गुर्बत में गुम हुए गंगाराम

स्मृतिशेष , , रविवार , 19-11-2017


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सुनील कुमार

(चंद साधन संपन्न या फिर किसी रूप में बाजार से जुड़े कुछ कलाकारों को छोड़ दिया जाए तो देश के गांवों, कस्बों या फिर दूरस्थ इलाकों के कलाकार गुमनामी की जिंदगी जीने और फिर उसी में मर जाने के लिए अभिशप्त होते हैं। न उनकी कला को उचित पहचान मिल पाती है। और न ही कलाकार को सम्मान। घर-परिवार चलाने के लिए रोजी-रोटी के लाले ऊपर से। इसी तरह के एक कलाकार थे गंगाराम। वो मिथिलांचल इलाके से ताल्लुक रखते थे। उनकी भी पिछले हफ्ते विपन्न स्थितियों में असमय मौत हो गयी। इलाज के लिए आखिरी वक्त में वो दिल्ली जरूर पहुंचे लेकिन राजधानी का व्यवहार भी उनके प्रति बेरुखी भरा ही रहा। पत्रकार सुनील कुमार इस बीच उनके संपर्क में आए थे। इस दौरान उनको गंगाराम के जीवन को नजदीक से देखने और जानने का मौका मिला। उन्होंने ही गंगाराम पर कुछ लिखा है जिसे जनचौक टीम ने श्रृंखलाबद्ध तरीके से पेश करने का फैसला लिया है-संपादक)

वर्ष 2015 में एक रिसर्च प्रोजेक्ट के दौरान मधुबनी के सुप्रसिद्ध लोकरंगकर्मी महेंद्र मलंगिया के घर जाना हुआ तब उन्होंने बड़ी ही आत्मीयता से लोक-रंग-कर्म की विविध जानकारियों से मुझे समृद्ध करने की कोशिश की। विपन्नता लोकरंगकर्मियों की रचनाधर्मिता को किस तरह से प्रभावित करती रही है, इस पर बातचीत के दौरान उन्होंने कई लोकरंगकर्मियों का उल्लेख किया। अपनी बातचीत में उन्होंने कई नाम लिये, उनमें से एक थे गंगाराम। 

महेंद्र मलंगिया के लिए गंगाराम मिथिलांचल के सुप्रसिद्ध लोकनाट्य राजा सलहेस से संबंधित जानकारियों के लिए 'एक बड़ा रिसोर्स पर्सन' थे। मधुबनी के अरेर, बेनीपट्टी, बासोपट्टी, उमगांव, हरलाखी रीजन में गंगाराम लोकनाट्य राजा सलहेस से संबंधित जानकारियों के लिए इनसाइक्लोपीडिया से कम नहीं थे। इसी वजह से मलंगिया जी ने कहा कि मुझे गंगाराम से लोकनाट्य पर बात करनी चाहिए। महेंद्र मलंगिया से पूर्व पटना के जाने-माने रंगकर्मी उमाकांत झा हसन इमाम और दरभंगा के चर्चित रंगकर्मी व साहित्यकार अविनाश चंद्र मिश्र के मुख से गंगाराम का नाम सुन चुका था। इसलिए मन में गंगाराम से मिलने, उनका इंटरव्यू करने और लोकनाट्य राजा सलहेस से संबंधित उनकी जानकारियों की थाती के दस्तावेजीकरण की तीव्र इच्छा थी। लेकिन, किन्हीं वजहों से यह काम अधूरा रह गया।

गंगाराम अपनी पत्नी के साथ।

2016 में जब मैं दुबारा मधुबनी गया तब गंगाराम से मिलने उनके गांव उमगांव पहुंचा। मधुबनी शहर से करीब चालीस-बयालीस किलोमीटर दूर। वहां से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर हरलाखी भारत नेपाल बॉर्डर है। तब गंगाराम पास के ही एक स्टूडियो में कोई गीत रिकॉर्ड कर रहे थे और जब उन्हें पता चला कि दिल्ली से कोई उनसे मिलने आया है तब वह घर लौटे। घर में लौटते समय उनकी जुबान पर भुनभुनाहट थी और चेहरे पर झुंझलाहट। काफी हांफ रहे थे। उन्होंने यही कहा कि वो अस्वस्थ महसूस कर रहे हैं, इसलिए थोड़ी ही बात करेंगे और मैं अपनी बात जल्दी खत्म कर लूं। मैंने कहा कि मैं उनसे राजा सलहेस पर बात करना चाहता हूं, इतना सुनना था कि उनके चेहरे की झुंझलाहट अचानक ऐसे गायब हुई जैसे अंधेरे को चीड़कर भोर का उजाला पसर गया हो। लेकिन उनकी अस्वस्थता की वजह से मैंने कहा कि मैं फिर आता हूं आपसे बात करने के लिए। उन्होंने भी कहा कि वो जरूर बात करेंगे और जब मैं अगली बार आऊंगा तब वो मुझे नेपाल बॉर्डर के पास, उस तरफ एक गांव हरवाड़ा ले चलेंगे जहां राजा सलहेस की महागाथा को गाने वाले करीब 80 बसंत पार कर चुके दो-तीन गाथागायक हैं। 

अगले वर्ष, यानी 2017, अक्टूबर में मैं उनके गांव के बिल्कुल समीप था, बेनीपट्टी-बासोपट्टी के रास्ते पर बसे एक गांव जिरौल में, गंगाराम के गांव उमगांव से करीब 15 किलोमीटर दूर। मैंने गंगाराम को फोन किया तब उनकी मंझली बेटी ने फोन उठाया, कहा कि गंगाराम एम्स में भरती हैं, इलाज करवा रहे हैं। मैंने पूछा किस चीज का इलाज, तो उसका कहना था कि पता नहीं, मैंने पूछा कि कब लौटेंगे, तो जवाब मिला, पता नहीं, लौटेंगे भी या नहीं। 10 नवंबर की रात एम्स में इलाज और उसके लिए टेस्ट की लंबी-लंबी कतारों से उबकर जब गंगाराम के बड़े बेटे डॉ. शंभू पासवान उन्हें वापस उमगांव ले जा रहे थे, बनारस के आसपास उन्होंने ट्रेन में ही आखिरी सांस ली। गंगाराम नहीं लौटे, अभावों ने उनकी जिन्दगी लील ली, गुर्बत ने उन्हें अपना शिकार बना लिया, मेरी एक रिपोर्ट अधूरी रह गयी।

(सुनील कुमार पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

                                                                                               जारी....






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