गंगा को उनके बेटे-बेटियों ने ही छला!

धर्म-सियासत , , सोमवार , 14-05-2018


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दयानंद

ना कोई मुझे लाया है, 

ना मैं यहां आया हूं

"मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है।"

कुछ याद आया ? हां माननीय मोदी जी की महान उक्ति ही तो है। और उन्होंने तो "नमामि गंगे योजना" को लाकर गंगा मां के प्रति अपने लगाव को जरूर दिखाया लेकिन अफसोस गंगा की स्वच्छता और अविरलता के लिये लाया गया ये सबसे बड़ा प्रोजक्ट गंगा घाटों की सफ़ाई से आगे नहीं बढ़ सका। दूसरों के पाप धोने वाली पापहरणी गंगा आज अपने अस्तित्व को ही विलीन होते देख रहीं हैं। न कोई उद्धारक है और न ही गंगा स्वच्छ और अविरल करने का दंभ भरने वाली साध्वी उमा उसकी मंत्री रहीं।

वैष्णवों की मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु के चरण कमल से, शैवों की मान्यता के अनुसार भगवान शिव की जटा से और वाकई में भौगोलिक रूप से हिमानी गंगोत्री ग्लेशियर के गोमुख से निकलने मोक्षदायिनी गंगा आज मैली ही नहीं वरन मरने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। भारतीय सभ्यता संस्कृति के कण-कण में बसी गंगा के आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व की तुलना प्राचीन मिस्र की नील नदी से की जाती है। गंगोत्री गोमुख से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली गंगा देश के पांच बड़े राज्यों और उन राज्यों के 97 बड़े शहरों से गुजरती है, अपने अंदर कचरों का गुबार समेटती हुई। तो क्या गंगा अब यूं ही धीरे-धीरे गुम हो जाएगी? आख़िर क्यों कागजों तक ही सिमट कर रह गया है प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट "नमामि गंगे"?

चर्चा जरूर करेंगे सरकार के गंगा सफाई के नाम पर की जा रही कुप्रबंधन की लेक़िन आइये आज आपको बतलाते हैं कि विश्व की सबसे प्रदूषित नदियां आज कैसे सबसे स्वच्छ और अविरल धारा वाली नदी बन गयीं हैं। ऐसी ही कुछ नदियों की हक़ीक़त को आपके सामने रख रहा हूं।

नदी स्वच्छता की मिसाल : टेम्स नदी

दक्षिण-मध्य इंग्लैंड के कॉटस्वोल्ड नामक पहाड़ी से निकलने वाली 346 किमी लंबी टेम्स नदी जो ऑक्सफोर्ड, रैडिंग, ईंटन और लंदन से होते हुए अटलांटिक सागर में मिलती है। टेम्स नदी जो कभी दुनिया का सबसे व्यस्त जलमार्ग हुआ करता था। लंदन जैसे बड़े क्षेत्र और बड़ी आबादी वाला शहर का सारा कचरा टेम्स में समाती चली गई और 19 वीं सदी में दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदी बन गई थी। सन 1850 तक टेम्स नदी दिल्ली की यमुना नदी से भी बदतर हो गयी। अत्यधिक गर्मी और प्रदूषण के कारण टेम्स की गंदगी उबलने लगी, सड़े अंडे की तरह का दुर्गंध और रोगों से लोग परेशान होकर भागने लगे। टेम्स के किनारे बसे वेस्टमिन्सटर इलाके में स्थित ब्रिटेन की संसद और सरकार भी 1858 की गर्मियों में ठप हो गई। बायोलॉजिकल (जैविक) रूप से टेम्स नदी को मृत घोषित कर दिया गया। दुनिया भर में इस घटना को "द ग्रेट स्टिंक" नाम से जाना गया।

टेम्स के प्रदूषण को देखते हुए 1858 में ब्रिटेन की संसद ने एक मॉडर्न सीवेज सिस्टम की योजना बनाई। इस योजना के चीफ इंजीनियर जोसेफ बेजेलगेट थे। उन्होंने काफी शोध किया और वेस्टवाटर ट्रीटमेंट जैसे वैज्ञानिक तरीकों के द्वारा लंदन शहर में जमीन के अन्दर 134 किलोमीटर का एक सीवेज सिस्टम बनाया। साथ ही टेम्स नदी के साथ-साथ सड़क बनाई गई, ट्रीटमेंट प्लांट्स लगाए गए। इस सीवेज सिस्टम में टेम्स का पानी ट्रीटमेंट के बाद लोगों के घरों में जाता है और लोगों के घरों में उपयोग किये गए जल मल को ट्रीटमेंट के बाद टेम्स में छोड़ा जाता है। लंदन के इस सीवेज सिस्टम को बने हुए 150 साल पूरे हो चुके हैं। लंदन शहर की जनसंख्या आज कई सौ गुना ज्यादा हो गई है, लेकिन आज भी लंदन का सीवेज सिस्टम दुरुस्त है।

आज टेम्स नदी दुनिया की सबसे स्वच्छ नदी बन चुकी है।

शानदार पुनरुद्धार और स्वच्छता के लिए इसे 220,000 डॉलर का इंटरनेशनल थीस रिवर प्राइज भी मिला। 

एल्बे: जर्मनी की एल्बे नदी जो कभी विश्व की सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियों में एक थी। इसमें प्रदूषण के स्तर के कारण मछलियां अल्सर से मर रही थीं। लेकिन आज उसकी गिनती विश्व की सबसे साफ नदियों में की जाती है। 

चार्ल्स : यूएस की चार्ल्स नदी एक समय अपने भारी प्रदूषण के लिए जानी जाती थी। टॉक्सिस के चलते चार्ल्स में जगह-जगह गुलाबी और नारंगी रंग के धब्बे दिखाई पड़ने लगे थे। साल 1955 में 'हार्पर्स मैगजीन' में यहां तक कहा गया कि नदी में जो बहता है, उसे पानी न कहा जाए। लेकिन आज यह दुनिया की स्वच्छ नदियों में एक है।

हान : दक्षिणी कोरिया की यह नदी पहले शहर की सीवेज लाइन थी। रोज नालों का पानी और इंडस्ट्रियल कूड़ा कचरा इसमें गिरता था। पर आज पूरी तरह स्वच्छ है। पर गंगा की कहानी कब बदलेगी? या फिऱ "गंगा तेरी यही कहानी।"

हालांकि गंगा की स्वच्छता के लिए इससे पूर्व भी प्रयास किये गए। 

1985 में राजीव गांधी द्वारा गंगा कार्य योजना या गैप (GAP) का शुभारंभ किया गया था। कार्यक्रम खूब धूमधाम के साथ शुरू किया गया था, लेकिन यह 15 वर्ष की अवधि में 901.71 करोड़ (लगभग 1010) रुपये व्यय करने के बाद नदी में प्रदूषण का स्तर कम करने में विफल रहा। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 1984 में गंगा बेसिन में सर्वे के बाद अपनी रिपोर्ट में गंगा के प्रदूषण पर गंभीर चिंता जताई थी। इसी बीच अप्रैल 1993 में तीन और नदियों यमुना, गोमती और दामोदर के साथ गंगा एक्शन प्लान-दो शुरू किया गया, जो 1995 में प्रभावी रूप ले सका। दिसंबर 1996 में गंगा एक्शन प्लान-दो का राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में विलय कर दिया गया। फरवरी 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (एनआरजीबीए) का गठन किया गया। इसमें गंगा के साथ यमुना, गोमती, दामोदर व महानंदा को भी शामिल किया गया।

याद कीजिए 14 जनवरी, 1986 में गंगा कार्य योजना का शुभारंभ करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था - ''गंगा कार्य योजना कोई पीडब्ल्यूडी की कार्ययोजना नहीं है; यह गंगा जहां से आती है, गंगा जहां तक जाती है; यह वहां के जन-जन की कार्ययोजना बननी चाहिए”। दुर्योगवश, गंगा कार्य योजना के भावी कर्णधारों ने ऐसा होने नहीं दिया। और अगर गंगा का अस्तित्व आज सिमटने के कगार पर है तो मेरे अनुसार उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि सभ्यता और संस्कृति की दुहाई देने वाले कर्णधारों ने गंगा को आम जनमानस से जुड़ने ही नहीं दिया बल्कि इसे एक धर्म विशेष से जोड़कर उसका राजनीतिकरण किया गया। आस्था की झूठी कहानियों को गढ़कर उसे चंद लोगों के घरों का नाला बना दिया गया। 

गंगा की दुर्गति का इस बात से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि गंगा में प्रतिदिन लगभग 1369 मिलियन लीटर कचरा समाता चला जाता है। 5 राज्यों से गुजरने वाली लगभग 2525 किमी लम्बी गंगा की सफाई के लिए 13 मई 2015 को प्रधानमंत्री ने "नमामि गंगे योजना" की शुरुआत की। इस योजना के लिए 20 हजार करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि खर्च कर गंगा की धारा को स्वच्छ और अविरल बनाने की बात की गई। पहले चार साल में इस योजना के अंतर्गत 4131 करोड़ रुपये इस कार्य के लिए दिए गए लेकिन मात्र 3062 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

सीएजी की रिपोर्ट काफ़ी चौंकाने वाली और इस योजना की पोल खोलने वाली है। इस रिपोर्ट के अनुसार गंगा की स्वच्छता के लिए 154 प्रोजेक्ट में केवल 71 को मंजूरी मिली। 46 सीवेज प्लान्ट में 26 का काम देरी से चल रहा है। अकेले यूपी के मैनचेस्टर कहलाने वाले कानपुर में लगभग 20 नाले गंगा में गिरते हैं जिसमें 8 नाले तो सीधे गंगा की धारा के साथ मिलकर मोक्षदायिनी कहलाने वाली गंगा को कचरा बना रहे हैं। याद कीजिये जरा तेज-तर्रार गंगा पुत्री मोहतरमा साध्वी उमा भारती और संसद में उनके तेवर को! क्या शानदार भाषण था उनका? 

"अगर गंगा साफ नहीं हुईं तो मैं राजनीति से सन्यास ले लूंगी"-उमा भारती।

"मेरे रगों में खून नहीं गंगा बह रहीं हैं"-उमा भारती

लेकिन गंगा की सौगंध उठाने वाली ये मोहतरमा ने तो गंगा मैइया को ही ठेंगा दिखा दिया। एक छोटा सा ट्वीट कर गंगा पुत्री कितनी आसानी से निकल गयीं। "गंगा की जिम्मेदारी अब मेरी नहीं, नितिन गडकरी की है, अब वही जाने।"-उमा भारती का ट्वीट

यानी अब गंगा की जिम्मेवारी नितिन गडकरी की है। वो भी बड़े-बड़े शब्दों में अपने पूर्ववर्ती साध्वी की तरह दंभ भरना शुरू कर दिए हैं। गडकरी का कहना कि मार्च 19 तक 70 से 80 फ़ीसदी तक गंगा साफ हो जाएगी और पूरी तरह से गंगा साफ होने में दिसंबर 19 तक का समय लगेगा।

अब जब गंगा पुत्र का भी बनारस के घाटों से मोहभंग हो गया है और अगले चुनाव में बनारस संसदीय क्षेत्र को छोड़कर जाने का इशारा भी दे चुके हैं तो भला ऐसे में क्या समझा जाये ?

शायद गंगापुत्र को अपनी राजनीति चमकाने के लिये जितना मां गंगा का प्रयोग करना था वो पूरा हो चुका है। और वर्षों से अपने उद्धारक का बाट जोह रहीं गंगा एक बार फिर अपने ही अयोग्य स्वार्थी पुत्र-पुत्रियों के द्वारा आसानी से छली जा चुकी हैं।

यानी कुल मिलाकर -"गंगा तेरी यहीं कहानी"

(लेखक दयानंद शिक्षाविद और राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक हैं।)








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