फ़हमीदा रियाज़ :अंधेरे वक़्त में रौशन आवाज़ का जाना

श्रद्धांजलि , , बृहस्पतिवार , 22-11-2018


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धीरेश सैनी

फ़हमीदा रियाज़ को 1999 के आसपास मुज़फ़्फ़रनगर में हुए एक मुशायरे में सुनने का मौका मिला था। इस इंडो-पाक मुशायरे को लेकर उग्र हिंदुत्ववादी तत्वों ने माहौल में तनाव घोल रखा था। मुशायरे के संयोजक मनेश गुप्ता, एडवोकेट के प्रेमपुरी इलाके मे स्थित घर पर पथराव भी कर दिया गया था। ऐसे माहौल में फ़हमीदा और पाकिस्तान से दोस्ती का पैग़ाम लेकर आए दूसरे शायर संगीनों के साये में मुज़फ़्फ़रनगर के महावीर चौक स्थित एक होटल में पहुंचे थे। उस शाम हम पत्रकारों को भी उनसे मिलने (आजकल की भाषा में कहें तो बाइट लेने) की इज़ाज़त नहीं मिल सकी थी। मुझे याद है कि रात में मुशायरा सुनने के लिए रवाना होने से पहले `अमर उजाला` के लिए जो ख़बर लिखी थी, उसके हेडिंग में मुहब्बत का पैग़ाम लाए शायरों के संगीनों के साये में होने की ही कोई बात थी।

तो फ़हमीदा रियाज़ संगीनों के साये में मुज़फ़्फ़रनगर पहुंची थीं। सोचें तो यह बात दिल को इसलिए और भी ज्यादा उदास कर देती है कि यह उनका जन्मस्थान था। वे ब्रिटिश राज में मेरठ में पैदा हुई थीं और मुज़फ़्फ़रनगर इसी मेरठ डिवीजन का हिस्सा था। ख़ैर, वे राजनीतिक-सामाजिक रूप से जागरूक शायरा थीं। जितना पाकिस्तान के बारे में जानती थीं, उससे कम हिंदुस्तान के बारे में भी नहीं जानती थीं।

बल्कि वे जितनी पाकिस्तान की थीं, उतनी ही हिंदुस्तान की भी थीं। इसी रिश्ते और अपनापे से भरी चिंता और अफ़सोस में वे वह मशहूर नज़्म `तुम बिल्कुल हम जैसे निकले` भी लिख चुकी थीं जो हिंदुस्तान के हिंदी रिसालों में एडिटोरियल्स की जगह भी छापी जा चुकी थी। जाहिर है कि उस रात मुशायरे में बड़ी संख्या में आए श्रोताओं के बीच भी उन्होंने इस नज़्म को सुनाकर अपना फ़र्ज़ निभाया। उस रात मुशायरे में मंच पर क़ैफ़ी आज़मी ह्वील चेयर पर थे। पाकिस्तान से आए शायरों में एक बड़ा नाम हिमायत अली शयार भी थे जिनसे मंच के पीछे खड़े होकर शानदार बातचीत का मौक़ा भी मुझे हाथ लग गया था। अफ़सोस कि फ़हमीदा आपा के साथ बातचीत न कर सका था। फिर भी फख़्र महसूस होता है कि उन्हें देखा, उनके सामने बैठकर उन्हें शायरी करते सुना और कहने को उनकी शायरी की रिपोर्टिंग भी की।

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने बुद्धिजीवी प्रकाश के रे ने फ़हमीदा रियाज़ को जेएनयू के उस `मुशायरा कांड` में पढ़ी गई इसी नज़्म `तुम बिल्कुल हम जैसे निकले` के साथ याद किया है। वे लिखते हैं, ``फ़हमीदा रियाज़ को पहली बार मैंने जाना था 2000 में। हमने एक हिंद-ओ-पाक मुशायरा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रखा था जिसमें अहमद फ़राज़ और किश्वर नाहिद के साथ उनकी भी शिरकत थी। कार्यक्रम में कई और बड़े शायर भी थे। मक़बूल फ़िदा हुसैन और गुलज़ार जैसी कुछ अज़ीम हस्तियों को भी आना था। फ़हमीदा रियाज़ पहले जाना चाहती थीं, सो उन्हें पढ़ने की दावत दी गयी। मुख्य आयोजक होने के नाते मुझे कई सारे इंतज़ाम देखने थे। अचानक हंगामा हुआ, भाग-दौड़ हुई, पिस्तौल निकली, सब बिखर गया...।

बहुत समय तक अफ़रा-तफ़री रही। पुलिस आयी। जब यह फ़ित्ना थमा, तो मैंने कहा- कार्यक्रम फिर शुरू होगा। हुआ भी। अगले दिन से पुलिस, सेना, मीडिया... यहां तक कि संसद तक बहस हुई। जेएनयू की तारीख़ में वह घटना 'मुशायरा कांड' के नाम से जुड़ी। प्रशासन ने उसी जज को इसकी जांच के लिए बुलाया जिसने बाबरी मस्जिद की शहादत के मामले में प्रतिबंधित बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के ऊपर से प्रतिबंध हटाया था। आयोजन का ढेर सारा ख़र्च मुझे ख़ुद भरना पड़ा। पुलिस-सेना-प्रशासन का पेंच अलग से। बहरहाल, उस पूरे मामले में चर्चा फिर कभी। वैसे आप अप्रैल-मई 2000 के अख़बार देख सकते हैं। और, यह कि फ़हमीदा रियाज़ ने जो नज़्म पढ़ी थी, वह यह थी, `तुम बिल्कुल हम जैसे निकले`। क्या ग़लत कहा था फ़हमीदा रियाज़ ने, जो पिस्तौल निकल आयी और संसद को बहस करनी पड़ी! उनकी याद को सर झुकाते हुए लिख रहा हूं...।

।।तुम बिल्कुल हम जैसे निकले।।

 तुम बिल्कुल हम जैसे निकले

अब तक कहाँ छिपे थे भाई

वो मूरखता, वो घामड़पन

जिसमें हमने सदी गंवाई

आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे

अरे बधाई, बहुत बधाई।

 

प्रेत धर्म का नाच रहा है

कायम हिंदू राज करोगे?

सारे उल्टे काज करोगे!

अपना चमन ताराज़ करोगे!

 

तुम भी बैठे करोगे सोचा

पूरी है वैसी तैयारी

कौन है हिंदू, कौन नहीं है

तुम भी करोगे फ़तवे जारी

होगा कठिन वहाँ भी जीना

दाँतों आ जाएगा पसीना

जैसी तैसी कटा करेगी

वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

माथे पर सिंदूर की रेखा

कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!

 

क्या हमने दुर्दशा बनाई

कुछ भी तुमको नजर न आयी?

कल दुख से सोचा करती थी

सोच के बहुत हँसी आज आयी

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले

हम दो कौम नहीं थे भाई।

मश्क करो तुम, आ जाएगा

उल्टे पाँव चलते जाना

ध्यान न मन में दूजा आए

बस पीछे ही नजर जमाना

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा

अब जाहिलपन के गुन गाना।

 

आगे गड्ढा है यह मत देखो

लाओ वापस, गया ज़माना

एक जाप सा करते जाओ

बारम्बार यही दोहराओ

कैसा वीर महान था भारत

कैसा आलीशान था-भारत

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे

बस परलोक पहुँच जाओगे

हम तो हैं पहले से वहाँ पर

तुम भी समय निकालते रहना

अब जिस नरक में जाओ वहाँ से

चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

हिंदुस्तान फ़हमीदा लिए घर की तरह ही था। इस देश की चिंता और मुहब्बत में उन्होंने `तुम बिल्कुल हम जैसे निकले` के अलावा भी नज़्में कहीं। हिंदुस्तान के साम्प्रदायिकता की चपेट में आते चले जाने का रंज़ उन्हें हमेशा सताता रहा। यूँ भी उनके और उनकी कविता की शख़्सियत में इस पूरे हिंदुस्तान की रंगो-बू, नदियां, परबत, बंटवारा और बाद की बरबादियों की शिनाख़्त सब शामिल थे। यहां तक कि `नज़्र-ए-फ़िराक़ में` नज़्म में भी वे कहती हैं- `गर तारीख़ ने पागल हो कर ख़ुद अपना सर फोड़ा है/ ख़ून उछाला है गलियों में अपना हंडोला तोड़ा है/ छींट न थी दामन पर उस के कौन घाट धो बैठा था /जिसे समझते हो ना-मुम्किन वो उस इंसाँ जैसा था`।

अपनी एक नज़्म `पूर्वांचल` में वे मशरिक़ी यूपी के कर्फ़्यू के बीच पूरब की धरती की सुंदरता का जिक्र करती हैं, नदी सरजू का जिक्र करती हैं, भीगे नैनों से मंदिर-मस्जिद के फेर में झगड़े का जिक्र करती हैं, गिद्ध मंडराते देखती हैं, राम का, रहीम का, गौतम का, कबीर का वास्ता देती हैं। कहने का मतलब यह कि वे हिंद-पाक दोस्ती की सिर्फ़ काग़ज़ी या सेमिनारी अंबेसडर नहीं थीं। वे ताउम्र इस पूरे उपमहाद्वीप की मिट्टी का कर्ज़ अदा करती रहीं। हैरत नहीं कि इस दोस्ती मिशन के सीनियर सिपाही व जाने-माने बुद्धिजीवी प्रो. चमन लाल ने उनके निधन की ख़बर पाते ही उन्हें सबसे पहले इस रूप में ही याद किया।

पाकिस्तान में ज़ियाउल हक़ के शासन काल में फहमीदा पर देशद्रोह समेत 10 से ज्यादा केस लाद दिए गए थे और वाम असर वाले उनके पॉलिटिकल एक्टिविस्ट पति ज़फ़र उल उजान को जेल में डाल दिया गया था तो उन्होंने अपने बच्चों और बहन के साथ निर्वासन के करीब सात साल दिल्ली में ही बिताए। बाद में उनके पति भी उनके पास आने में कामयाब रहे।

हिंदुस्तान मे उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं जो फ़हमीदा के महत्व को जानती थीं। यहां फ़हमीदा के अपने रिश्तेदार भी थे और उनके स्वागत के लिए प्रोग्रेसिव राइटर्स की एक पूरी जमात थी। वे उस वक़्त जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में `पॉएट इन रेजिडेंस` की हैसियत से रहीं। लेकिन निर्वासन आख़िर निर्वासन ही होता है। `दिल्ली तेरी छाँव में...` नज़्म में उनके दिल्ली के प्यार, पाकिस्तान के हालात और सिंध की याद को मार्मिकता के साथ महसूस किया जा सकता है।

 हिंदी के बड़े कवि और फ़हमीदा रियाज़ के दोस्त असद ज़ैदी के शब्दों में कहें तो फ़हमीदा रियाज़ इस उप महाद्वीप की बड़ी शख़्सियत थीं। वे इस उप महाद्वीप की बड़ी कवयित्री थीं। कविता के सिर्फ़ स्त्री स्वरों का ज़िक्र करें तो उर्दू में स्त्री कवयित्रियों के बोलबाले के बीच सबसे पहला उनका नाम था। उर्दू पॉएट्री में फीमेल रेनेसां में उनकी बड़ी भूमिका रही। उर्दू पॉएट्री में स्त्री स्वर को उन्होंने एक अलग कॉन्फिडेंस दिया। यूँ भी वे उर्दू शायरी के जीवित सबसे बड़े नामों में मुख्य थीं। वे बेहद जागरूक, प्रोग्रेसिव, लेफ्ट लीनिंग इंटलेक्चुअल और जुझारू एक्टिविस्ट थीं।

वरिष्ठ लेखक और जाने-माने फिल्म विशेषज्ञ जवरीमल पारख याद करते हैं कि ``फ़हमीदा रियाज़ को 1985 में जनवादी लेखक संघ के दूसरे राज्य सम्मेलन में मुख्य अतिथि के तौर पर अमरोहा बुलाया गया था। वे बहुत ही प्रगतिशील लेखिका थीं। अपने विचारों के कारण ही उन्हें पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था। उनका रहन-सहन का तौर तरीका भी आधुनिक था। अमरोहा जैसे पिछड़े कस्बे में उनकी मौजूदगी काफी अर्थवान थी। वे सिगरेट पीती थीं तो कुछ स्थानीय मित्रों ने उन्हें सिगरेट कमरे के अंदर ही पीने की सलाह दी थी जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। अपने व्याख्यान में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की जरूरत को रेखांकित करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप के सामने मौजूद खतरों की ओर भी संकेत किया था। ``

पारख जी की इस टिप्पणी से फ़हमीदा रियाज़ की युवावस्था की उस तस्वीर को भी याद करते है जिसमें वे सिगरेट सुलगाती हुई दिखाई दे रही हैं। पाकिस्तान के मशहूर पत्रकार नदीम एफ़. पराचा ने डॉन में `Also Pakistan: The final cut` लेख में इस पुरानी तस्वीर के बारे में बताया है ``A 1973 photo of fiery poetess and writer, Fahmida Riaz, lighting a cigarette during a poetry recital in Lahore.

After the 1977 military take-over, Riaz was harassed by the Ziaul Haq dictatorship.

She finally escaped to India with her husband and stayed there in exile till Zia’s demise in 1988.``

सिगरेट पीतीं फहमीदा।

तो फ़हमीदा 1973 में लाहौर में कवितापाठ के दौरान सिगरेट सुलगा सकती थीं लेकिन हिंदुस्तान के अमरोहा का माहौल 1985 में उन्हें यह इज़ाज़त नहीं देता था। यह एक बड़े शहर व पुराने सांस्कृतिक-राजनीतिक केंद्र लाहौर और एक पिछड़े कस्बे अमरोहा का फ़र्क़ तो था पर फ़हमीदा के लिए इस ग़ुमान का टूटना भी रहा होगा कि हिंदुस्तान की डेमोक्रेसी ने औरतों को लेकर कोई ज्यादा स्वतंत्र स्पेस बना दिया है। अब तो उनकी `तुम बिल्कुल हम जैसे निकले` नज़्म को याद करते हुए यह कहना भी मुश्किल है कि कौन किसके जैसा निकला। गो, फ़हमीदा हिंदुस्तान और पाकिस्तान में डेमोक्रेसी के उस वक़्त के अंतर को समझती थीं और डेमोक्रेसी को लेकर हिंदुस्तानियों की आत्मतुष्टि को भी पहचानती थीं।

अमरोहा से दिल्ली लौटने के लिए ट्रेन का इंतजार करते हुए फ़हमीदा के साथ हुई बातचीत के जो टुकड़े हिंदी की वरिष्ठ कवयित्री शुभा सुनाती हैं, उनमें फ़हमीदा की कही यह बात भी है कि आप लोगों को डेमोक्रेसी आसानी से मिल गई है। ज्यादातर मुफ़्त में मिल गया। उसके लिए हम जैसा संघर्ष नहीं करना पड़ा। अब उसके लिए वैसे प्रोटेस्ट भी नहीं हैं।

फ़हमीदा रियाज़ ने भरपूर लेखन किया, महत्वपूर्ण अनुवाद किए। उनके हिस्से में विवादों और संघर्षों का सिलसिला बना रहा। उन्हें दुनिया भर में शोहरत, मक़बूलियत और सम्मान-पुरस्कार भी ख़ूब हासिल हुए। बेनज़ीर भुट्टो की सरकार के दौरान उन्हें महत्वपूर्ण सांस्कृतिक जिम्मेदारियां भी मिलीं। वे बतौर फेमिनिस्ट, बतौर प्रोग्रेसिव राइटर और बतौर ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट ताउम्र जिन जनद्रोही ताकतों से संघर्ष करती रहीं, दुनियाभर में उन्हें टिड्डी दल की तरह छाते हुए देख विदा हुईं। यह दुख उन्हें अपने जवान बेटे कबीर की मौत से कम न सालता होगा। बेटे की मौत के बाद उन्होंने शायद इस ग़म से उबरने के लिए रूमी की मस्नवी का फारसी से उर्दू अनुवाद (फ़हमीदा के अपने रंग वाला रूपांतरण) किया था। अब यह जिम्मेदारी उनके चाहने वालों पर है कि वे दुनिया में इंसानी स्पेस बचाने के लिए कोई रास्ता निकालें और इंसानी गरिमा के संघर्षों को कमज़ोर न पड़ने दें।

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)








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???? ??????? :: - 11-22-2018
धीरेश जी ने फहमीदा जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी आंतरिक ख़ूबसूरती को भीबहुत ही सरल ढंग से हम तक पहुँचाया हैऔरं अंत मे जो जनता से अपील या फिर गुज़ारिश की है वह भी सराहनीय है।