फीफा वर्ल्डकप: जीत की बुनियाद में हैं फ्रांस के बहु नस्ली खिलाड़ी

देश-दुनिया , , शनिवार , 14-07-2018


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जनचौक ब्यूरो

(फीफा वर्ल्डकप कप में एक महत्वपूर्ण चीज देखने को आई है। इसमें एक नस्ल वाली टीम की जगह कई नस्लों के खिलाड़ियों से सुसज्जित टीम के हाथ विजय लगी है। फ्रांस की बहुरंगी टीम ने जीत हासिल कर सबको चौंका दिया है। इस जीत के बाद वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण एवं इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील केके राय ने अपने-अपने फेसबुक पर जीत के कारणों पर विस्तार से प्रकाश डाला है।-संपादक)

नई दिल्ली।

कमल कृष्ण राय:

अब जब महाबलियों का पतन हो चुका है। ब्राज़ील, अर्जेंटीना, पुर्तगाल, इंग्लैंड दर्शक दीर्घा में पहुंच चुके हैं। पेरिस के चारों तरफ फैली मुम्बई के धरावी जैसी गरीब बस्तियों में करीब एक करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं। ये गुआना, माली, अल्जीरिया जैसे देशों से शरणार्थियों की तरह आए, गरीबी ढोकर लाए,नालों,नाबदानों, कूड़ों के अम्बार में अपनी झुग्गियां बना ली। इनका इलाका तस्करी, ड्रग स्मगलिंग, देह व्यापार, हथियार बेचने के लिए बदनाम है। फ्रांस की आतंकी घटना भी यही से है। पर फुटबॉल इनका नशा हैं ।

Fassou रोइसी के जिस sub urb में आए वहां एक स्कूल और 73 फुटबॉल के मैदान। Kylian Mbappe, Baise Matuidi सब इन्हीं मलिन बस्तियों से लिकले। इसके अलावा विश्व फुटबॉल के चमकते सितारे Thierry Henry, Vieira, Lilian Thuram, Anelka, ये सब इन्हीं बस्तियों में नंगे पांव फुटबॉल खेलना शुरू किया।1998 में फ्रांस का हीरो बना जिदान भी अल्जीरिया से शरणार्थी बन कर इन बस्ती में बचपन गुज़ारा। किंवदंती बन चुके कोच अरसेन वेंगर ने इन अपराध नशे के नाम से बदनाम रहे मलिन बस्तियों को पाओलो साइलो कहा है।

क्रोशिया के चरम राष्ट्रवाद से झूमते खिलाड़ियों की यही पृष्ठभूमि है। कौन भूल सकता है जब क्रोशिया ने रशिया को हराया तो उसके अलमस्त मिडफील्डर Domagoj Voda गली से यूक्रेन का चिन्ह बना कर दौड़ पड़े।नशा कभी खेल के साथ भी चल पड़ता है और गरीब, काले होने की पीड़ा और गुस्सा भी। अगर दुनिया के महानायक, क्यूबा के फ़िदेल कास्त्रो न होते तो माराडोना बदनामी में ही मर मिट जाते।कभी यूट्यूब पर Garichcha को देखिए।वह ब्राज़ील में पेले के बराबर का खिलाड़ी था।पेले ने खुद कहा कि जब तक गरिचा टीम में थे, ब्राज़ील एक भी मैच नही हारा। एक सुबह सफाईकर्मी को शहर के नाले में एक औंधे मुंह पड़ी लाश मिली। कपड़े फ़टे हुए थे। पैर में चोट थी। उसे नाले से निकाल कर सड़क पर सीधा लिटा दिया गया। कोई पहचान नही पा रहा था। भीड़ जुट रही थी तभी एक बूढ़ी औरत चीख कर रो पड़ी, ये तो गरिचा है।

चंद्रभूषण:

दोनों अमेरिकी महाद्वीपों के बीच में अटलांटिक महासागर के छोटे-छोटे द्वीपों और तटीय देशों का एक घेरा कैरिबियंस के नाम से जाना जाता है। यूरोपीय मूल की गोरी जातियों के दबदबे वाले दोनों अमेरिकी महाद्वीपों के विपरीत 30 देशों में बंटी कैरिबियंस की साढ़े चार करोड़ आबादी में काली और सांवली जातियों का आधिपत्य है, जिनमें एक हिस्सा भारत से ले जाए गए गिरमिटिया मजदूरों के वंशजों का भी है। मोटे तौर पर यहां 3 करोड़ अफ्रीकी और 15 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इनके अलावा बाकी आबादी यूरोपियन, रेड इंडियन और मिश्रित नस्ल की है। यहां के 30 देशों में 13 स्वतंत्र हैं और 17 की नाल अलग-अलग स्तर की स्वायत्तता के साथ किसी न किसी ताकतवर देश से जुड़ी है।

पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों में दुनिया खेतिहर दौर से औद्योगिक दौर की तरफ बढ़ी तो ये सारे देश अचानक दुनिया के नक्शे से ही टपक जाने की स्थिति में आ गए। कारण यह कि जहाजी मकसद के अलावा इन्हें मुख्यत: गन्ने तथा कुछ अन्य नकदी फसलों की खेती के लिए ही बसाया गया था।

बहुत थोड़ी सी आदिम आबादी वाले ये बियाबान इलाके बमुश्किल दो सौ साल औद्योगिक यूरोपीय दुनिया के काम के रहे, फिर खेती उसके लिए मुनाफे के बजाय घाटे का सौदा बन गई। थोड़े-बहुत टूरिज्म और शिपिंग को छोड़ दें तो बड़ी पूंजी की रुचि इधर इनमें बिल्कुल ही खत्म हो गई है। अभी सूचना क्रांति के साथ उभरे दुनिया के नए उद्यमी नक्शे में कुछ भारतीयों और भारतीय-अमेरिकियों की पहचान भी बड़े खिलाड़ियों जैसी बन रही है।

ऐसे में इस इलाके के साथ पहले से मौजूद अपना सांस्कृतिक लगाव बढ़ाकर और पूंजी तथा कूटनीति के सटीक उपयोग के जरिए कैरिबियंस को कनाडा के बाद नई दुनिया के दूसरे,और अधिक सघन भारतीय प्रभाव क्षेत्र के रूप में विकसित करना इक्कीसवीं सदी के लिए भारत के राष्ट्रीय एजेंडे का अहम हिस्सा होना चाहिए। जाहिर है,अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के उद्यमियों को इसके लिए तैयार किया जा सके तो यह काम काफी आसान हो जाएगा।


 








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