गंगा के बहाने जनता को ठगने की योजना है नमामि गंगे

धर्म-सियासत , , मंगलवार , 31-10-2017


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गिरीश मालवीय

"न मुझे किसी ने यहां भेजा है और न मैं आया हूं। मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है।" ये डायलॉग याद है आपको, ये मशहूर अभिनेता माफ कीजिए नेता नरेन्द्र मोदी जी का डायलॉग है। ये उन्होंने तब बोला था जब वो 2014 में बनारस से पर्चा भरे थे और अपनी सरकार बनने के बाद पीएम मोदी ने जलसंसाधन मंत्रालय के तहत नमामि गंगे नाम से अलग विभाग भी बनाया। साथ ही मंत्री उमा भारती को इस विभाग का जिम्मा सौंपा था। उमा भारती ने भी घोषणा की थी कि गंगा को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त करना और गंगा सफ़ाई उनके जीवन का सबसे बड़ा मकसद है। नहीं कर पायीं तो प्राण त्याग देगीं।

अब तीन साल में तो गंगा सफाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ और एक साध्वी की हत्या का पाप उनकी सरकार पर न लगे इसलिए उन्होंने उमा जी को ही मंत्री पद से हटा दिया और गडकरी को नमामि गंगे मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप दी।

वैसे अंदर की बात तो यह है कि बेचारी उमा भारती भी क्या करतीं? ........मोदी जी बस गंगा के लिए ढपोरशंखी घोषणाएं ही करते रहते थे बात तो तीन सालों में 12 हजार करोड़ रुपये का बजट देने की थी लेकिन हकीकत आरटीआई से ही पता चली कि वास्तव में केवल 5378 करोड़ रुपये ही बजट में दिए गए। बजट में जारी 5378 रुपये में से केवल 3633 करोड़ रुपये खर्च के लिए निकाले गए और इसमें भी केवल 1836 करोड़ 40 लाख रुपये ही वास्तव में खर्च किए गए।

आरटीआई के माध्यम से मिली जानकारी के अनुसार, इस योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2014-15 में गंगा सफाई के लिए 2053 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया था, जिसमें महज 326 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसमें केवल 170 करोड़ 99 लाख रुपये ही खर्च हो पाए। इसी प्रकार वित्तीय वर्ष 2015-16 में 1650 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान था, जिसमें 1632 करोड़ रुपये जारी किए गए और केवल 602 करोड़ 60 लाख रुपये ही खर्च हो पाए। वित्तीय वर्ष 2016-17 में 1675 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान था, लेकिन अभी तक केवल 1062 करोड़ 81 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके हैं।

अब इतने कम पैसे मिले थे कि उमा भारती की जल समाधि तो पक्की ही थी इसलिए गडकरी जी को मोर्चा संभालने के लिए भेजा गया है। गडकरी ने आते ही साफ कर दिया कि 2019 तक तो कुछ खास नहीं हो पायेगा।

पीपीपी के हवाले नमामि गंगे

तो फिर नितिन गडकरी ने एक प्रपोज़ल तैयार किया जिसके तहत सरकार, गंगा किनारे नए घाट बनाने, पुराने घाटों की साफ-सफाई और मरम्मत करने, गंगा किनारे बने श्मशान गृहों की मरम्मत, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट, नदी की सतह की सफाई, वृक्षारोपण और गंगा किनारे जन-सुविधाओं के लिए कॉरपोरेट सेक्टर और आम जनता से आगे आने को कह रही है।

यानी कुल मिलाकर पीपीपी मॉडल पर नमामि गंगे को छोड़ दिया गया है, और आने वाले वर्षों में हो सकता है कि आप बनारस जाएं तो आप पाएं कि मशहूर दशाश्वमेध घाट का नाम धीरूभाई घाट हो गया है।

(गिरीश मालवीय आर्थिक मामलों के जानकार हैं और आजकल इंदौर में रहते हैं।)










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