्षको के पदों को अनुबंध या ठेके के आधार पर रिटायर्ड शिक्षकों से जो अभी 75 साल से कम उम्र के है उनसे भरकर काम चला ले। एक तरफ तो वर्तमान सत्ता राज्यों के स्तर पर जहां-जहां भी भाजपा शासित राज्य है वहां यह कहकर रिटायरमेंट की उम्र कम कर दी गई है कि इससे युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। दूसरी तरफ यही सरकार फरमान जारी कर रही है सारे रिटायर्ड लोगों को ही दोबारा नौकरी दे दो और युवाओं या यूं कहे कि अधिक जरुरतमंदों को बाहर निकाल दो? सरकार की इस दोहरी नीति को कैसे स्वीकार किया जा सकता है?

हम यहां उस वायदे की बात नहीं कर रहे हैं जिसे खुद हमारे प्रधानमंत्री जी ने देश की 130 करोड़ आबादी के सामने बाछें फैला-फैलाकर किया था कि वो हर साल देश में दो करोड़ नए रोजगार पैदा करेगें? यहां तो दरख्वास्त मात्र इतनी भर है कि जनाब जब आप नए रोजगार पैदा करेगें तब की तब देखी जाऐगी, अभी तो जो पहले से पैदा हुए रोजगार है इन पर ही पक्की नौकरी दिलवा तो बड़ी मेहरबानी होगी?

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर

विश्वविद्यालयों में पचास फीसदी शिक्षक पद रिक्त

देशभर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सालों से 50 फीसद से भी अधिक शिक्षकों के पद खाली पड़े है। अकेले दिल्ली विश्वविद्यालय में कुल 9500 पदों में से करीबन 5000 से अधिक पदों पर 8-10 सालों या इससे भी अधिक समय से बतौर एडहाक शिक्षक काम कर रहे हैं।   दिल्ली विश्वविद्यालय के एडहॉकिज्म में भी हायर एंड फायर, बाई हुक और बाई कुक, भयंकर गलाकाट प्रतियोगिता हर दिन छिड़ी सी रहती है। शिक्षक यूनियनें भी अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में शिक्षा व शिक्षकों के असल मुद्दों से अक्सर भारतीय रेल की तरह पटरी से उतरी ही दिखाई देती है। राजनीति की तरह शिक्षण-संस्थाओं में भी भाई-भतीजावाद अपने चरम पर है। 

शिक्षण-संस्थाओं में बरसों से जारी ठेका प्रणाली ने एक शिक्षक का मान सम्मान, उसकी गरिमा और आत्मविश्वास को लगभग खत्म सा कर दिया है। वैसे कानूनन हर 4 महीनें गुजरने पर इन शिक्षकों के काम की समीक्षा होती है जिसके आधार पर अगले 4 महीनें के लिए इनको फिर नियुक्ति का एक प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। पर ये पूर्णतः बड़े मालिक यानि कालेज प्राचार्य और छोटे मालिक यानि विभागाध्यक्ष की इच्छा पर निर्भर करता है कि वो कभी भी किसी भी पुराने की जगह अपनी पसंद के नए दास नियुक्त कर सकता है? कई बार तो इस पसंदगी व नापसंदगी में जेंडर भी बड़ा खेल, खेलता है। इनके लिए कुछ अघोषित नियम है जैसे कालेज के मामलों में चुप रहना, कोई भी सुझाव व अपने विचार व भावनाएं न व्यक्त करना, हर स्थाई शिक्षक की हर बात मानना, सबको नमस्ते करना है और हद दर्जे तक सबकी चापलूसी करना। ये एडहॉक के लिए एक तरह का कोड ऑफ कन्डक्ट या यूं कहे कि ये कुछ बाईलॉज है जिनकों हरेक एडहॉक को सामान्यतः मानना ही होता है, विशेषतः आज की वर्तमान व्यवस्था में।

इस प्रथा में चलित प्रक्रियाओं से कई बार शिक्षक को खुद पर संदेह होने लगता है कि वो खुद एक शिक्षक है भी या नहीं। क्योंकि अक्सर स्टाफरूम में स्थाई शिक्षक बारम्बार बताते-कहते पाए जाते है कि ये तो एडहॉक है, स्टाफरुम में चाय बनाने वाला स्थाईकर्मी भी इनको शिक्षक कम ही मानता है, कक्षा में छात्र स्वयं बता देते है कि सर आप तो एडहॉक ही है ना। अब तो कई बार व्यवहार में ऐसा सा लगता है कि एडहॉक और शिक्षक में वैसा  संबंध दिखता है जैसा आजकल भारत व पाक के बीच बना हुआ है?  

 दिल्ली विश्वविद्यालय

नए फरमान से हलकान एडहॉक शिक्षक

सरकार के इस नए फरमान ने तो दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत 5000 से अधिक एडहॉक शिक्षक व इनके परिवारों के प्राण पखेरू से उड़ा रखे हैं। कहां तो एक तरफ ये सालों से इस उम्मीद में खप रहे है स्थाई रोजगार मिलेगा और कहां सरकार यह भी छिनने पर उतारू है? खबर मात्र इतनी नहीं है कि खाली पदों को रिटायर्ड शिक्षकों से भर लो बल्कि सबसे अधिक खतरनाक मामला ये है कि इसकी आड़ से सरकार कालेजों व विश्वविद्यालयों में शिक्षकों को पूर्णतः ठेके पर भर्ती करना चाह रही है। पिछले 8-10 सालों से तो भर्ती पर सरकारी पाबंदी है ही अब एडहाक प्रणाली को भी खत्म कर इसमें भी ठेकेदारी प्रथा ठूसी जा रही है। सरकारें अपना पल्ला झाड़ते हुए शिक्षा व शिक्षण कार्य को पूर्णतः निजी मुनाफाखोरों को सौंपने की जबरदस्त फिराक में है। 

आज लगभग एडहॉक शिक्षक की वैसी सी ही दशा है जैसी भारतीय समाज में महिलाओं और दलितों की है। जिसके साथ कभी भी, कहीं भी, कोई भी कुछ भी खिलवाड़ करने का पूर्ण अधिकार रखता है। 

शिक्षा से हो रहा खिलवाड़

महिला शिक्षकों का शोषण

महिला शिक्षको के शोषण के अनेकों मामले हमारे सामने हैं जहां उनको न चाहते हुए अनेकों मामलों पर समझौते करने पड़ते हैं क्योंकि नौकरी का सवाल जो है? उस शिक्षक के बारे में कौन सोचेगा जो आज उम्र के 40वें पड़ाव में है और इस उम्मीद में है कि पक्की नौकरी मिलेगी तो शादी करूंगा, बच्चें पैदा करूंगा और उन्हें अच्छी शिक्षा प्रदान करूंगा। कईयों को नौकरी जाने के भय से गर्भपात तक कराना पड़ जाता है क्योंकि मैटरनिटी लिव को कोई प्रावधान महिला शिक्षकों के लिए नहीं है? दिल्ली के हजारों व देशभर के लाखों ऐसे शिक्षकों की बेकही यह पीड़ा आखिर किसी के मन की बात क्यों नहीं बन रही है? आखिर कब तक हमारे आधे-अधूरें, अनपढ़ टाइप हुक्मरान इन उच्च शिक्षित शिक्षकों के जीवन व भविष्य को   लीलते रहेगें?  

रोस्टर प्रणाली की खामियां

डीयू का रोस्टर प्रणाली एक ऐसी व्यवस्था है जिसे विश्वविद्यालय व कालेज स्तर पर हर प्रभावशाली व्यक्ति जैसे प्राचार्य, विभागाध्यक्ष इसे अपनी तरह से मोड़ता-तोड़ता रहता है? रोस्टर मामले पर पूरे डीयू के 80 कालेजों में कोई एकरूपता नहीं है? हर जगह हर कोई रोस्टर का ही रोना रोता रहता है। इसको एक ऐसा भूल-भूलैया बना दिया गया है जिसमें हर कोई भटका ही रहता है? जब देश की राजधानी स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय डीयू का ये हाल  है तो हम अंदाज लगा सकते हैं कि बाकि देश में क्या अंधेरगर्दी मची होगी? कायदे से इसकी भी सीबीआई जांच होनी चाहिए? इस पर भी कोई ऐसी बाहरी कमेटी बने जो साल में कम से कम दो बार हर शिक्षण संस्थान के रोस्टर को चैक करे

आज जरूरत है देश के छात्र-शिक्षक समुदाय को अपने मान-सम्मान के लिए, अधिकारों के लिए, देश की शिक्षा व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने से बचाने के लिए, शिक्षा के सार्वजनिकरण के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने व लड़ने की।   

 

 










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