डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता!

श्रद्धांजलि , , बृहस्पतिवार , 15-02-2018


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उपेंद्र चौधरी

यक़ीन या विश्वास बहुत ही मुश्किल चीज़ है। यह शक के रास्ते चलकर ही ख़ुद को हासिल करता है। यक़ीन तब तक हासिल नहीं माना जा सकता, जब तक कि शक की बुनियाद पर खड़े होकर जिज्ञासा की ऊंगली पकड़ते हुए बार-बार के प्रयोग से इत्मिनान न कर लें कि ‘हां ऐसा ही है’। इस ‘ऐसा ही है’ का अहसास प्रयोगों से बार-बार गुज़रकर ही मिलता है। जब हम सीधे-सीधे यक़ीन कर लेते हैं, तो मानकर चला जाना चाहिए कि वह यक़ीन की शक्ल में कुछ और है, जिसे अंधविश्वास कहना ज़्यादा मुनासिब है। क्योंकि जहां विश्वास की आंखें बंद हों, वो देख पाने में लाचार हो, अपनी आंखों के बजाय दूसरों की आंखों पर भरोसा करने वाला यक़ीन हो, तो उसे अंधा विश्वास ही तो कहते हैं। कई बार विश्वास की तरफ़ चलने की हिम्मत भी हममें नहीं होती।

अनेक बार हम विश्वास या अंधविश्वास में फ़र्क़ ही नहीं कर पाते। इसी कारण हम अंधविश्वास के बहाने विश्वास पर होशियारी की पर्देदारी कर लेते हैं। ऐसे में सवालों के साथ प्रयोगों की भी मौत हो जाती है। सवालों और प्रयोगों (एक्सपेरिमेंट्स) की मौत से ईश्वर जीवंत तो नहीं होता, मगर ईश्वर की बनायी इस दुनियां की तलाश, आविष्कार, विचार प्रक्रिया सब एक साथ ज़रूर ठहर जाते हैं। एक तरह से (अगर ईश्वर है, तो) यह ईश्वर की तरफ़ से दिये गये इस ‘दिमाग़’ नाम के तोहफ़े की तौहिनी है।  

एक पाकिस्तानी शॉर्ट स्टोरी है। यह स्टोरी मसाले के कारोबारी दो बाप-बेटों के बीच के संवाद से शुरू होकर उनके बीच के संवाद पर ही ख़त्म हो जाती है। लेकिन विश्वास और अंधविश्वास के बीच अदृश्य या सिकुड़ी हुई धारणा को दृश्यमान या चौड़ी कर जाती है-ठीक-ठीक संवाद याद नहीं, मगर लगभग ऐसा ही है-

बाप-बेटे, मसाले की कूट तैयार कर ली ?

बेटा-हां, अब्बा।

बाप- मिर्च की कूट में ईंट के बुरादे मिला दिये ?

बेटा-हां, अब्बा।

बाप-चल, मस्जिद में नमाज़ का वक़्त हो गया है।

कहानी ख़त्म हो जाती है। यह यक़ीन और एक कारोबारी की कारोबार संबंधित होशियारी के पर्देदारी वाले यक़ीन से समझ का पर्दा उठाने वाली कहानी है। यह विश्वास और अंधविश्वास के बीच पड़े पर्दे को चंद लफ़्ज़ों में सरका देती है। यह रचनात्मकता का कमाल है। इसलिए रचनात्मकता अपने आप में एक बौद्धिक जागरण का मुकम्मल उपकरण भी है। लिहाज़ा कवि, शायरों, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और समाज के विभिन्न तबकों के बौद्धिक प्रतिनिधियों का यह फ़र्ज़ बन जाता है कि वो हाशियारी की पर्देदारी वाले यक़ीन से तर्कों-प्रयोगों के हाथों चालाकी का पर्दा सरका दें।

ग़ालिब अपनी शायरी में इस पर्दे को सरकाते भी हैं और जो समाज सवालों से डरता है, उसी से निकलकर वो खुलेआम सवाल भी उठा देते हैं। इस लिहाज़ से 1869 में आज ही के दिन इस दुनिया को अलविदा कहने वाले ग़ालिब ‘यक़ीन’ के नहीं, ’शक’ के शायर लगते हैं, क्योंकि वह एक ऐसा सवाल करते हैं, जिसे वो दुनिया का सवाल बना देते हैं। क्योंकि सवाल से पैदा हुई चिंतन प्रक्रिया अफ़वाहें रोक सकती हैं, नफ़रत और दंगों से तौबा करवा सकती हैं और आख़िरकार एक वैज्ञानिक नज़रिये वाले समाज की रचना करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। लिहाज़ा इस वक्त सवाल के इस ट्रेंड की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है-

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता

डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता!

हुआ जब ग़म से यूँ बेहिस*, तो ग़म क्या सर के कटने का?

न होता गर जुदा तन से, तो ज़ानू** पर धरा होता

हुई मुद्दत के 'ग़ालिब' मर गया, पर याद आता है

वो हर इक बात पर कहना, कि यूं होता तो क्या होता?

*हैरान

**घुटने

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

 










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Anil Kumar :: - 03-21-2018
हुए हम जो मर के रुसवा हुए क्यों न गर्के दरिया न कोई जनाजा उठता न कहीं मज़ार होता