महापुरुषों के पद चिह्न अभी मिटे नहीं, क्योंकि हम उन पर कभी चले नहीं

स्मृति , , मंगलवार , 31-10-2017


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संदीप जोशी

बचपन की बतकही में ये चाचा सुनाते थे। अपन हंसी में उड़ा दिया करते थे। सभ्य समाज पीढ़ी दर पीढ़ी अपने पुरखों और सामाजिक नायकों को याद कर प्रेरणा पाता है। लेकिन आज महापुरुषों को याद करना औपचारिक हो गया है। उनके अच्छे विचारों को, अच्छे कामों को ग्रहण करना मुश्किल हो गया है। उनके नाम को चुनावी मुद्दा जरूर बनाया जाता है मगर उनके कामों पर बात तक नहीं होती। उनके नामों पर तुकबंदियां चलाई जाती हैं। नाम पर लुभावनी योजनाओं की घोषणा होती है। उन नामी योजनाओं का लेना देना नाम के विचार व काम से कम और चुनाव से ज्यादा होता है।

पिछले दिनों चार कर्मठ महापुरुषों को औपचारिक ही सही, मगर याद किया गया। अक्टूबर में महात्मा गांधी को याद करने के अलावा देश ने जयप्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय, राममनोहर लोहिया और नानाजी देशमुख को भी याद किया। चारों ने आजाद भारत में सत्ता के विरोध में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष किए। 

समाज को केन्द्र में रख कर सत्ता नीतियों पर सवाल खड़े किए। सरकारी नीतियों के विरोध में जनजागरण में लगे। अपने भाषण और लेखन से समाज के उत्थान के लिए जीवनपर्यंत संघर्षरत रहे। समाज की वैचारिक, सांस्कारिक स्थापना में इनके योगदान को कभी नकारा नहीं जा सकेगा। सत्ता और समाज के संघर्ष में इन चारों नेताओं का योगदान हमेशा याद रखना चाहिए। सभी ने समाज के लिए सत्ता का तिरस्कार किया।

आज विद्यालयों में अपने को देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रियों के नाम तो रटाए जाते हैं लेकिन जेपी, दीनदयालजी, लोहियाजी और नानाजी के विचार और काम के बारे में पढ़ाया ही नहीं जाता। आने वाली पीढ़ी को इनके विचार और काम के बारे में आखिर बताएगा कौन? समाज में इनके योगदान को कोई सरकार तो नहीं बताएगी। मगर इनके जन्मदिन पर सरकारें अपने चुनावी सरोकारों की वोट-लीला खेलना नहीं भूलतीं। इनके नाम ले कर सत्ता के लिए जनता को लुभाते तो हैं लेकिन इनके विचार और काम का जनता को लाभ नहीं मिल पाता है।

देश में अगर किसी ने अलोकतांत्रिक, भ्रष्ट सत्ता को पहली बार जनजागरण के द्वारा ललकारा था तो वे जयप्रकाश नारायण थे। जनता ने सन 77 के आमचुनाव में इंदिरा कांग्रेस की प्रभुसत्ता को लोकतंत्र की शक्ति दिखाई थी। स्वतंत्र भारत ने जेपी के आह्वान पर ‘संपूर्ण क्रांति’ की थी। जेपी लोक के सच्चे नायक थे। जनता ने जेपी का साथ दिया और नारा लगाया ‘सिंहासन खाली करो, कि जनता आती है’।

लेकिन जिस जनता पार्टी को जेपी ने एकजुट किया और सन 77 में जिसके नेता सत्ता में आए, उनसे सत्ता संभली नहीं। आपसी कलह और सरकारी झगड़ों के कारण जनता के बहुमत को जनता पार्टी ने ढाई साल में ही गंवा दिया। नेताओं की राजसत्ता के कारण जेपी की सेवासत्ता हार गई। आज भी जेपी के अनंत अनुयायी सत्ता लोभ में जनता को सेवा लाभ नहीं दे पा रहे हैं।

जेपी की तरह ही डा. राममनोहर लोहिया ने राजनीति को समाज की सेवा के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया। डा. लोहिया ने भी माना था की लोकतंत्र में जनता ही सर्वशक्तिमान होनी चाहिए। जनता को झकझोरने के लिए उनने कहा था ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती हैं’। सन 1936 में नेहरू ने उनको अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का पहले सचिव नियुक्त किया था। उनने गांधीजी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लिया और जेल गए। आजादी के बाद भी राष्ट्र पुनर्निर्माण के लिए स्वतंत्रता सेनानी के रूप में योगदान देते रहे।

कांग्रेस में रहते हुए ही उनने सरकार की व्यक्तिवादी नीतियों का विरोध किया। लगातार अपने भाषण और लेखन से जनता में जागरूक करते रहे। अमीर-गरीब की बढ़ती खाईं पर बहस करते रहे। जातिवादी असमानता, और समाज के उत्थान में बाधा बने मुद्दों पर बोलते, लिखते रहे।

इसी तरह दीनदयाल उपाध्याय ने भारत के लिए ‘एकात्म मानववाद’ का सपना संजोया था। वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे। महान विचारक और चिंतक दीनदयालजी ने अद्भुत सामाजिक साहित्य रचा। जीवनपर्यंत भारतीय सनातन विचारधारा को पुनर्स्थापित करने में लगे रहे। उनने कहा था ‘भारत में रहनेवाला और उसके प्रति ममत्व की भावना रखनेवाला मानव समूह एकजन है। अपनी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। भारतीय राष्ट्रवाद का आधार ही यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा’। दीनदयालजी ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भी याद दिलायी थी। उनने ‘अंतिम व्यक्ति के उदय से ही सभी के उदय’ की बात भी कही थी। संघ से प्रचारक के रूप में शुरू हुआ नानाजी देशमुख का लंबा जीवनकाल, मूल भारतीय शिक्षा के प्रचार और समाज में संगठनात्मक शक्ति खड़ी करने के लिए लगा। सन 77 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भी सरकार में शामिल न होने का निर्णय लिया। संगठन कार्य के लिए महान त्याग किया। ‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी’ के लिए जीवनभर संघर्षरत रहे। जेपी को जनता पार्टी की कलह ने दुख दिया। लोहिया का समाजवाद आज परिवारवाद में सिमटकर रह गया है। दीनदयालजी और नानाजी के विचार व काम आगे बढ़ाने से ज्यादा उनके अनुयायी आज मनमौजी सत्ता चला रहे हैं। और भारतीय इतिहास बदलना चाहते हैं। इसीलिए ये  महापुरुष  प्रातः स्मरणीय, सदा अनुकरणीय हैं।

 










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