अब ‘संत’ नहीं, कहना ‘फ्रॉड बाबा’

धर्म-समाज , , सोमवार , 11-09-2017


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प्रेम कुमार

देश के 14 संतों को नयी उपाधि दी गयी है। अब ये फर्जी बाबा यानी फ्रॉड बाबा के नाम से जाने जाएंगे। देश में साधु-संतों की सर्वोच्च संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने इस नयी उपाधि का एलान किया है। अब तक यह संस्था साधुओं को मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, संत जैसी उपाधियां दिया करती थी। मगर, अब यह संस्था फर्जी बाबा या फ्रॉड बाबा की उपाधि भी दिया करेगी, जो उनकी गैर मौजूदगी और असहमति से होगा।

गुरमीत सिंह राम रहीम।

14 'अभारत रत्न' बाबा

उन 14 अभारत रत्नके नामों पर भी गौर कर लें, जिन्हें हम फ्रॉड बाबा या फर्जी बाबा कहा करेंगे। ये हैं- आसाराम बापू उर्फ़ आसुमल शिरमालानी, राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर, सच्चिदानंद गिरी उर्फ सचिन दत्ता, गुरमीत सिंह राम रहीमओम बाबा उर्फ विवेकानंद झानिर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंहइच्छाधारी भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदीस्वामी  असीमानंद, ओम नमः शिवाय बाबा, नारायण साईं, रामपाल, कुशमुनि, स्वामी ब्रष्पदमलखान गिरी।

अखाड़ा परिषद की आँख में भी धूल झोंकी!

अहम बात ये है कि इनमें से कुछेक बाबा ऐसे हैं जिन्होंने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के साथ भी फर्जीवाड़ा करने का कारनामा कर दिखाया। इनमें से बिल्डर बाबा का नाम तो दुनिया जान चुकी है जिन्होंने महामंडलेश्वर की उपाधि तक संतों की इस सर्वोच्च संस्था की आंखों में धूल झोंककर हासिल कर ली थी। धूल तो इक्के-दुक्के बाबाओं ने झोंकी थी, लेकिन ज्यादातर बाबा इस संस्था से जुड़े संतों के साथ सार्वजनिक समारोहों में मंच साझा करते रहे हैं, टीवी पर चमत्कार दिखाते रहे हैं, फिल्में बनाते रहे हैं या फिर खुद को अवतार, सिद्धपुरुष और संत के रूप में पेश करते रहे हैं। मगर, फर्जी बाबा घोषित हो चुके ये अभारत रत्नकभी अखाड़ा परिषद की आंख की किरकिरी नहीं बने।

आसाराम।

तब बचाव करते रहे, अब फ्रॉड बताने लगे!

सच तो ये है कि जब आसाराम बापू और उनके बेटे नारायण साईं कानून की नज़र से भागे-भागे फिर रहे थे, तब यही संत समुदाय के लोग इसे राजनीतिक कारणों से धर्म विशेष के पीछे सत्ता की दुर्भावना बता रहे थे। सच ये भी है कि जब 15 साल से दो साध्वी अपने बलात्कार की लड़ाई अदालत में लड़ रही थी, तब भी और अदालत में गुनहगार साबित होने के बाद भी ये कहकर इनका बचाव किया जाता रहा था कि जिस गुरमीत राम रहीम के साथ करोड़ों लोग हैं वह कैसे गलत हो सकते हैं! गलत वो दो साध्वी ही होंगी, जिन्होंने आरोप लगाया है। जरूर कोई हिन्दू समाज के खिलाफ साजिश रच रहा है!

 निर्मल बाबा।

निर्मल बाबा की 'कृपा' भी सर चढ़कर बोलती रही

निर्मल बाबा पहले भी चर्चा में आ चुके हैं। अरबों का साम्राज्य बना चुके हैं। लेकिन, कभी अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। इन पंक्तियों का यह लेखक उस न्यूज़ चैनल का तब हिस्सा था, जिसने सबसे पहले निर्मल बाबा के कृपा आडम्बर की पोल खोली थी। तब न्यूज़ एक्सप्रेस नामक उस चैनल के प्रमुख मुकेश कुमार जी ने घोषणा कर दी थी कि वे अपने चैनल में ऐसे बाबाओँ के विज्ञापन नहीं दिखाएंगे। एक के बाद एक स्टिंग करते हुए निर्मल बाबा की चैनल ने तब पोल खोलकर रख दी थी। लेकिन, तब न राजनीतिक शक्तियां और न ही साधु-संत समाज की यह शीर्ष संस्था जागृत हुई। यहां तक कि न्यूज़ चैनलों ने भी निर्मल बाबा के विज्ञापनों को जारी रखने के पक्ष में ही कदम उठाए। जाहिर है निर्मल बाबा की दुकान चलती रही। यह तभी रुकेगी जब अदालत जागेगी। इस देश में कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस अपने दायित्वों को न्यायपालिका के कंधे पर डालकर चैन की नींद सो रहे हैं।

पहले अदालत बोले, तब बाकी बोलेंगे!

राधे मां का चमत्कार हो या उन पर यौन क्रियाओं के लिए उत्तेजित करने के आरोप, कार्यवाही शुरू करने के लिए भी पुलिस को फटकारना पड़ता है। ये अदालत की मजबूरी है। वहीं राजनीतिक शक्तियां चाहे वो बीजेपी हो या कांग्रेस या कोई और राजनीतिक दल- ऐसी फटकार को नज़रअंदाज कर देती हैं। जबकि, सच ये है कि फटकार सुन रही पुलिस से ज्यादा दोषी राजनीतिक व्यवस्था है जिसके अधीन पुलिस है। तब अखाड़ा परिषद चुप क्यों रहता रहा है, यह भी समझ से परे है।

संघ प्रचारक भी बन बैठा स्वयंभू संत

असीमानन्द अजमेर, हैदराबाद और समझौता एक्सप्रेस विस्फोट मामलों में गिरफ्तार हुए। वे 1990 से 2007 के बीच आरएसएस के प्रचारक रहे। शबरी माता मंदिर और शबरी धाम बनाने का श्रेय है उन्हें, लेकिन वे साधु-संत का दर्जा कैसे पा गये- यह आश्चर्यजनक है। सबसे आश्चर्य की बात ये है कि ऐसे लोगों पर अखाड़ा परिषद का कोई नियंत्रण नहीं है। न ये तब उनसे पूछकर स्वघोषित संत हुए और न आगे उन्हें पूछेंगे। कम से कम अखाड़ा परिषद को पहले ही वो आवाज़ तो बुलन्द करनी चाहिए थी, जो आज उसने की है।

ओम बाबा

संत का चरित्र नहीं दिखता स्वयंभू में

फर्जी बाबाओं की सूची में जो बाकी नाम भी अखाड़ा परिषद ने घोषित किए हैं, वो भी काफी जाने-पहचाने और कुख्यात नाम हैं। बिग बॉस में ओम बाबा का शर्मनाक प्रदर्शन हो या सरेआम टीवी पर लाइव रहते हुए अमर्यादित टिप्पणी के बाद महिला ज्योतिषी से थप्पड़ खाते दृश्य- ये चरित्र कहीं से भी संत के चरित्र से मेल नहीं खाते। फिर राम रहीम जैसे बलात्कारी बाबा पर आरोप सिद्ध होने तक इंतज़ार क्यों किया गया? अपने स्तर पर अखाड़ा परिषद ने पहल क्यों नहीं की? रामपाल जैसे स्वघोषित भगवान आज जेल में हैं। चाहे इच्छाधारी भीमानन्द हो या ओम नम: शिवाय बाबा, कुशमुनि हों या स्वामनी ब्रष्पद या मलखान गिरी बाबा- इनका अतीत और वर्तमान दोनों संदिग्ध चरित्र वाला रहा है। लेकिन वर्षों तक इनका अघोषित साम्राज्य चलता रहा, भक्तों की आंखों में ये धूल झोंकते रहे, उन्हें ठगते रहे, उन्हें लूटते रहे और खुद अय्याशी करते रहे।

अखाड़ा परिषद की सभा। साभार

तो क्या समाज बन जाएगा संत?

अगर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की उपाधि परंपरा को आज भी सही मान लेते हैं तो देश के तमाम संत या स्वघोषित संत - 14 फर्जी बाबा = स्वच्छ संत समाज का फार्मूला बनता दिखता है। आज अखाड़ा परिषद में इतनी हिम्मत नहीं है कि कोई नया नाम लेकर वो सामने आए जो स्वयंभू संत बना हुआ है, लोगों को ठग रहा है, गलत तरीके से गेरूआ वस्त्र का इस्तेमाल कर रहा है। ये वही नाम हैं जिन्हें भुक्तभोगियों ने उजागर किए हैं। उनके त्याग, परिश्रम और संघर्ष पर अखाड़ा परिषद ने मुहर भर लगायी है। वह भी ऐसा करने को तब बाध्य हुआ है जब उन्हें लगा कि स्वयंभू संतों के कारण जनता भ्रमित हो रही है, उनकी साख मिट्टी में मिल रही है और सही-गलत साधु-संत का सवाल खड़ा हो रहा है। अगर अदालत का फैसला न आया होता, देश में बहस नहीं चली होती तो शायद अखाड़ा परिषद अब भी चेतनाशून्य ही होता।

फर्जी बाबाओं से कैसे मुक्त होगा समाज?

सवाल ये है कि फर्जी बाबाओं के तौर पर पहले से पहचाने जा चुके, अपराधी करार दिए गये या जेलों में बंद या जल्द ही जेल जाने की स्थिति में आ चुके इन 14 लोगों को अगर पहचान लिया जाए, तो क्या समाज ऐसे फरेबियों के जाल से मुक्त हो जाएगा? क्या देश में फर्जी बाबाओं का कारोबार बंद हो जाएगा?

राजनीति और धर्म को अलग रखना ही है रास्ता

राजनीति और इन बाबाओं के बीच जो मधुर संबंध है। दौलत और कारोबार का जो संबंध है, एक-दूसरे को मदद का जो परस्पर संबंध है, उस पर चोट किए बगैर ये कारोबार बंद नहीं हो सकता। लेकिन, इसके लिए फौरी आवश्यकता क्या है, इसे भी अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद को समझना होगा। साधु-संतों को राजनीति से दूर रखते हुए और धर्म को राजनीति से अलग करते हुए जब तक कोई पहल सामने नहीं आती, ऐसा करने की हिम्मत नहीं दिखायी जाती, तब तक ऐसे तत्वों को सत्ता के संरक्षण से आज़ाद नहीं किया जा सकता। अखाड़ा परिषद को यह हिम्मत दिखानी होगी। अन्यथा चमड़ी उनकी भी बचने वाली नहीं है। फर्जी बाबाओं की आग में वे भी जल उठेंगे। 

(लेखक करीब दो दशक से प्रिंट व टीवी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कर रहे हैं।)










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