गौरी लंकेश को मरणोपरांत हो सज़ा-ए-मौत!

बेबाक , नई दिल्ली, शुक्रवार , 08-09-2017


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प्रेम कुमार

गौरी लंकेश खुद अपनी मौत की ज़िम्मेदार हैं। उन्होंने ही अपनी मौत को न्योता दिया था। मौत हत्यारा बनकर उन तक पहुंची। गोलियां उन्हें खामोश कर गयीं और यमराज बनकर आए हत्यारे अपना दायित्व पूरा कर गये। गौरी लंकेश को मृत्युदंड दिया गया। उस अपराध के लिए मृत्युदंड, जिसे अपराध समझने से उन्होंने मना कर दिया था। आखिर गौरी को क्या हक था यह तय करने का कि अपराध क्या है? वह ज़िन्दा होती तो अपनी मृत्युदंड को भी अपराध ठहराने लगतीं। उसके ज़िन्दा बचे साथी यही तो कर रहे हैं!

बीजेपी नेता जीवराज।

जीवराज ने सुलझा दी हत्या की गुत्थी

नितिन गडकरी ने बहुत सही कहा कि गौरी लंकेश की हत्या क्या हो गयी, विरोधी तो पीएम के पीछे ही पड़ गये! चुप क्यों हैं, चुप क्यों हैं।  अरे! प्रधानमंत्री के पास क्या इसी बात के लिए फुर्सत है कि विदेश में रहते हुए भी वह  गौरी लंकेश की हत्या पर मातम मनाए!  नितिन गडकरी ने इस हत्या को ग़लत बताते हुए बहुत बड़ी जिम्मेदारी निभा दी। कर्नाटक के बीजेपी नेता और राज्य के पूर्व मंत्री जीवराज पीएम की चुप्पी पर मचे घमासान पर करारा जवाब लेकर सामने आए हैं। उन्होंने कहा है कि गौरी लंकेश उनकी बहन जैसी थी। लेकिन, उसका अपराध ऐसा था कि उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता था। वह आरएसएस के खिलाफ नहीं लिखतीं, तो आज जिन्दा होती!

बीजेपी नेता जीवराज चुप्पी के निहितार्थ पर टिप्पणी कर गये। अपनी मौत के लिए खुद गौरी लंकेश जिम्मेदार थीं! अर्थ लगाने वाले चाहे इसका जो अर्थ लगा लें, लेकिन ये तो सभी मानेंगे कि जीवराज सच बोल रहे हैं। लंकेश की लेखनी को बीजेपी नेता जीवराज ने उनकी मौत के बाद भी बर्दाश्त नहीं किया और जाहिर है कि आरएसएस और बीजेपी भी उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पायी। लेकिन बर्दाश्त नहीं कर पाने का मतलब क्या है? वही, जो ऐसी हत्याओं पर चुप्पी का मतलब होता है!

गौरी लंकेश को श्रद्धांजलि देते लोग।

अपने हाथ खून से रंगने की क्या जरूरत

आज ज़माना बदल चुका है। हम खुद हत्या नहीं करते, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारे हाथ ख़ून से लाल नहीं होते। जान तो गोलियां लेती हैं, गोलियां पिस्तौल चलाती हैं, पिस्तौल से फायर पेशेवर हत्यारे करते हैं जिनकी फीस तय होती है। हम बस फीस चुकाते हैं। हम अपने विरोधियों को स्वीकार नहीं करते। इसका मतलब ये नहीं कि विरोधियों की कलम तोड़ दें। कलम तोड़ देंगे, तो वे और कलम खरीद लाएंगे। पैसे नहीं होंगे, तो डोनेटर मिल जाएंगे। इसलिए कलम तोड़ने के बदले हम पेशेवर रुख अपनाते हैं। हत्यारों को नकद देते हैं और हाथ भी ख़ून से उनका ही सना होता है। हम तो बस प्रोसेस का पार्ट होते हैं। इतने भर से ऊपरवाला हमारे हिस्से पाप नहीं लिखेगा।

ऊपरवाले को सब पता होता है। लंकेश की हत्या के लिए उकसाया किसने? खुद लंकेश ने। क्या वह चाहती थीं कि वह बेरोकटोक लिखती रहें और उनकी लेखनी से घायल होने वाले घायल होते रहें? उन्हें जब दूसरों को घायल करने का अधिकार था, तो दूसरे क्या अपना बचाव भी ना करें? ऊपरवाला जानता है कि उसे खूब समझाया गया था। वो नहीं मानी। मानने को तैयार नहीं हुई। धमकाया भी गया, पर उसने धमकी को गम्भीरता से नहीं लिया। यहां तक कि अब तक कोई सामने भी नहीं आया है जो ये कहे कि लंकेश ने उसे बताया था कि उसे धमकी दी गयी। ऐसे में क्या गलती धमकी देने वाले की है?

गौरी लंकेश की हत्या का विरोध।

समाज को देना था संदेश

मारने वाले से ज्यादा जिम्मेदारी उनकी होती है जिनकी जान दांव पर लगी होती है। जब लंकेश को ही अपनी जान की परवाह नहीं थी, तो दूसरे उसकी कितनी और क्यों परवाह करते? घायल होने वाले लोग लंकेश की लेखनी से कब तक घायल होते रहते? क्या अब भी आप नहीं मानेंगे कि लंकेश ही अपनी हत्यारिन है? अगर सज़ा देना हो, तो लंकेश को ही सज़ा दो!

लंकेश तो गुजर चुकी हैं। अल्लाह को प्यारी हो चुकी हैं। ऐसे में उसे सज़ा कैसे दी जा सकती है! क्यों नहीं दी जा सकती है सज़ा! जब मरणोपरांत शौर्य चक्र मिल सकता है, भारत रत्न मिल सकता है तो मरणोपरांत सज़ा क्यों नहीं मिल सकती! मिलेगी सज़ा। गौरी लंकेश को उसके लिखने की सज़ा मरणोपरांत भी मिलेगी। अपनी मौत के लिए जिम्मेदार होने और उसके कातिल होने की सज़ा मृत्युदंड के रूप में मौत के बाद भी मिलेगी।

सज़ा का मकसद किसी एक को दंड देना नहीं होता, समाज तक उस दंड का ख़ौफ़ पैदा करना होता है। इसलिए ये ज़रूरी है कि आगे से कोई संघ के खिलाफ न लिखे। जो लिखे, वो धमकियों को भी गम्भीरता से ले। एफआईआर कराए, अपने साथियों को बताए और उन धमकियों पर सत्ता व शासन-प्रशासन की चुप्पी का निहितार्थ भी समझे। ऐसा तभी हो सकता है जब गौरी लंकेश को उनकी हत्या के आरोप में सरे आम सज़ा-ए-मौत दी जाए।

(21 साल से प्रिंट व टीवी पत्रकारिता में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। संप्रति आईएमएस, नोएडा में एसोसिएट प्रोफेसर।)

      










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