संपादक का चश्मा और खबरों का रंग

आड़ा-तिरछा , , मंगलवार , 17-04-2018


editor-paper-news-angle-govt-communal

जितेंद्र भट्ट

संपादक की दराज में रंग-बिरंगे चश्मे रखे हुए हैं। जैसा दिन और माहौल हो, वो अपनी पसंद के हिसाब से दराज से एक रंग का चश्मा निकाल लेता है। संपादक के सामने घटना पहली बार पहुंचती है, तब वो बहुत मासूम होती है। आगे चलकर इस मासूम घटना पर सच का रंग गिरेगा, या झूठ का। ये संपादक तय करता है। भ्रम का मटमैला रंग भी भरा जा सकता है। इन्हीं रंगों से तय होगा कि ‘बड़ी’ होकर खबर कितनी खतरनाक बनेगी।

संपादक अपने ‘मूड और अपनी निष्ठा’ के हिसाब से तय करता है कि किस रंग का चश्मा चढ़ाना है। वैसे रंग खबर पर पहले ही चढ़ जाता है। संपादक को हर खबर एक ही रंग से देखने की आदत होती है। पाठक को खबर कैसी दिखेगी। ये संपादक की पसंद पर निर्भर है। घटना चाहे कैसी भी हो। रंग उस पर संपादक की पसंद का ही चढ़ता है। संपादक घटनाओं को अपनी पसंद के रंग में रंगने से कभी नहीं चूकता।

खबरों की दुनिया का असली रंगरेज संपादक होता है। घटना सफेद हो, पर संपादक को काला रंग पसंद है। तो घटना काले रंग में रंगकर निकलेगी। काले रंग की खबर पर सफेद रंग भी चढ़ाया जा सकता है। एक घटना को संपादक गंभीरता से भर सकता है। उसमें ट्रेजडी के रंग डाल सकता है। वो घटना में जहरीले रंग भर सकता है कि अगर ऐसी खबर लोगों को डसने पर उतर आए, तो कहर बन जाए। संपादक तेज रफ्तार घटना को इतना बेकार कर सकता है कि वो एकबार चलकर मर जाए।

वैसे संपादक से आगे जहां और भी है। एक कॉर्पोरेट होता है। और उसके बहुत सारे सत्ता मित्र। अगर सत्ता न भी हो, तो रेवेन्यू का सवाल हमेशा मुंह बाए खड़ा रहता है। और बेचारे संपादक को खबरों के साथ रेवेन्यू की चिंता से भी दोचार होना पड़ता है। संपादक को वो चश्मा बार-बार पहनना पड़ता है, जो कॉर्पोरेट को पंसद हो। वैसे ये कॉर्पोरेट बहुत ईमानदार होता है। वो खुलकर बताता है कि कौन सा चश्मा पहनना है।

अब बात को थोड़ा खुलकर समझिए। मसलन दंगा कोई भी हो। संपादक को पता रहता है कि आरोपी किसे बनाना है। और सही बात तो ये है कि संपादक की डिक्शनरी में‘आरोपी’ शब्द होता ही नहीं है। उसकी डिक्शनरी में एक ही शब्द है, दोषी। और दोषी किसे बनाना है ये बहुत आसान है। क्योंकि दंगे, हिंसा, करप्शन के लिए भी उसकी दराज में कुछ चश्मे रखे हुए हैं। हर दंगे को देखने का खास चश्मा है।

अब मान लीजिए, दंगा बिहार में हो। सरकार की कमजोरी उभर आए। मसलन, तस्वीरों में दिख रहा हो कि हंगामा करने वाले किसी खास रंग का मफलर पहनकर निकले थे। वो खास रंग के नारे लगा रहे थे। और खास रंग की पार्टी से जुड़े थे।

तो संपादक खबर का एंगल ‘5 W’ और ‘1 H’ से तुरंत तय करेगा।

सबसे पहला सवाल, बिहार में सरकार ‘कौन’ चला रहा है? जवाब –सरकार तो अपनी है।

सवाल ये भी हो सकता है, दंगे में ‘कौन’ शामिल था? जवाब – अपनी पार्टी/संगठन से जुड़े लोग हैं। जवाब ये भी हो सकता है कि दूसरी पार्टी के लोग हैं। खबर किस रंग में रंगी जाएगी। ‌ये जवाब से तय होगा। जवाब पर टिका है कि खबर कितना फनफनाएगी।

दूसरा सवाल, ‘क्या’ हुआ? जवाब – मस्जिद पर हमला हुआ। कुछ दुकानें जली। संपादक मुंह बिचकाएगा। जैसे खबर में दम ही नहीं है। और जवाब मस्जिद की जगह मंदिर हो, तो खबर चेतक के घोड़े पर सवार हो सकती है।

तीसरा सवाल, मामला ‘कब’ हुआ? जवाब – वक्त नाजुक है। अपनी सरकार पर निगेटिव असर हो सकता है। छोड़ो, मत चलाओ। अगर चुनाव होने वाले हों, तब दिखा दो। 

चौथा सवाल, दंगा ‘कहां’ हुआ? जवाब - बिहार में। छोड़ो यार। अगर बंगाल में हुआ हो, तो दिखाओ, किसने रोका है।

पांचवां सवाल, दंगा ‘क्यों’ हुआ? जवाब – हमारे भाई जुलूस निकाल रहे थे। छोड़ो, फिर भाईयों की गलती दिखानी पड़ेगी। नहीं, वो तो दूसरे पक्ष के लोग हैं। तो चलाओ।

वैसे तो ये व्यंग्य है। पर अपने लेख का संपादक तो मैं ही हूं। इसलिए थोड़ी गंभीरता चलेगी। अब देखिए।

बिहार का दंगा खबरों से गायब रहा।

बंगाल का दंगा खूब चला।

बिहार में दंगे और हिंसा के लिए ‘विपक्ष’ पूरी तरह जिम्मेदार रहा।

बंगाल में दंगे और हिंसा के लिए ‘सरकार’ जिम्मेदार रही।

बिहार में दंगे पर ‘होम मिनिस्ट्री’ मौन रही।

बंगाल में दंगे पर तुरंत रिपोर्ट मांगी गयी।

संपादक इशारा समझ गया। उसने बिहार में सीएम से सवाल नहीं पूछे।

बंगाल की सीएम से पूछे जाने वाले सवालों की लंबी फेहरिस्त तैयार की गयी।

तो सारा मामला यहीं पर आकर टिक गया। बिहार में बीजेपी-जेडीयू की स्रकार है।

बंगाल में टीएमसी की है।

बिहार में पक्ष की सरकार है।

बंगाल में विपक्ष की सरकार है।

बिहार में पीएम की तारीफ करने वाला सीएम गद्दी पर है।

बंगाल में पीएम पर आग उगलने वाली सीएम है।

इतनी बातें सामने हों, तो खबरों का रंग तो तय हो ही जाता है।

वैसे हर दंगा, दंगा नहीं होता।

कुछ राष्ट्रवादी दंगे होते हैं।

कुछ धार्मिक दंगे। और कुछ देशभक्तों द्वारा किए जाने वाले खास दंगे होते हैं।

तीनों ही स्थिति में संपादक को सॉफ्ट लाइन लेनी पड़ती है। दरअसल सवाल देश का होता है।

और पहले बताया गया है। संपादक की दराज में रंग बिरंगे चश्मे रखे हैं। खास दंगों के लिए खास रंग का चश्मा भी है।

दो अप्रैल के भारत बंद में हुई हिंसा को संपादक अलग चश्मे से देखेगा।

करणी सेना की हिंसा को अलग चश्मे से।

कासगंज की हिंसा के लिए बिल्कुल अलग ही चश्मा बनाया गया है।

अररिया के हंगामे के लिए चश्मा अलग है। आखिरी की तीन घटनाओं के लिए चश्मे में लेंस का नंबर सेम सेम रहेगा। सेम सेम कहा, शेम शेम नहीं।

(जितेंद्र भट्ट पेशे से पत्रकार हैं और आजकल एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल में काम कर रहे हैं।)

 




Tageditor paper news govt communal

Leave your comment