गीता के नाम पर हरियाणा में हुआ लूट महोत्सव

धर्म-सियासत , , मंगलवार , 09-01-2018


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उपेंद्र चौधरी

कहते हैं कि धर्म जब सड़क पर आ जाय, तो वह सियासत बन जाता है और सियासत जब धर्म का दामन थाम ले, तो धर्म ख़ुद न होकर कुछ और हो जाता है। ऐसे तो पूरी दुनिया में ही अलग-अलग धर्म स्वयं न होकर कुछ और हो जा रहे हैं। मगर कुछ और हो जाने का नया ज़रिया कर्मवाद की बुनियाद मानी जाती ‘गीता’ को बनाया गया है। हरियाणा सरकार गीता महोत्सव मनाती रही है। लेकिन दो सालों से जो गीता महोत्सव मनाया जा रहा है, वो सांस्कृतिक महोत्सव ज़रूर है, मगर जनता के पैसे का लूट महोत्सव भी कम नहीं है। दो सालों में 40 करोड़ रुपये इस महोत्सव पर खर्च किये गये हैं। मगर परिणाम का अंदाज़ा आरटीआई कार्यकर्ता राहुल सेहरावत के पूछे गये सवालों के जवाब में मिली सूचनाओं से मिलती है। ये सूचनायें कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड की तरफ़ से दी गयी हैं। दी गयी जानकारियों में बताया गया है कि सरकार की तरफ़ से गीता की दस प्रति की ख़रीद की गयी और इसके लिए विक्रेता को 3,79,500 रुपये भुगतान किये गये। यानी गीता की एक प्रति की क़ीमत लगभग 38,000 रुपये। अच्छे कलेवर के साथ संपूर्ण व्याख्या वाली गीता भी दो से तीन सौ में मिल जाती है। सवाल उठता है कि आख़िर इस गीता में ऐसा क्या था कि सरकार ने एक प्रति की क़ीमत लगभग 38,000 रुपये देना मुनासिब समझा !

चकित होने की सीमा यहीं ख़त्म नहीं होती। आरटीआई कार्यकर्ता को मिली जानकारी में यह भी बताया गया है कि सत्ताधारी पार्टी के ही सांसद मनोज तिवारी को एक पर्फ़ार्मेंस के लिए 10 लाख रुपये चुकाये गये। मनोज तिवारी गायक और अभिनेता हैं। कथित तौर पर धर्म को महत्व देने वाली इस सरकार का सांसद क्या अपनी राजनीतिक सहयोगी धर्म के इस महोत्सव पर चैरिटी पर्फामेंस नहीं दे सकते थे। और अगर फीस ही वसूलनी थी, तो क्या महज़ एक पर्फार्मेंस के लिए इतनी मोटी फ़ीस !

इसी आरटीआई में यह भी बताया गया है कि समारोह के लिए 30 हजार के गमले, 2 लाख के थैले, 3 लाख के मोमेंटो ख़रीदे गए। सरकार ने 6 लाख रुपए जादूगर और हेमामालिनी के शो पर 15 लाख रुपये खर्च किए।

इस सरकार का दावा है कि सरकार चलाने में भी कोई तामझाम नहीं है, किसी तरह के दिखावे पर खर्च नहीं है। सरकारी विज्ञापनों में भी यही सीख दी जाती है कि शादी-विवाह या किसी भी तरह के समारोह में दिखावे पर खर्च नहीं किया जाय। ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी मानता है और यही कारण है कि संघ ने इस खर्चे को लेकर अपनी नाराज़गी जतायी है।   

गीता के बारे में आम लोगों का ख़्याल तो यही है कि यह पुस्तक, व्यक्ति को मोह-माया से मुक्त करने की सीख देती है और सिर्फ़ अपने कर्म पर ध्यान देने की बात बताती है। गीता के द्वितीय अध्याय के सैतालिसवें श्लोक में कहा गया है कि सिर्फ़ कर्म पर ही मनुष्य का अधिकार है, उसके परिणाम पर इंसान का वश नहीं। इसलिए कर्म को परिणाम के लिए नहीं करना चाहिए और न ही काम करने में आसक्ति होनी चाहिए। संत-फ़कीर इस श्लोक को दुहराते चलते हैं ताकि परिणाम से बंधा हुआ कर्म करने से वो बचे रहें। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी संघ के प्रचारक रहे हैं। देश-दुनिया की ख़ातिर शादी नहीं की है। मुख्यमंत्री बनने से पहले उनकी ज़िंदगी बेहद सादगी भरी थी। पूरी तरह अकिंचन, संग्रह में विश्वास नहीं, हर सांस में फ़कीरी। लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब वो लालक़िले के आस-पास कारोबार किया करते थे। संघ से जुड़कर ही गीता के जीता जागता यह श्लोक बन गये, व्यापार पीछे छूट गया;

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

लेकिन गली-मुहल्लों से होते-विचरते सत्तासीन होने के बाद सत्ता का रंग एक स्वयंसेवी के रंग को मात दे गया। स्वयंसेवकों के मुताबिक़ संघ में सादगी और मानवसेवा की सीख दी जाती है; राष्ट्रवाद सर्वोपरि है और नेतृत्व के कर्मों का अनुसरण उनके अनुयायी करते हैं। जिस राज्य का एक हिस्सा बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए तरस रहा हो, वो अपनी उम्मीदें गुरुमीत राम रहीम और रामपालों के चमत्कार सरीखे अंधविश्वास में पाल रहा हो, वहां गीता महोत्सव के दौरान हुए इन खर्चों के ज़रिये किस तरह के रास्ते तलाशे गये, जिन रास्तों पर जनता सुशिक्षित हो, अंधविश्वासों से मुक्त हो और तर्कवादी रास्ते पर चलकर राष्ट्रनिर्माण में सहायक हो। सही अर्थों में किसी नेतृत्व के लिहाज़ से यह राष्ट्रवाद के ठीक उल्टा आचरण है, क्योंकि गीता का तीसरे अध्याय का इक्कीसवां श्लोक तो यही कहता है कि श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण यानी जो-जो काम करते हैं, दूसरे मनुष्य (आम इंसान) भी वैसा ही आचरण, वैसा ही काम करते हैं। वह (श्रेष्ठ पुरुष) जो प्रमाण या उदाहरण प्रस्तुत करता है, समस्त मानव-समुदाय उसी का अनुसरण करने लग जाता है।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

गीता महोत्सव पर आरटीआई।

मगर गीता की इस परंपरा को खट्टर नहीं मानते। वो बेफ़िक्री से कहते हैं, ‘हमने डंके की चोट पर खर्च किया है और आगे भी करेंगे’। मनोहर लाल ने कहा, ‘हम जो करते हैं उससे मनुष्य निर्माण, समाज निर्माण, सामाजिक चेतना जागृत होती है’। सरकार का दावा है कि इस गीता महोत्सव के आयोजन पर ज़ोर का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करना है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक़ इस महोत्सव में सिर्फ़ बीस विदेशी पर्यटकों ने भाग लिया, जबकि कुरुक्षेत्र एक ऐसा पर्यटक स्थल है, जहां बिना किसी महोत्सव के भी दशकों से यहां विदेशी पर्यटक आते रहे हैं। आख़िरकार कथित तौर पर गीता को ज़्य़ादा समझने वाले संगठन से आने वाले मनोहर लाल खट्टर शायद यह भूल गये हैं कि गीता के चौथे अध्याय के सातवें श्लोक में कहा गया है, ‘हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण और विशेष अर्थ में जनता जनार्दन) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात् अवतार लेता हूं’।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

(लेखक उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।) 






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?????? ???? :: - 01-09-2018
इतना सारा कर्म तो कर रहे हैं. इनका अभ्युत्थान होने का चांस आया तो डांस पर चांस मार रहे हैं. करीब महीने भर से तमाम रेडियो और टीवी चैनलों पर लगातार प्रचार होता है, क्या ये कर्म की श्रेणी में नहीं हाता? इनसे किसी किस्म की इमानदारी और विनम्रता की जो अपेक्षा करेगा उसे निराशा ही हाथ लगेगी. केवल इन्होने कर्म में काण्ड को जोड़ दिया है. जो किसी सरकार का काम कतई नहीं है. लेकिन काण्ड करने में माहिर ब्राह्मणवादी ऐसे ही श्रमजीवी जनता की आँखों में धूल झोंकते रहे हैं और आज भी यही कर रहे हैं. यह उसी ब्राह्मणवादी फासीवादी एजेंडे का एक हिस्सा है.