मिथिलांचल की थाती गंगाराम को समाज ने आखिरी वक्त में तनहा छोड़ दिया

स्मृतिशेष , , सोमवार , 20-11-2017


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सुनील कुमार

गंगाराम की असामयिक मौत पर न तो मधुबनी में कोई शोकसभा हुई और न ही वहां का कला समाज उद्वेलित हुआ। शहर अपनी रौ में है। विकृतियों के विरोध, अज्ञानता के नाश और अन्याय के उन्मूलन जैसी संस्कृति की परिभाषाएं मिथिलांचल के भद्रजनों में खूब गूंजती मिलती हैं। उसी संस्कृति के ध्वजधारक रहे गंगाराम की मौत की खबर किसी को सालती नहीं, यह कैसी विडंबना है? 

मिथिलांचल में नाच परंपरा से जुड़े पुराने कलाकारों के लिए गंगाराम अपिरिचित नहीं थे और न ही पुराने साहित्यकारों के लिए अपरिचित थे। रहिका प्रखंड के प्रमुख रहे रंगकर्मी जटाधर पासवान गंगाराम के साथ की स्मृतियां यूं साझा करते हैं- “मधुबनी के पासवान समाज में अशिक्षा का अंधकार आज जितना कुछ भी दूर हुआ, उसकी बुनियाद गंगाराम की ही रखी हुई है”। 

जटाधर पासवान बयान करते हैं कि मधुबनी में 1992 में वरिष्ठ अफसर कल्याण भारती के नेतृत्व में साक्षरता अभियान की शुरुआत हुई थी, तब अक्षर ज्ञान से वंचित रहे गंगाराम ने झिझिया और जट जटिन के लोकधुनों पर साक्षरता अभियान के गीतों को कंपोज किया था। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि गंगाराम ने झिझिया और जट जटिन का मंचन मधुबनी शहर में किया और वह अद्भुत मंचन था। झिझिया, जट जटिन, सामा चकेवा झिरनी आदि को मंच पर लाने का श्रेय गंगाराम को जाता है। जटाधर कहते हैं, जो गीत घर-घर में गाये जाते थे, गंगाराम उसे मंच पर ले आए। जटाधर पासवान, विमलेंद्र झा, रोहित नारायण मिश्र, जहीर भारती, डॉ. श्याम सुंदर कामत, श्याम पासवान, सावन कुमार शास्त्री, भुवेंद्र पासवान, महिलाओं में अनारो देवी और रत्ना झा तब गंगाराम की टीम का हिस्सा थे। गंगाराम मधुबनी में संभवत: अपने तरीके के अकेले रंगकर्मी थे जिन्होंने विधवा विवाह तक के गीतों को कंपोज करने का काम किया।

अभिनय नाट्य, गीत और गाथा गायन परंपरा में गंगाराम समान रूप से लोकप्रिय थे। उनकी लोकप्रियता का वर्णन उनके गांव के लोग इस प्रकार करते हैं कि हास्य कलाकार के तौर पर उनके समकक्ष पूरे मिथिलांचल में दूसरा कोई नहीं था। तब पेट्रोमेक्स भी मधुबनी के समृद्ध परिवारों के पास था। लेकिन जब गंगाराम का नाच होता या उनकी एक्टिंग होती थी तब मंच से चारों तरफ लुक्का लिये लोग आते दिखाई देते थे। वह नजारा अद्भुत होता था।

गंगाराम मूलत: सलहेस कलाकार थे जब कभी राजा सलहेस का मंचन होता, वो विदूषक और सूत्रधार की भूमिका में होते थे। पिछले एक दशक के दौरान गंगाराम कबीरपंथी हो गये थे, कथावाचक हो गये थे। अपने जीवन के आखिरी दिनों में कबीर की वाणियों को गाने वाले गंगाराम को उनके अपने शहर ने इस तरह बिसरा दिया जैसे रोजाना हम भजनों-वाणियों को गाते हैं, सुनते हैं और फिर जीवन की आपाधापी में उसे जेहन से उतार फेंकते हैं। गंगाराम जी, नमन।

(सुनील कुमार पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)






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