परमाणु: द स्टोरी ऑफ पोखरण

सिनेमा , , सोमवार , 28-05-2018


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दीपांकर यादव

जॉन अब्राहम बताते हैं कि जब अभिषेक शर्मा उनके पास इस कांसेप्ट को लेकर आए तो वो चकित थे कि अब तक किसी ने फिल्म बनाने के लिए इस विषय को चुना क्यों नही! भारत जैसे देश में जहां एक निर्वाचन क्षेत्र का उपचुनाव भी राष्ट्रीय दिलचस्पी का विषय होता है, राजनैतिक विषयों पर बहुत कम फिल्में बनती हैं। और हर संवेदनशील व्यक्ति को इस बात पर ताज्जुब होना चाहिए कि भारतीय इतिहास और राजनीति की इतनी महत्वपूर्ण और युगांतकारी घटना अब तक फिल्म जगत का तवज्जो क्यों नही पा सकी थी?  ‘परमाणुः द स्टोरी ऑफ पोखरण’ फैक्ट और फिक्शन मिश्रित हिस्टोरिकल ऐक्शन थ्रिलर फिल्म है जिसे निर्देशित किया है अभिषेक शर्मा ने। 

जैसा कि फिल्म के टाइटल से ही स्पष्ट है कि फिल्म की कहानी 1998 में पोखरण में हुए परमाणु परीक्षण के इर्द गिर्द बुनी गई है। इंजीनियर और आईएएस अश्वत्थ रैना का एक ख्वाब है कि दुनिया के तमाम ताकतवर मुल्कों की तरह हिंदुस्तान भी परमाणु शक्ति सम्पन्न मुल्कों में शामिल हो। मगर उस वक्त के वैश्विक हालात भारत के पक्ष में नहीं थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका इकलौता और सर्वशक्तिमान महाशक्ति बन चुका था। पाकिस्तान उसके करीबी सहयोगियों में से था। हिंदुस्तान के परमाणु परीक्षण की राह में सबसे बड़ा रोड़ा थे अमेरिका और पाकिस्तान। उनकी खुफिया एजेंसीज सीआईए और आईएसआई हिंदुस्तान के हर कदम पर नजर रखे हुए थे।

1995 में एक बार नाकाम हो जाने के बाद नई सरकार में प्रधानमंत्री के निजी सचिव मिस्टर शुक्ला (बमन ईरानी) एक बार फिर से अश्वत्थ को परमाणु परीक्षण का नेतृत्व सौंपते हैं। अश्वत्थ और टीम के सामने चुनौती है कि सीआईए और पूरी दुनिया की नजरों से बचा के इतने बड़े मिशन को कैसे अंजाम दिया जाए! और इस मिशन के दौरान अश्वत्थ को राष्ट्रप्रेम और पारिवारिक जिंदगी के टकराहटों से भी गुजरना पड़ता है।

फिल्म में दिखाया गया है कि देश की खातिर कुछ करने का जुनून हो तो निजी दुश्वारियां भी प्रेरणा बन सकती हैं। पत्नी के नाराज हो जाने के बाद जब अंबालिका (डायना पेंटी) अश्वत्थ को दिलासा देती हैं ‘‘कभी-कभी एक शक ऐसे घर कर लेती है कि सच्चाई नाक के नीचे होते हुए भी नजर नहीं आती।’’ तो अंबालिका की इस बात से मुतासिर होकर अश्वत्थ मिस्टर शुक्ला को एलओसी पर टेंशन बढ़ाने के लिए राजी करता है ताकि अमेरिकी सैटेलाइट्स का ध्यान भटकाया जा सके।

एक दृश्य में अध्यापक बच्चों को ‘अहिंसा परमो धर्मः’ व्याख्यायित कर रहा है कि तभी क्लास के बीच से आईएसआई एजेंट और उसके पीछे अश्वत्थ भागते हैं और अध्यापक गिर पड़ता है। यह एक प्रतीक है, और 1962 की हार के बाद एक सबक भी कि अगर दुश्मन देश धमकी, हिंसा और जंग पर आमादा हो तो शांति की सारी बातें बेमानी हैं। यदि एक मुल्क के रूप में हमें अपनी आजादी, स्वायत्तता, और स्वाभिमान बचाए रखना है तो खुद को सामरिक तौर पर मजबूत करना ही पड़ेगा। इसका दूसरा पहलू ये है कि परमाणु शक्ति सम्पन्न होने भर से शायद जंग की नौबत ही न आए!

सच्चाई कल्पना से ज्यादा प्रेरणादायी होती है। देशभक्ति की भावना ऐसी घटनाएं या कहानियां भरती हैं, कोई भाषण या नैतिक शिक्षा नही। ‘परमाणु’ बिना शब्दजाल या युद्ध-प्रियता दिखाये दर्शकों को राष्ट्रप्रेम की भावना से ओतप्रोत करती है। अभिषेक शर्मा कहते हैं कि पोखरण परमाणु परीक्षण ऐसा वाकया था जिस पर कोई भी हिन्दुस्तानी गर्व करेगा। यह फिल्म मिशन से जुड़े फौज और वैज्ञानिकों को शुकराना है, जो साधारण आदमी थे, मगर उन्होंने असाधारण मिशन को अंजाम दिया।

फिल्म का दूसरा टाइटल भी हो सकता था - ‘पोखरण’,वह जगह जो कहानी का केंद्र है और अहम किरदार भी। एक दृश्य में मेजर साहब बताते हैं कि पोखरण का मतलब पांच मृगतृष्णाओं वाला क्षेत्र (द लैंड ऑफ फाइव मिराज्स )।

बतौर निर्माता ‘मद्रास कैफे’ के बाद जॉन ने मुख्तलिफ विषयों के साथ ज्यादा लोगों तक पहुंच बनाने के लिए कुछ रणनीतिक बदलाव किए हैं, मसलन- टाइटल हिन्दी में रखना,आमफहम गाने रखना और थोड़ा सा मेलोड्रामा। हालांकि जॉन इसे नान फार्मूला फिल्म कहते हैं मगर परमाणु के लिए उनका यही फार्मूला है।

जॉन अब्राहम और डायना पेंटी अपने किरदार में जंचते हैं। बस जॉन गठे हुए और सुडौल शरीर में आइएएस से ज्यादा फौजी लगते हैं, इसके बावजूद कि वो कपड़ों में अपना शरीर छुपाने की भरसक कोशिश करते हैं। बमन ईरानी गंभीर किरदार में होने के बावजूद अपने चेहरे के हाव भाव से कामिक स्थिति लाते हैं। बमन छोटी सी भूमिका में प्रभाव छोड़ते हैं। बाकी सह कलाकारों ने भी अपना अपना किरदार बखूबी निभाया है।

फिल्म में केंद्रीय किरदार अश्वत्थ के इर्द गिर्द पर्याप्त हीरोइज्म भी दिखाया गया है। सारी योजना उसकी है, टीम उसकी है, निर्णय उसके हैं और जिम्मेदारी भी। जबकि परमाणु परीक्षण जैसी बड़ी योजना में एक व्यक्ति पर इतनी ज्यादा निर्भरता मुमकिन नहीं!

हां, सीआईए और आईएसआई एजेंट्स के अलावा फिल्म में एक महत्वपूर्ण खल चरित्र का किरदार अदा किया है अमेरिकन सैटेलाइट- LACROSSE ने। उसका नियमित अंतराल पर आना और पोखरण की गतिविधियों पर नजर रखते हुए दिखाना फिल्म में थ्रिल लाता है।

सचिन-जिगर और जीत गांगुली का संगीत कानों को सुकून देता है। वायु के बोल ‘शुभ दिन’, ‘थारे वास्ते’,और ‘कसूम्बी’ का जिक्र जरूरी है। और आखिर में जॉन को दाद देनी पड़ेगी कि एक निर्माता और अभिनेता के तौर पर उन्होंने इस मुश्किल विषय पर फिल्म बनाने का जोखिम लिया।

       (दीपांकर यादव इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र हैं।)








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mohit :: - 05-29-2018
seede mudde ki bat kare to movie bna ne ke kuch objective hai jo samnya jan samjh sakta hai 1) bjp ki 4 sal ki vifalta nakami ko 2018-19 ke election purv shri atal bihari bajpai ji ke nam par chupana . or election me bjp ke khilaaf bane mahool (anti incumbency ) ko kam karna. 2) desh bhakti ki chasni chta kar desh ke asli muddo se desh ki yuva peedi ko gumraah karna. 3) desh bhakti ki afeem chata kar desh ke yuva ko bjp dwara desh ke savidhan ko khatm kiye jane bale hamle se dhyan hatana. 4) desh bhakti ka afeem chata kar desh ke bike huey media ke against jo mahool desh me dhere dhere paida ho raha tha uski teevrta ko kam karna. 5) desh bhakti ke nam par modi ke agoshit aapatkaal ke anubhav ko kam karna. 6) congress ko nikkmaa shabit karna jabki desh ko pta hai ki bharat me 1st nulear test kabka ho chuka tha. 7) bjp ke rajya sabha sansad zee group ke malik ki zee company ne movie ke media partner ke rup me apni puri puri jimmewari nibhyi hai. 8) john abrahim ne movie me scrpit ke according kam kiya its good lekin john abrahim ko bjp ko direct or indirect prmote activity se khud ko door rakhna chahiye jesa aajkal khiladi kumar BJP ke doot ban kar apni saakh par battaa lga rahe hai ab khiladi kumar ki bicycle kha hai jab petrol ka price aasman me pahuch chuka hai, dekha jaaye to ye sahi mayne me samaj ke hero nahi bna sakte ye bas apne jeebe bharne or apne eso aaram ke liye jene bale khatmal hai ye bahi rehte hai jha inki growth bni rahe iske ulat inko desh or samaj se koi lena dena nahi hai. lekin kitni bhi movie bjp bana le ye desh election me inko sabak shikha kar manega. bjp me hai dum to ballet se election karva ke dekh le. doodh ka doodh or paani ka paani ho jayega. or desh bhi dekh lega tumhare so called chankya me kitni dum hai.