फुटबाल विश्वकप में देशों की जीत-हार के गहरे हैं सांस्कृतिक-राजनीतिक निहितार्थ

बदलाव , , सोमवार , 16-07-2018


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रमाशंकर सिंह

फ्रांस ने क्रोएशिया को 4-2 से हराकर फुटबाल का विश्वकप जीत लिया है। इससे पहले फ्रांस ने 1998 में विश्व कप का फाइनल मैच जीता था। फ्रांस का विश्व कप जीतना या क्रोएशिया का हार जाना केवल खबर भर नहीं है। इसके व्यापक सांस्कृतिक और इस कारण राजनीतिक निहितार्थ भी हैं।

जिस प्रकार से सोशल मीडिया और चौक चौराहों पर इस खेल को लिया जा रहा है, वह काफी आशाजनक बात है। ऐसा हमेशा होता है कि भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल में बेहतरीन प्रदर्शन न कर पाने के बावजूद इन खेलों की प्रशंसा करता है। एक नौजवान देश के लिए यह अच्छी बात है जहां जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा ऐसे रोगों से ग्रस्त है जो आलस के कारण होते हैं। देश में मधुमेह का प्रकोप बढ़ता जा रहा है और बेरोजगारी भी, ऐसे में क्रिकेट एक सुकून और धर्म बन जाता है, समय बिताने के लिए क्रिकेट एक अच्छा जरिया बन जाता है और क्रिकेट के खिलाड़ी देवता।

आज से दो दशक पहले केरल और कोलकाता का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य फुटबाल से निर्धारित होता था। गुटों का बन जाना आम बात थी। ऐसा पूर्वोत्तर भारत में भी था। यह आज भी है। पहले दिल्ली, पुणे, मुंबई और बंगलूरू को छोड़कर अन्य शहर फुटबाल की दीवानगी से अछूते रहते थे। अब ऐसा नहीं रह गया है। वास्तव में औपनिवेशिक अनुभव से गुजरे भारत के लिए फुटबाल किसी मुक्ति से कम नहीं था और आजाद भारत में इसने वह मुकाम हासिल नहीं किया जो क्रिकेट को हासिल हुआ।

एक उदारीकृत अर्थव्यवस्था से जुड़ने, नए सामाजिक समूहों के उभरने और इंटरनेट के द्वारा दुनिया से तेजी से जुड़ने के कारण भारत के युवा फुटबाल सहित अन्य खेलों के प्रति दीवाने हो रहे हैं। 2006 का फुटबाल विश्वकप पहला विश्वकप था जिसे उस समय आर्कुट जैसी सोशल मीडिया वेबसाइट पर काफी हिट मिली थी। फेसबुक और ट्विटर पर भी इसकी चर्चा हो रही थी लेकिन 2018 में दृश्य बदल गया है। स्मार्टफोन और बहुत ही सस्ते दरों पर मिलने वाले इंटरनेट कनेक्शन की वीडियो स्ट्रीमिंग ने खेलों के देखने के अनुभव को विकेंद्रित कर दिया है। भारत के लोगों ने यह फ़ुटबाल विश्वकप इंटरनेट के माध्यम से देखा-चलते-फिरते, काम करते समय या यात्रा में। शिमला, जहां पर फुटबाल का कोई बड़ा मैदान नहीं है, में भी मैंने यह दीवानगी नोट की।

इस माहौल में फुटबाल विश्व कप के प्रति नौजवानों की दीवानगी काफी मायने रखती है। मेरे दोस्त और शिमला के उच्च अध्ययन संस्थान में फेलो के रूप में काम कर रहे मैथ्यू वर्गीज ब्राजील की फुटबाल टीम के दीवाने रहे हैं। केरल के परंपरागत फुटबाल प्रेमी परिवार के मैथ्यू इस फुटबाल कप में ब्राजील का समर्थन कर रहे थे लेकिन जब ब्राजील की टीम विश्व कप से बाहर हो गयी तो वे क्रोएशिया का समर्थन करने लगे। फ़ाइनल मैच में जब क्रोएशिया हार गयी तो उन्होंने भरे दिल से फ्रांस की टीम के लिए कहा कि वे अच्छा खेले, विशेषकर तीसरे गोल के बाद। देबजानी हल्दर भी क्रोएशिया की हार से दुखी थीं।

असम के रहने वाले इतिहास के प्रोफेसर डी. नाथ मैच समाप्त होने के अंतिम दस मिनट और उसके अतिरिक्त पांच मिनटों में भी क्रोएशिया के जीतने की आशा बांधे हुए थे। छत्तीसगढ़ के निवासी और सेंट स्टीफेंस में अध्यापन करने वाले डा. आदित्य प्रताप देव और केरल के रहने वाले और कालीकट विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नारायणन मुंडोली फ्रांस के बारे में आश्वस्त थे। उन्नाव, उत्तर प्रदेश के रहने वाले और शिमला में फेलो डा. अजय कह रहे थे कि फ्रांस ने यह मैच ब्लैक खिलाड़ियों के बल पर जीता है। अजय समाजशास्त्र में पीएचडी हैं और दलित मुद्दों पर काम करते हैं। उनका मानना है कि फ्रांस की टीम का सामाजिक आधार विस्तृत और विविध हो रहा है, यह बात उसके पक्ष में जाती है। यही बात रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हितेंद्र पटेल भी कहते हैं। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है कि फ्रांस की टीम को अफ्रीकी आधार का लाभ मिला है।

मैं यह सब बातें इसलिए बता रहा हूं कि इससे पता चले कि एक देश के रूप में भारत फुटबाल को कैसे देखता है और क्रिटिकल क्षणों में उसके प्रति कैसी प्रतिक्रिया देता है। 15 जुलाई की शाम को शिमला के एक घर में भारत के कई हिस्सों के लोग इकठ्ठा हुए और उन्होंने मैच देखा। उन दर्शकों में मैं भी था। इस दौरान जीत-हार से परे वह बातचीत भी महत्वपूर्ण थी जो इस दौरान उसके दर्शक आपस में कर रहे थे, यहाँ तक कि मजाक भी।

शुरू-शुरू में क्रोएशिया के छोटे देश होने के कारण दो तीन दर्शक उसके पक्ष में थे कि क्रोएशिया ने लम्बी राह तय की है और इसके लिए उसकी टीम विजय की हक़दार है। इतने में अंग्रेजी भाषा और भारतीय इतिहास के दो प्रोफेसरों ने कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि क्रोएशिया का नस्लवाद को लेकर क्या रवैया रहा है और नस्ल को लेकर हजारों लोगों का खून बहाया गया है।

इसी बीच एक इतिहासकार दर्शक ने कहा कि यह सब तो ठीक है लेकिन फ्रांस की भी इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि अपने एक अभिजात्य इतिहास के बावजूद उसने ब्लैक खिलाड़ियों को जगह दी है और यह उनके जीवन में सबसे बेहतरीन क्षण है जब वे फ़्रांस के झंडे के तले खेल रहे हैं। फुटबाल के खेल और यूरोप में नस्लभेद का एक लंबा इतिहास रहा है और इससे उबरकर यह दुनिया की सभी नस्लों के प्रति एक सम्मान भावना यदि खेल के मैदान में दिखे या खेल के मैदान से यह भावना समाज में जाए तो यह विश्वकप दुनिया भर के अल्पसंख्यक समूहों के लिए एक नया सन्देश लेकर जाएगा।

बात यह भी हुई कि क्रोएशिया की राष्ट्रपति कोलिंदा कितारोविक ने अपने खिलाड़ियों का न केवल हौसला बढ़ाया बल्कि फ्रांस के राष्ट्राध्यक्ष से वे जिस दोस्ताना तरीके से मिलीं, वह भी मन को मोह लेने वाला है।

और इसी बीच भारत के लाखों खेल प्रेमी अपने फेसबुक पेज पर लिख रहे हैं: फ्रांस ने फ़ुटबाल का विश्वकप जीता लेकिन क्रोएशिया ने दिल जीत लिया है। मुझे क्रोएशिया के कप्तान का भावपूर्ण चेहरा याद आ रहा है जो अब से कुछ ही घण्टों पहले मैंने टीवी पर देखा है।

(लेखक रमाशंकर सिंह शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान फेलो हैं।)








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Dharm Prakash Dwivedi :: - 07-16-2018
Nice analysis