फगुनी डोम: कथा-व्यथा का सामाजिक पता

हमारा समाज , , शनिवार , 14-04-2018


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उपेंद्र चौधरी

मेरा गांव बदल गया है, मैं भी बदल गया हूं और इस बीच हमारे आस-पास की पूरी दुनिया भी बहुत बदल गयी है। इस तीनों बदलावों के बीच रस्साकशी जारी है, मैं गांव को दोष देता हूं, गांव मुझ पर दोष मढ़ता है और हमारी समझ इस बदलाव के लिए दुनिया में हो रहे परिवर्तन को ज़िम्मेदार मानती है। मैं इस बात से पूरी तरह कन्विंस हूं कि बदलाव को नहीं रोका जा सकता और इस बदलाव में मेरी तरह हर पीढ़ी अपने तरीक़े से बदलती रही है, बदल रही है और बदलते लोगों से गांव-क़स्बे-शहर-नगर-भौतिक-अभौतिक सब कुछ बदलते रहेंगे, आख़िर दुनिया तो लोगों की बदलती सोच के साथ ही बदलती है, सो सोच के साथ जुड़ी हर चीज़ की सचाई बदल रही है।

लेकिन बदलाव को अपने ज़ेहन का हिस्सा बना पाना, इतना आसान नहीं होता। दो दशक पहले जब दिल्ली आया था (आप स्वयं को किसी और शहर से जोड़ सकते हैं), तो अपने को बदलने में बड़ी परेशानी हो रही थी-गांव बहुत याद आता था; गांव की ताज़े बयार के बीच सुबह की खिलती-मचलती लाली बहुत याद आती थी; शाम की बैठती बुज़ुर्गों-युवकों-बच्चों वाली भजन मंडली का पंचम सुर हृदय में हिलोरें उठाता था; हमजोलियों के साथ अपने सरेह के बीच निकल जाने की मटरगस्ती याद आती थी; दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा के लिए चंदे उगाहने का उत्साह रह-रहकर कंठ को अवरुद्ध कर जाता था; इन उत्सवों में कई-कई दिनों तक उत्सव स्थल से घर नहीं लौटने की खुमार याद आती थी; बाबूजी से मिले अठन्नी-चौवन्नी से ख़रीदे गये मूढ़ी-कचरी-जलेवी से सजे दोस्तों के बीच की पार्टी साथ याद आती थी; दाहा (ताजिये निकालने का जुलूस) और रैन (जिस स्थल पर दाहाओं या ताजियों के बीच जंग होती थी) का वो नज़ारा याद आता था, जिसमें किसी एक दाहा को कोई सरकारी अधिकारी किसी वर्ष विशेष का विजेता-उपविजेता घोषित कर देता था; कड़कती ठंड में ब्रह्ममुहू्र्त की प्राती (लगभग चार बजे सुबह में गाये जाने वाला विशेष गीत) याद आती थी; शाम ढलते ही झिंगूर की रुनझुन यादों के कानों में झुनझुन बजने लगती थी; शादी-विवाह-मुंडन जनेऊ-खेत-खलिहान-आड़ी-डरेर-गाय-बकरी-मेह-सरेह सब कुछ सिनेमाई दृश्यों की तरह सीने में तड़फड़ाने लगते थे।

मैं जैसे-जैसे दिल्ली की सड़कों-गलियों-विश्वविद्यालयों-करियर-नौकरी के साथ होता गया, ये यादें तड़पने की नहीं, बल्कि सामने पसरे कठोर हक़ीक़त के बीच सुबह की घास पर लटकती-चहकती ओस की बूंदों की तरह नन्हीं-नन्हीं मुस्कुराहट का आधार बनती गयीं। इन बूंदों के बीच तन्हाई मुस्कुरा लेती थी और हम वर्तमान के स्ट्रेस को रेस्ट देने की ख़ातिर इस मुस्कुराहट के बीच अपने अतीत के साथ आज भी कुछ पल बिता लेते हैं। 

लेकिन इसी भावुकता के बीच संवेदनशीलता की अनेक आड़ी-तिरछी रेखायें भी उभरने लगती हैं। अपने गांव के किनारे स्थित वह बन्न्हा (जहां लोग खुले में शौच के लिए जाया करते थे) अपनी पूरी बजबजाहट के साथ मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर दस्तक देने लगता है, जहां फगुनी डोम और उसके पुरखे, पता नहीं कितने सालों से किस बात की सज़ा पाते रहे हैं। भावनाओं ने जब समझ-बूझ के ज़रिये संवेदनाओं की करवट ली, तो हमारी यादों की वेदना में फगुनी डोम और उसके पुरखों की जगह बहुत बाद में बन पायी। ऐसा क्यों हुआ, इसका जवाब हम जातीय श्रेष्ठता और वर्णगत भावनाओं से छिटके बिना नहीं पा सकते।

अब फगुनी डोम के बारे में थोड़ी-सी मालूमात- उसकी छह फीट लम्बी क़द-काठी और उसका भरा-पूरा बदन, कल्पना में बसे किसी योद्धा (पारंपरिक और रूढ़िगत तौर पर क्षत्रिय) की याद दिलाते हैं; उसे हमेशा गांधी के लिबास में ही देखा, शरीर पर कभी पूरा कपड़ा नहीं। फटे कपड़ों में भी कभी गंदगी में सना नहीं पाया। हालांकि चारों तरफ़ से ग़ैर दलितों के त्यागे विष्टा (पाखानों) के बीच ही उसका घर था। यहीं से उसके सुअर के लिए चारे की व्यवस्था होती थी। खाना-पीना-सोना-उठना-पूजा-पाठ सब कुछ उसी दुर्गांधाते मैले के बीच। फगुनी ने कभी मलत्यागने वाले पर सवाल नहीं किया। शायद किसी भी तरह के सवाल करने की उसे इजाज़त ही नहीं थी। उसने इन हालात से अपनी संगत बना ली थी।

फगुनी डोम जब कभी अपने कानों पर अपना हाथ रखकर 'के तोरा संगवा में जाई रे भंवरवा' का तान देता था, तो गांव के सीमान तक पहुंचती उसकी आवाज़ से पूरा माहौल फ़िलॉसॉफ़िकल हो जाता था। इस गीत की फ़रमाईश अक्सर ही हुआ करती थी और फगुनी डोम कभी किसी को निराश नहीं करता था, बल्कि श्मशान घाट (जहां शवदाह किया जाता है) में उसके इस हुनर की ज़रूरत ख़ास तौर पर महसूस की जाती थी। फगुनी डोम के लायी आग की चिन्गारी से ही चिता में आग प्रज्जवलित होती थी और उसके गाने की लय चिता से उठती ज्वाला के साथ मिलकर मानव जीवन का दर्शन बन जाती थी। यह दर्शन मज्जिल (शव के साथ आना) में आये लोगों के ज़ेहन में इतना गहरा असर पैदा करता था कि मज्जिल में जाने वाले लोग कुछ दिनों तक उसके गाने के दर्शन में अपना सुकून ढूंढते रहते थे। फगुनी डोम ने कभी किसी का विरोध नहीं किया। किसी योद्धा की तरह दिखता फगुनी डोम किसी भी पिद्दी सी कद-काठी वाले ग़ैर दलित जाति के कुछ भी पूछने पर बड़े ही ताव से सिर्फ़ इतना ही कहता था- 'हां मालिक'।

फ़गुनी का इस्तेमाल पूरा ही गांव एक और तरीक़े से करता था। गांव के किसी व्यक्ति ने अगर कोई ऐसा जघन्य काम किया हो, जिसकी माफ़ी नहीं है, तो उसे फगुनी के हाथों पिटवाया जाता था। वह हर पंचायत का एक अहम हिस्सा हुआ करता था। लेकिन हुकुम तामील करने के लिए, किसी मशविरे या बात के लिए नहीं। कई बार गांव के दबंग अपनी रंज़िश के सिलसिले में फ़गुनी के इस उपयोग का इस्तेमाल करते थे। मगर फगनी से कभी पूछने की आवश्यकता ही महसूस की गयी कि उसकी इस भूमिका से वह कितना सहमत है। असल में फगुनी की सहमति या असहमति का कोई मतलब भी नहीं था। उसे किसी भी मांग के लिए सिर्फ़ 'हां मालिक' ही कहना था। उसे इस जुमले का इतना अभ्यास हो गया था या करा दिया गया था कि इससे अलग वह कुछ और जुमला सोच ही नहीं सकता था।

फगुनी या उसके परिवार का पेशा बांस या कमची से बनाये उन सुपली, सूप आदि को बनाना था, जो पर्व त्योहार में काम आते थे। उसके द्वारा बनाये गये उत्पाद, आज भी छठ जैसे धार्मिक पर्व-त्योहारों के अनिवार्य वस्तु हैं। इन वस्तुओं को फगुनी अपने 'मालिकों' की स्पेशल फ़रमाईश से बनाता था। असल में उसका पूरा परिवार इस शिल्पकला का माहिर कलाकार था। लेकिन उसके 'मालिक' उसके या उसके परिवार को कभी कलाकार का दर्जा ही नहीं दे पाया। फगुनी जब भी अपने बनाये कलात्मक उत्पादों को अपने मालिकों को सौंपता, तो वह उन्हें ज़मीन पर रख देता। मालकिन उस पर पानी छिड़कती और पूरी पवित्रता के साथ अपवित्र फगुनी डोम के बनाये उन उत्पादों को अपने पर्व-त्योहारों या घरेलू इस्तेमाल का अभिन्न हिस्सा बना लेतीं। बदले में फगुनी को पहले अन्न या कोई खाद्य वस्तु दे दी जाती थी, अब रुपये-पैसे दिये जाने लगे हैं। मालिक या मालिकिन बटुए या खूंट से पैसे निकालते और ज़मीन पर रख देते और फगुनी, इजाज़त के बाद उन्हें ज़मीन से उठाकर अपनी जेब में रख लेता।

फगुनी चौथेपन में हैं और आज भी जब वो किसी अढ़तिये या किराने की दुकान में जाते हैं, तो अपने सौदे के लिए उन्हें लम्बा इंतज़ार करना होता है। जब सभी ग्राहक चले जाते हैं, तो फगुनी अपने पैसे ज़मीन पर रख देते हैं और फिर दुकानदार, उसे सौदा ज़मीन पर रख देता और ज़मीन से फगुनी के दिये पैसे उठा लेता है। सुना है कि फगुनी के जीवन में थोड़ा बदलाव आ गया है। उनकी पोती स्कूल में पढ़ने लगी है, सलीके से ठीक-ठाक कपड़े पहनती है और उसकी चाल में दलितपन से ऊपर उठने की एक लय आ गयी है। उसके परिवार से स्कूल जाने वाली वह पहली सदस्य है। निम्नतम सामाजिक हैसियत से ऊपर उठते व्यक्तित्व की लय में उसके स्वयं के होने का अहसास दिखता है। यह अहसास जातीय विषमता को चुनौती देता है,लेकिन चुनौती बनते उस अहसास पर कुर्मी-कुम्हारों से लेकर राजपूत-बाभनों तक की नज़र है। गांव में उसके रूप-रंग-नयन-नक्श और चाल-ढाल की ख़ूब चर्चे हैं, लेकिन उसके बनते अस्तित्व और अधिकारों की 'ख़ामोश' मांगों पर चुपके-चुपके बहस होने लगी है। भीमराव अम्बेडकर इसी बहस के तो हामी थे, वो इसी बहस को चर्चा का केन्द्र बनाना चाहते थे।

क़द काठी और हाव-भाव-चाल-ढाल में किसी योद्धा की तरह दिखते फगुनी डोम ने भले ही 'हां मालिक' की कठोरतम हक़ीक़त को जीने के लिए 'के तोरा संगवा में जाई रे भंवरवा' की लय और तान के सहारे अपना कठिनतम समय गुज़ार लिये हों, मगर उनकी नई पीढ़ी कुर्मी-कुम्हारों और राजपूत-बाभनों की नज़रों से नज़र मिलाने लगी है, अपने बदले हुए वस्त्रों, तौर-तरीकों और तालीम की तरफ़ बढ़ते क़दमों से स्वयं को उस बहस में सामाजिक बदलाव की आने वाली किसी तूफ़ान की आहट में एक ख़ामोश सी लहरें उठाने लगी है। इसी लहर और इस लहर से ढलती-बढ़ती सामाजिक समानता के यही सपने डॉ. अम्बेडकर ने तो देखे थे-उन्होंने यही तो कहा था- 'शिक्षित बनो'! फगुनी डोम की नयी पीढ़ी उसी रास्ते पर चल पड़ी है, पढ़-लिख रही है, स्याह अतीत को कामयाबी के साथ चुनौती देते हुए नये सपनों के साथ नयी राह अख़्तियार करने लगी है !! अम्बेडकर जयंति पर अम्बेडकर सहित उन तमाम दलितों को नमन, जिनकी सदियों से ख़ामोश शहादत, आज अधिकारों के एक नये रंग-ढंग में ढलने लगी है, बहरे समाज के कानों में एक ज़ोरदार आवाज़ बनने लगी है !!!

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।) 




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