बुनियादी सवालों पर दूसरों के साथ मिलकर मुसलमानों को लड़नी होगी अपनी लड़ाई

इंसाफ की लड़ाई , , बुधवार , 04-04-2018


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मंज़ूर अली

मेघनाद देसाई अपने इंडियन एक्सप्रेस (1 अप्रैल 2018) के लेख में लिखते हैं कि "देखते हैं कोई एक ऐसा प्रोग्राम लाता है जो बड़ी अल्पसंख्यक (मुस्लिम) को भायेगा "। यह भारतीय राजनीति में मुसलमानों की हैसियत का बयान है। हम आज तक इसी तरह के प्रोग्राम या घोषणा के इंतज़ार में रहते हैं। यह हमारी संकीर्ण राजनीति की पहचान है। सरकार के अपने कल्याणकारी इन्तेज़ामात हैं, चाहे जिस हाल में भी हों, लेकिन जब आप ज़िंदा ही नहीं रहेंगे तो उसका लाभ कैसे लेंगे।मुसलमानों के लिए आज हालात बद से बदतर हैं। आप रास्ते में सफर कर रहे हैं और आपके बहन-बेटियों  के साथ बलात्कार हो जाता है। मुस्लिम घरों पर एक भीड़ हमला करती है और आपकी बहन के साथ यह कह कर बलात्कार करती है कि तुम गाय खाती हो।  बुर्का पहने हुए मुस्लिम महिला के साथ ट्रेन में पुलिस बलात्कार कर देती है। एक आठ साल की बच्ची के साथ साज़िश के तहत बलात्कार हिन्दू-अधिकारी करते हैं और पकड़े जाने पर हिन्दू-भीड़ उनके समर्थन में उतर जाती है।

एक सनकी अपने अपराध को छुपाने के लिए एक निर्दोष मजदूर मुसलमान को जिन्दा जला देता है और उसके समर्थन में हिंदूवादी पैसा इकट्ठा करते हैं और हाई कोर्ट में भगवा झंडा लहरा देते हैं। इतना ही नहीं, पश्चिम बंगाल के गवर्नर कहते हैं कि"हम एक जंग में हैं "। उस जंग की झलक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिखाई देती है, जब हिन्दू महासभा के लोग हथियारबंद प्रशिक्षण शिविर लगाते हैं।

लेकिन हर मुश्किल घड़ी एक संभावनाओं को भी जन्म देती है। आज जरुरत है उन संभावनाओं को तलाशने और तराशने की। आज जरूरत है जेहनी-गुलामी और डर से आज़ाद होने की। अगर मुसलमानों को अपनी तथा देश की तक़दीर बनानी हो तो उसे जिम्मेदारी खुद उठानी होगी।

मुसलमानों को डर है कि वे कुछ लोकतान्त्रिक तरीके से वाजिब काम भी करते हैं तो, उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ेगा। मगर मैं कहना चाहता हूं की आप जितना भी बचने की कोशिश करें, आग आपके दामन पर पहुंच ही जाएगी। माहौल ही ऐसा है। आप के न चाहने के बावजूद भी आप जेलों में सबसे ज्यादा हैं, स्कूलों में सबसे कम। आप बीमार सबसे ज्यादा हैं लेकिन, हॉस्पिटल में आपकी पहुंच कम है। आप मेहनतकश ज्यादा हैं, मगर खाना आपके पास सबसे कम है। आप नौकर हो पर आपके लिए नौकरियां नहीं।

इस मुसीबत से निकलने के लिए कौम दो तरीके इस्तेमाल करती है -

पहला दुआखानी, दूसरा इंतज़ार, राजनीतिक पार्टियों और उनके नुमाइंदों का, जो आकर आपसे सहानुभूति जाहिर करें और आप नारे तकबीर कहते हुए उनके पीछे हो लें। यानि आप मसीहा ढूंढते हैं, लेकिन ज्यादातर आपको दलाल मिलते हैं, जो संरक्षण के नाम पर आपसे मुरीदी करवाते हैं। दोनों रास्ते कमजोर और कमजोरों के हैं। हमारे नुमाइंदों में भी इस तरह की राजनीति कर के समय समय पर कौम को उसके माज़ूर होने का अहसास दिलाते रहते हैं। यही है "माइनोरिटिज्म"। इसे फ़ौरन ही बंद करना होगा।

अपने मुस्तकबिल को अपने हाथ में लेने के लिए हमने अभी तक कुछ नहीं किया है। आज हिंदुस्तान में मुसलमान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से वह चाहे तो एक बार फिर देश के इतिहास के सुनहरे हर्फ़ में शामिल हो सकता है। जैसा कि भारत को अंग्रेजों से आज़ाद कराने के लिए मुसलमानों ने बड़ी क़ुरबानी दी थी और इस देश को अपना लिया था। उसी तरह आज मौका है इस देश में संविधान के अंतर्गत सामाजिक न्याय को वापस लाकर इस देश को बर्बाद होने से बचाये।

मुसलमान को "सम्पूर्ण राजनीति" करनी होगी और मौजूदा एवं भविष्य की नस्लों को बताना होगा की मुसलमान होना और भारतीय होने में अंतर नहीं है।

कुछ लोग सवाल कर सकते हैं कि,यह काम मुसलमान ही क्यों करें। उसे क्यों बार-बार अपनी निष्ठा दिखानी पड़ती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि देश एक संकट से गुजर रहा है, एक नया इतिहास लिखने की कोशिश हो रही है। इस मौके पर आपको बताना होगा कि-

हिंदुस्तान का मुसलमान खड़ा है न्याय के साथ, वह खड़ा है संविधान के साथ, वह खड़ा है धर्मनिरपेक्षता के साथ, वह खड़ा है मजदूरों के पक्ष में, दलितों और महिलाओं के पक्ष में। जब वह अपने मूल्यों को पैने ढंग से हिंदुस्तान के सामने रखेगा तब वह उन शक्तियों के विरूद्ध भी खड़ा होगा जो इसके विपरीत हैं।ऐसा करना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि ज्यादातर सेक्युलर संगठन या पार्टियों के पास इन मुद्दों पर उनके विचार में घालमेल नज़र आता है। सही मायनो में इन संगठनों ने ऐसी शक्तियों के साथ समझौता कर लिया है। इसलिए यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी मुसलमानों को लेनी पड़ेगी।  

इस दौरान आपको सड़कों पर उतरना होगा, लाठियां खानी पड़ेंगी, जेल जाना पड़ेगा और शायद निर्मम सरकार की मशीनरी द्वारा आपको मौत का मज़ा भी चखना होगा। सम्पूर्ण राजनीति माइनोरिटिज्म से बिलकुल अलग रहेगी। मसलन, अभी जामिआ मिलिया इस्लामिया के माइनॉरिटी स्टेटस पर सवाल उठा था, तो वहां के VC साहब ने कहा कि हम इसका विरोध करेंगे। ठीक बात है, लेकिन क्या उन्होंने कभी JNU, IFFT, Hyderabad, Jadavpur, DU etc के मुद्दों पर उनका समर्थन किया। नहीं।

आपको सिर्फ मुसलमानों के मुद्दों पर राजनीति छोड़नी होगी। आपको बताना होगा कि आप आदिवासी हैं, आप दलित हैं। आप उत्तर-पूर्व की राजनीति करें, आप महिलाओं की राजनीति करें। 

“सम्पूर्ण राजनीति" की बुनियाद स्वतंत्र होगी। वो किसी भी की सरपरस्ती नहीं लेगी। उसका मापदंड संविधान होगा, न कि किसी पार्टी का मैनिफेस्टो। इसका मतलब यह नहीं है की, जो संगठन सही मायनो में समाज में सौहार्द, शांति और समृद्धि के लिए काम कर रहे हैं, उनके साथ काम नहीं करेगी। कुछ अच्छे संगठन भी हैं, लेकिन वो बैलेंसिंग एक्ट करते हैं, अगर वो हिंदुत्व को आरोप देते हैं तो साथ में मुस्लिम को दोषी ठहराते हैं। उनकी नज़र में मुस्लिम अपना धर्म छोड़ देगा तो सब सही हो जायेगा। अभी हर्ष मंदर एवं रामचंद्र गुहा के डिबेट से यही सामने आया है। 

लेकिन इस तरह की राजनीति के लिए कई चीज़ों को ध्यान में रखना होगा। समाज को खुद भी बदलना पड़ेगा। उसे और लोकतान्त्रिक होना होगा। अपने अन्दर के मतभेदों को छोड़ना होगा। मुसलमान के सामने सबसे बड़ी दो चुनौतियां हैं - फिरकापरस्ती और जातिवाद। अगर इसको आप नहीं छोड़ेंगे तो हालात आपको नहीं छोड़ेगी। खामियाजा बहुत बुरा और भयानक है।

जो मौलाना दिन-रात कब्र के अजाब की दुहाई देते हैं, वे जरा अपनी आंखें खोलकर गौर करें कि अपनी आंखों के सामने अपने भिखारी मुसलमानों को जबर्दस्ती 'जय श्री राम ' के नारे लगाते देखना क्या किसी अजाब से कम है। क्या किसी मुसलमान का भीख मांगना ठीक है। अपनी आंखों के सामने अपने भाई का क़त्ल होते देखना किसी सजा से कम है। अपनी बहन की इज्जत लुटते देखना किसी आग में जलने से कम है। अपनी दुकानों-मकानों को खाक होते देखना क्या सुकून देता है। आप कह सकते हैं कि सब्र बड़ी चीज़ अल्लाह ने दिया है। पर राजनीति में सब्र एक बिंदु के बाद बुजदिली बन जाती है। और मैं राजनीति करने को कह रहा हूं। "सम्पूर्ण राजनीति" !  

                    ( मंज़ूर अली गिड्स में सहायक प्रोफेसर हैं और लखनऊ में रहते हैं।)

 










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