जब गांधी ने कहा कि ‘मेरी क्रिसमस’ ख़ुश रहने की महज एक ख़ाली-ख़ाली कामना

विशेष , , मंगलवार , 25-12-2018


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जनचौक ब्यूरो

आज 25 दिसंबर है, ईसा मसीह का जन्म। ईसा मसीह का संपूर्ण जीवन करुणा और अहिंसा के लिए समर्पित रहा। करुणा और अहिंसा मिलकर ही मनुष्य के जीवन में शांति ला सकते हैं। क्योंकि शांति के बिना ख़ुश रह पाने का कोई कारण नहीं है, इसलिए ईसा मसीह के जन्म दिन पर ‘मेरी क्रिसमस’ कहने का चलन है। मगर महात्मा गांधी इस चलन पर कुछ व्यावहारिक सवाल उठाते हैं।

गांधी दूसरे गोलमेज सम्मेलन से लौट रहे थे, तो जहाज़ में उनके सफ़र के दौरान ही 25 दिसंबर की तारीख़ भी पड़ी थी। 25 दिसम्बर 1931 गांधी जी को उनके ईसाई सहयात्रियों ने उन्हें इस मुद्दे पर एक सम्भाषण के लिए प्रेरित किया। ईसाई सहयात्री जानना चाहते थे कि इस ‘मेरी क्रिसमस’ के बारे गांधी जी के क्या विचार हैं। गांधी जी ने इस मौक़े पर जो कुछ कहा, वह उनके अख़बार हरिजन में उसी साल यानी 1931 के 31 दिसंबर को छपा था। प्रस्तुत है उन्हीं संदेशों के कुछ अंश:

 “हालांकि आकाश और पृथ्वी पर शांति बने रहने के लिए हमने भगवान के सभी तरह के महिमा गान किये हैं, लेकिन लगता है कि आज न तो भगवान की महिमा ही बची है और न ही पृथ्वी पर शांति रह गयी है। जब तक कि धरती पर भूख और असंतुष्टी बनी हुई है; जब तक कि मसीह पैदा नहीं होते, तब तक हमें निरंतर आगे की तरफ़ देखना होगा। जब वास्तविक शांति स्थापित हो जायेगी, तो हमें किसी तरह की शांति के दिखावे की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी, बल्कि तब तो इसकी अनुगूंज हमारे जीवन में भी सुनायी देगी- जीवन का मतलब सिर्फ़  व्यक्तिगत जीवन नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट जीवन में भी यह शांति सुनायी-दिखायी पड़ेगी।

तभी हम कह सकेंगे कि मसीह का जन्म सही मायने में धरती पर हो गया है। मेरे लिए तो मसीह के यशगान का वास्तविक अर्थ यही है। फिर तो हम मसीह के जन्म के रूप में वर्ष के किसी दिन विशेष को लेकर बिल्कुल नहीं सोचेंगे, बल्कि एक निरंतर घटती घटना को उस रूप में देख सकेंगे, जिसे हर एक के जीवन में लागू किया जा सके। यह किसी एक के जीवन में नहीं, बल्कि हर एक के जीवन में शामिल होगा, यह कभी नहीं समाप्त होने वाली एक ऐसी घटना होगी, जो शांति की तरफ़ निरंतर बढ़ती रहेगी ।

इसलिए, जब कोई इसके पीछे के अर्थ को जाने-समझे बिना "ए मेरी क्रिसमस" की कामना करता है, तो मुझे यह एक रटे-रटाये किसी ख़ाली-ख़ाली नुस्ख़े से ज़्यादा कुछ नहीं दिखता है। जब तक कोई सभी के जीवन लिए शांति की कामना नहीं करता, तब तक कोई अपने लिए भी शांति की कामना नहीं कर सकता। यह यूक्लिड के स्वयंसिद्ध सिद्धांत की तरह एक स्पष्ट रूप से स्वयंसिद्ध सच है कि जब तक चारों ओर शांति के लिए एक तीव्र लालसा न हो, तब तक किसी भी व्यक्ति को शांति नहीं मिल सकती।

आप निश्चित रूप से संघर्ष के बीच में शांति का अनुभव कर सकते हैं, लेकिन ऐसा तभी होता है जब संघर्ष को समाप्त करने के लिए आप अपने संपूर्ण जीवन को ही नष्ट कर देते हैं, आप खुद को क्रूस पर चढ़ा देते हैं। और इसलिए, जैसा कि हमें मालूम है कि चमत्कारिक रूप से होने वाला जन्म एक शाश्वत घटना है, वैसे ही इस तूफानी जीवन में क्रॉस एक शाश्वत घटना है। इसलिए, हम बिना मृत्यु के जन्म के बारे में सोचने का साहस ही नहीं जुटा पाते। जीवित मसीह का अर्थ ही है, एक जीवित क्रॉस, इसके बिना जीवन एक ज़िंदा लाश है। 

(अंग्रेजी के इस मूल लेख का हिंदी में अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र चौधरी ने किया है।)

 

 










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