अब आप नहीं कह सकेंगे- “तुम घर में करती ही क्या हो...?”

हमारा समाज , आधी दुनिया, बृहस्पतिवार , 17-08-2017


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प्रतीक्षा पांडेय

तुम घर में करती ही क्या हो...?

दिनभर आराम फरमाती हो।

खाना बनाना कोई काम थोड़ी है।

बाहर जा कर कमाना हो तब समझ आए।

सामान्यत: घरेलू महिलाओं को ये बातें रोज़ सुननी पड़ती हैं। कपड़े धोने से लेकर बाथरूम धोने तक, खाना बनाने से लेकर बर्तन-झाड़ू तक, बच्चों की देखरेख से लेकर पति और सास-ससुर की सेवा तक ऐसे ना जाने कितने काम हैं जो घर पर रहने वाली महिलाएं करती हैं  जिनकी न गणना है, न प्रोत्साहन और न ही मूल्याकंन।

अकथित कर्तव्य और जिम्मेदारी के नाम पर सदियों से इस तरह की रवायत जारी है।  

24/7 (चौबीस घंटे सातों दिन) के काम का कोई लेखा-जोखा नहीं, ब्योरा नहीं, महत्व नहीं और न ही कोई छुट्टी।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल

आमतौर पर कामकाजी सदस्य अपनी छुट्टी के दिन आराम फऱमाते हैं और सो कर जागते ही सवाल होता है तो आज क्या स्पेशल बना रही? तो आज क्या स्पेशल कर रही हो?

यानी बाहर काम पर जा रहे हैं तो थक रहे हैं, लेकिन घर के काम का कोई महत्व नहीं, आराम नहीं, छुट्टी नहीं। (हालांकि आजकल तो ज़्यादातर महिलाएं भी बाहर काम पर जा रही हैं तब भी उनके ऊपर घर के काम की पूरी ज़िम्मेदारी है। इस तरह अब तो उनके ऊपर दोहरा भार हो गया है।)

हम ऐसे समाज में रहते हैं जहां गृहिणियों का काम कभी भी 'काम' के रूप में नहीं माना गया है। घरेलू कार्यों के प्रति एक उन्नत और बेहतर दृष्टिकोण कभी भी हमारे परिवारों में पेश नहीं किया जाता रहा है। सदियों से घरेलू कामकाज श्रम नहीं कर्तव्य की चादर ओढ़े है।

साभार : गूगल

हाईकोर्ट के फैसले ने छेड़ी अहम बहस

पिछले दिनों चुपके से आए एक बड़े फैसले ने इस बहस को छेड़ दिया है कि क्या घरेलू कामकाज से कर्तव्य रूपी चादर को हटाने का वक्त आ गया है। कुछ फैसले इतने बड़े होते हैं जिनपर चर्चा होनी चाहिए किन्तु वो मीडिया की मुख्यधारा का हिस्सा भी नहीं बन पाते ।

मद्रास हाईकोर्ट ने मालती नाम की एक महिला के संदर्भ में फैसला दिया जिसकी मौत हो चुकी है। मालती की मौत सन् 2009 में बिजली के खुले तार की चपेट में आने से हुई थी। मालती के पति ने बिजली बोर्ड से मुआवजे की अपील की। बोर्ड ने दलील दी कि मालती एक गृहिणी थी और उनकी कोई आय भी नहीं थी, इसलिए मुआवज़े की रक़म यूं ही कैसे दे दी जाए।
मामला अदालत तक पहुंचा। न्यायालय ने इसपर संज्ञान लेते हुए महिला की मासिक आय को 3000 रुपये माना जो कि परिवार की आय व्यय का ब्योरा रखने वाली चार्टर्ड एकाउंटेंट, एक शेफ, बच्चों की देखरेख करने वाली मां के कामकाज की एवज में था।

घरेलू काम की भी क़ीमत है जनाब!

अदालत ने एक गृहिणी के  अवैतनिक कार्य को वैतनिक मानते हुए उसके कार्य को वैतनिक कार्य के बराबरी का दर्जा दिया। अदालत ने यह भी माना कि  3000 रुपये मासिक भी एक गृहिणी के कामकाज का सही भुगतान नहीं है लेकिन बड़ी बात इस और ध्यान देने की है।
न्यायालय के इस कदम को एक महत्वपूर्ण कदम मानते हुए बराबरी के इस फैसले को आत्मसात करना होगा। लैंगिक रुढ़िवादी धाराणाओं ने इस व्यवस्था को जटिल कर रखा है। स्त्री है तो घर देखे, बच्चों का पालन पोषण करे, खाना बनाए,घर संभाले और ये सब जिम्मेदारी और कर्तव्य समझ कर करे न कि इसके पारिश्रमिक की इच्छा रखे। गृहणियां उस तरह की श्रमिक होती हैं जिनका न वेतन है, न छुट्टी और न ही इन सब के अभाव में विरोध करने का हक़। 

यदि हम नज़र डाले तो  श्रम और रोजगार मंत्रालय ने दिहाड़ी मजदूरों को भी शामिल कर लिया है लेकिन दिन-रात काम करने वाली गृहिणियां इसका हिस्सा नहीं है। मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले को यदि हम नज़ीर मान लें और इस अवैतनिक कर्तव्य को श्रम की श्रेणी में रखें तो भी बहुत हद तक इस मानसिकता में सुधार संभव है। जब तक महिलाओं के घरेलू कामों का मूल्यांकन नहीं होगा तब तक महिलाओं के साथ ये भेदभाव यूं ही चलता रहेगा। अब वक्त गया है कि पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाओं और उनकी जिम्मेदारियों को समानता देने का और घरेलू कामों को श्रम की श्रेणी में  शामिल करने का।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं और दिल्ली में रहती हैं।) 










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