“सभी मनुष्य हैं सभी मर सकते हैं सभी मार नहीं सकते…”

श्रद्धांजलि , , शुक्रवार , 12-01-2018


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मुकुल सरल

" मैं

मरने के बाद भी

याद करूँगा

तुम्हें


तो लो, अभी मरता हूँ

झरता हूँ

जीवन

की

डाल से


निरन्तर

हवा में

तरता हूँ

स्मृतिविहीन करता हूँ

अपने को

तुमसे

हरता हूँ ।"

- दूधनाथ सिंह

 

प्रख्यात कथाकार, कवि, लेखक, शिक्षक और जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष दूधनाथ सिंह हमारे बीच नहीं रहे। वे 81 वर्ष के थे। 11-12 जनवरी की मध्यरात्रि इलाहाबाद के एक अस्पताल में उन्होंने आख़िरी सांस ली। वे एक साल से प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक फैल गया है। उन्हें जानने और पढ़ने वाला हर व्यक्ति आज दुखी है और उनसे जुड़ी यादों को साझा कर रहा है। जनवादी लेखक संघ (जलेस) समेत जन संस्कृति मंच (जसम) और प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।

साभार


जनवादी लेखक संघ ने उन्हें “चिरयुवा साथी” कहते हुए विदा दी है। अपने शोक संदेश में जलेस ने कहा है:- 

अलविदा, चिरयुवा साथी दूधनाथ सिंह!

‘आख़िरी क़लाम’ जैसे अविस्मरणीय महाकाव्यात्मक उपन्यास और ‘रक्तपात’, ‘रीछ’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘माई का शोकगीत’ जैसी लम्बे समय तक चर्चा में बनी रहने वाली कहानियों के लेखक, जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष आदरणीय दूधनाथ सिंह नहीं रहे। उनका न रहना हिन्दी की दुनिया के लिए और विशेष रूप से जनवादी लेखक संघ के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वे एक साल से प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। लगभग एक हफ़्ते पहले हालत बहुत बिगड़ने पर इलाहाबाद के फिनिक्स अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में उन्हें भर्ती कराया गया था। वहीं 11 जनवरी की रात 12 बजे उनका इंतकाल हुआ।

 

17 अक्टूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के एक गाँव में जन्मे दूधनाथ जी अपनी शुरुआती कहानियों के साथ ही हिन्दी में साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में उभरे थे। सत्तर के दशक की शुरुआत में आलोचना-पुस्तक ‘निराला: आत्महंता आस्था’ के साथ वे आलोचना के क्षेत्र में भी प्रतिष्ठित हुए। सन साठ के आसपास शुरू हुए, तकरीबन साठ वर्षों के अपने रचनात्मक जीवन में उन्होंने कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक, संस्मरण और आलोचना—इन सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया। पूर्वोल्लिखित रचनाओं के अलावा ‘यमगाथा’ नाटक, महादेवी पर लिखी आलोचना-पुस्तक, और संस्मरणों की पुस्तक ‘लौट आ ओ धार’ उनकी यादगार कृतियाँ हैं।

 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1957 में हिन्दी में एम.ए. करने के बाद दूधनाथ जी ने 1959 में कलकत्ता (कोलकाता) के रुंगटा कॉलेज से अध्यापन की शुरुआत की। कलकत्ता रहते हुए ही उन्होंने ‘चौंतीसवां नरक’ शीर्षक से एक उपन्यास-अंश और ‘बिस्तर’ कहानी लिखी जिसे कमलेश्वर के सम्पादन में निकलने वाली ‘सारिका’ पत्रिका ने छापा और पुरस्कृत किया। दो साल बाद वे नौकरी छोड़कर इलाहाबाद लौट आये जहां कुछ समय बेरोज़गारी में गुज़ारने के बाद उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तदर्थ प्राध्यापक के रूप में नौकरी मिली। रचनात्मक कार्य इस बीच लगातार जारी रहा। 1963 में प्रकाशित ‘रक्तपात’ कहानी के साथ कहानीकारों की उस समय उभर रही पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में उनकी पहचान बनी।

साभार


दूधनाथ जी की महत्वपूर्ण पुस्तकों की संख्या बीस से ऊपर है:
उपन्यास—‘आख़िरी क़लाम’, ‘निष्कासन’, ‘नमो अन्धकारम’; कहानी-संग्रह—‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘सुखान्त’, ‘प्रेमकथा का अंत न कोई’, ‘माई का शोकगीत’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘तू फू’; कविता-पुस्तकें—‘अगली शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’, ‘युवा खुशबू’, ‘सुरंग से लौटते हुए’; नाटक—‘यमगाथा’; संस्मरण—‘लौट आ ओ धार’; आलोचना—‘निराला: आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध: साहित्य में नई प्रवृत्तियां’; साक्षात्कार—‘कहा-सुनी’. इनके अलावा उन्होंने ‘भुवनेश्वर समग्र’ और शमशेर पर केन्द्रित पुस्तक ‘एक शमशेर भी है’ का सम्पादन किया। 

 

उन्हें मिलनेवाले पुरस्कारों और सम्मानों में भारत भारती सम्मान, भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान और कथाक्रम सम्मान प्रमुख हैं।

 

सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर सजग और पैनी निगाह रखनेवाले दूधनाथ जी का लेखन अपने समय को इतने कोणों से पकड़ता है कि उन्हें पढ़ना एक युग के आरपार गुज़रने की तरह है। आज हमारा मुल्क जिस दौर में है, वहाँ 2003 में प्रकाशित, बाबरी मस्जिद ध्वंस पर केन्द्रित ‘आख़िरी क़लाम’ को बार-बार पढ़े जाने की ज़रूरत है, जिसकी भूमिका के रूप में लिखे शुरुआती हिस्से में आया यह वाक्य जैसे हमारे समय पर एक इल्हामी टिप्पणी है:

‘हमें इस बात का डर नहीं कि लोग कितने बिखर जायेंगे, डर यह है कि लोग नितांत ग़लत कामों के लिए कितने बर्बर ढंग से संगठित हो जायेंगे।’

ऐसे दूधनाथ जी अब हमारे बीच नहीं हैं। 

माटी का रिश्ता

कवि-पत्रकार और संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर लिखते हैं कि

हमारे प्रिय और प्रेरक रचनाकार जिन्होंने साहित्य की कई विधाओं में अमूल्य योगदान किया है, दूधनाथ सिंह नहीं रहे। हमारा तो उनसे उस माटी के साथ का रिश्ता रहा है जिसमें लोटते-पोटते वे बड़े हुए और इस मुकाम पर पहुंचे। उस माटी की सुगन्ध को उन्होंने खूब फैलाया जिसमें हम सब सुवासित होते रहे। वे जब भी मिलते गले लगा लेते और अपनी माटी की गन्ध अन्दर तक उतर जाती। उनके चले जाने से आज की सुबह कहीं ज्यादा धुंध भरी लग रही है। मन व्यथित है। हम तो ठीक से राजकुमार सैनी, अनवर जलालपुरी और बलदेव बंशी को याद भी नहीं कर पाये कि यह झटका लगा। 2018 की यह साहित्य की दुनिया के लिए कैसी शुरुआत है। हम तो शुभ की आकांक्षा करते है पर नियति अपना खेल खेल ही डालती है। यही जीवन है। दूधनाथजी भले ही भौतिक रूप से न रहें लेकिन वे हमारे दिलों में रहेंगे। उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना, कविता, नाटक, संस्मरण आदि विधाओं में जो विपुल रचा है, वह हमारी थाती है। उसके द्वारा वे हमेशा जीवित रहेंगे। पाठकों को और नई पीढ़ी को रास्ता दिखाते रहेंगे। वे जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं। वे आखिरी कलाम रचते रहे, रचना और विचार के स्तर पर उनका संघर्ष काली शक्तियों के खिलाफ एक नए जनवादी भारत के लिए था। अपने प्रिय रचनाकार दूधनाथ सिंह जी को भावभीनी श्रद्धांजलि और सलाम।

'फ़ीनिक्स' सुनकर लगा था कि...

प्रसिद्ध कवि और संस्कृतिकर्मी पंकज चतुर्वेदी लिखते हैं कि अस्पताल का नाम 'फ़ीनिक्स' सुनकर लगा था कि अपनी ही राख से फिर जी उठनेवाले पक्षी की तरह दूधनाथ जी स्वस्थ होकर घर लौट आयेंगे, शमशेर की उस कविता की मानिंद, जो उन्हें बहुत प्रिय थी--''लौट आ ओ धार..........लौट आ, ओ फूल की पंखड़ी / फिर / फूल में लग जा !'' मगर क़ुदरत को एक आह ही मंज़ूर थी---''मैं समय की एक लंबी आह / मौन लंबी आह।''

दूधनाथ सिंह हिंदी के बड़े लेखक थे। कथाकार होने के बावजूद कविता के मर्मज्ञ। निराला, महादेवी, मुक्तिबोध और शमशेर पर गहन और उत्कृष्ट काम। यह संयोग और किसकी प्रतिभा में घटित हुआ, याद नहीं पड़ता। अब लोग कह रहे हैं कि उन्होंने विधाओं की सीमाएँ तोड़कर एक नये क़िस्म का रचनात्मक लेखन संभव किया। सच यह है कि वह ये हदबंदियाँ जानते ही नहीं थे। वह ज़िंदगी में बहुत गहरे उतरे हुए रचनाकार थे, जहाँ विधागत पार्थक्य का कोई मतलब नहीं रह जाता।

एक अनूठे गद्यकार, नाटककार, कथाकार, आलोचक और कवि तथा सम्मोहनकारी वक्ता दूधनाथ सिंह का श्रेष्ठ और बहुआयामी काम मेरे जैसे पाठकों के लिए रौशनी की मीनार की तरह है, जिसके सान्निध्य में कभी भी सही राह की तलाश मुमकिन है। उन्हें बहुत सम्मान और शोहरत हासिल हुई। इसके बावजूद कहना पड़ता है कि जो उनका प्राप्य था, वह उन्हें नहीं मिला। कुछ कमी रह गयी। एक स्पष्टवक्ता और मूल्यनिष्ठ प्रतिभा के प्रति हिंदी में आम तौर पर जो अवज्ञा का भाव रहता है, शायद वही इसकी वजह है और इसके चलते उनके व्यक्तित्व में मैत्रीजन्य मिठास के साथ नीम की पत्तियों का-सा कुछ कसैलापन रहता था। फिर भी दूसरों की रचनात्मक क्षमता को पहचानने और उसे भरसक प्रोत्साहित करने में उनका कोई सानी न था।

इस दुनिया में जहाँ लिखने के मामले में हताशा के ही स्रोत और सबब ज़्यादा हैं, दूधनाथ सिंह ने इस एहसास की लौ मुझमें लगायी कि लिखना अपने आप में स्पृहणीय है, उससे क्या होता है, वह एक दीगर सवाल है। काश मैं उनसे कह सकता कि उनका यह अमूल्य तोहफ़ा हमेशा मेरे साथ रहेगा।

"साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठन ज़रूरी"

दूधनाथ जी साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठन को बहुत ज़रूरी मानते थे। उनसे मेरी (मुकुल सरल) पहली रूबरू मुलाकात 29 अप्रैल 2017 को दिल्ली में जलेस के मुक्तिबोध पर आयोजित परिसंवाद कार्यक्रम में हुई थी। उस समय नहीं पता था कि यही अंतिम मुलाकात भी साबित होगी। उस दौरान अलग से बात भी हुई और उसमें उन्होंने आज के राजनीतिक हालात पर चिंता जताते हुए इसमें बदलाव के लिए जनता की चेतना का स्तर उठाने की बात कही थी। उनका कहना था कि जनता की चेतना का स्तर उठाने का काम जारी रहना चाहिए। इससे सत्ता परेशान होती है और ध्यान देती है। बातचीत में उनका सहज मुस्कुराता चेहरा आज भी आंखों के सामने है। उनके ‘आख़िरी क़लाम’ को आख़िरी सलाम!

 

और अंत में… 

तुम्हारे दिन लौटेंगे बार-बार

 

तुम्हारे दिन लौटेंगे बार-बार

मेरे नहीं। तुम देखोगी यह झूमती हरियाली

पेड़ों पर बरसती हवा की बौछार

यह राग-रंग

तुम्हारे लिए होंगी चिन्ताएं

अपरम्पार ख़ुशियों की उलझन

तुम्हारे लिए होगी थकावटें,

जंगल का महावट

पुकारेगा तुम्हें बार-बार।

फ़ुर्सत ढूंढोगी जब-तब

थकी-हार तब तुम आओगी

पाओगी मुझे झुंझलाओगी

सो जाओगी कड़ियां गिनते-गिनते सौ बार।


इसी तरह आएगी बहार

चौंकाते हुए तुम्हें

तुम्हारे दिन।

...

 

सभी मनुष्य हैं


सभी मनुष्य हैं

सभी जीत सकते हैं

सभी हार नहीं सकते।


सभी मनुष्य हैं

सभी सुखी हो सकते हैं

सभी दुखी नहीं हो सकते।

सभी जानते हैं

दुख से कैसे बचा जा सकता है

कैसे सुख से बचें

सभी नहीं जानते।


सभी मनुष्य हैं

सभी ज्ञानी हैं

बावरा कोई नहीं है

बावरे के बिना

संसार नहीं चलता।


सभी मनुष्य हैं

सभी चुप नहीं रह सकते

सभी हाहाकार नहीं कर सकते

सभी मनुष्य हैं।


सभी मनुष्य हैं

सभी मर सकते हैं

सभी मार नहीं सकते


सभी मनुष्य हैं

सभी अमर हो सकते हैं।

-दूधनाथ सिंह

(सभी कविताएं 'कविता कोश' से साभार)

 






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