वे गांधी की हत्या नहीं कर पाए, लेकिन अब उसी ओर बढ़ रहे हैं!

जयंती पर विशेष , , सोमवार , 02-10-2017


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आशुतोष कुमार

...वे गांधी की हत्या नहीं कर पाए। मगर उनका संकल्प बिल्कुल कमजोर नहीं पड़ा है। वे धीरे-धीरे लेकिन दृढ़ कदमों से गांधी की हत्या करने के अपने चरम लक्ष्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं।

(“GANDHI And the Unspeakable HIS FINAL EXPERIMENT WITH TRUTH” …JAMES W. DOUGLASS की किताब पढ़ते हुए हिंदी के वरिष्ठ आलोचक आशुतोष कुमार की ओर से की गई विशेष टिप्पणी।- संपादक)

साभार

'कलकत्ता चमत्कार' 

गांधीजी को बंगाल-बिहार में विभाजन बाद के दंगों को रोकने में कामयाबी कैसे मिली?

उन्होंने एक छोटा-सा प्रयोग किया।
वे सबसे पहले भीषण हिंसा से ग्रस्त बंगाल के मुस्लिम बहुल नोआखली जिले पहुंचे। अकेले।
उन्होंने अकेले ही इलाके में घूमना शुरू किया।
जो स्थानीय कांग्रेसजन उन्हें मिले, उनसे भी कहा, कोई समूह में या जोड़े में नहीं जाएगा। कोई मेरे साथ भी नहीं आएगा। सब अलग अलग इलाके में अकेले अकेले घूमो। निहत्थे।
इस पुस्तक के कवर पर इसी अकेले घूमते गांधी की तस्वीर है।
यह एक अद्भुत संदेश था। हम आपके भीतर बैठे मनुष्य पर आँख मूँद कर भरोसा करते हैं। आप चाहो तो इस भरोसे को तोड़ दो, हमारी हत्या करके।
लोगों ने कोशिश की। उन्हें जगह जगह गालियां और धमकियां सुनने को मिली।
उनके रास्ते में मलमूत्र फैलाया गया। उन पर गंदगी डाली गई। दोएक बार उन्हें लिंच करने की कोशिश की गयी।
एक बार एक मुसलमान ने उनका गला इतनी देर तक दबाए रखा कि उनकी आंखें उलटने लगीं।
गांधीजी कम पागल थोड़े न थे। मुस्कुराते रहे।
अभागा हत्यारा माफ़ी माँगता रोता हुआ भागा।
कलकत्ते में हुई शांति इतनी आश्चर्यजनक थी कि उसे 'कलकत्ता चमत्कार' कहते हैं।

नोआखली में गांधी जी। साभार : गूगल

'सुरक्षा में जीने से मर जाना पसंद करुंगा'

बाद में यही प्रयोग बिहार के हिन्दू बहुल इलाकों में दुहराया गया।
दिल्ली में जब उनकी प्रार्थना सभा में बम फूटे तो सरकार ने कहा, अब कुछ तो सुरक्षा लेनी पड़ेगी, बापू।
घामड़ बापू ने कहा, सुरक्षा में जीने से मर जाना पसंद करूंगा।
फिर क्या था, कायर हत्यारों को मौक़ा मिल गया।
उन्हें तो गांधीजी को मारना ही था। उनके सामने सवाल एक व्यक्ति का नहीं एक विचारधारा का था। उन्हें भारत की मेलजोल की संस्कृति से नफ़रत थी। उन्हें गंगा जमनी हिन्दुस्तानी तहजीब से नफ़रत थी। उन्हें नरसी मेहता के वैष्णव सिद्धांत से घृणा थी।
वे मुसोलिनी के दीवाने थे। हिटलर उनकी धड़कनों का राजा था। उन्हें सबसे अधिक बौद्ध करुणा, सत्य और अहिंसा से घृणा थी।

वे दशकों से गांधीजी की हत्या की योजना बना रहे थे।

वे सावरकर के शिष्य और अनुयायी थे। यह बात गोडसे ने अपने अदालती बयान में कही है।

साभार : गूगल

क्या हत्यारे कामयाब होंगे?
लेकिन सब बेकार साबित हुआ। वे गांधी की हत्या नहीं कर पाए।
मगर उनका संकल्प बिल्कुल कमजोर नहीं पड़ा है। वे धीरे-धीरे लेकिन दृढ़ कदमों से गांधी की हत्या करने के अपने चरम लक्ष्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
वे आखिरकार कामयाब होंगे या नहीं, यह आप पर और हम पर निर्भर करता है।
यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या आप अपने बापू की हत्या के लिए तैयार हो गए हैं।
आपको तैयार किया जा रहा है।
इस बात को समझने के लिए आपको बापू-हत्या के इतिहास को बारीक़ी से जानना चाहिए।
यह किताब इसमें आपकी मदद करेगी। 










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