अंधेरे के खिलाफ लड़ते हुए चला गया कारवां का कारसाज

स्मृतिशेष , , शुक्रवार , 20-07-2018


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प्रदीप सिंह

हिंदी के लोकप्रिय गीतकार गोपालदास नीरज नहीं रहे। सरल और सरस शब्दों में जीवन का निचोड़ रख देने वाले गीत, कविता कहने का अंदाज और खुशमिजाज व्यक्तित्व के धनी गोपालदास ’नीरज’ का लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को एम्स में निधन हो गया। वे 93 साल के थे। नीरज के निधन की खबर आते ही मुख्यधारा के मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देने का तांता लग गया। जीवन के प्रति उनकी अगाध आस्था थी तभी तो वह कहते थे कि-

‘‘जो पुण्य करता है वह देवता बन जाता है, जो पाप करता है वह पशु बन जाता है और जो प्रेम करता है वो आदमी बन जाता है।’’

उनके गीतों में बड़ी खामोशी से चीखती विगत प्रेम की वेदना और टीस कभी युवा नम आंखों के लिए रूमाल हुआ करती थी। यही कारण है कि युवा वर्ग उन्हें बेइंतहा पसंद करता था। अपने जीवनकाल में वे न सिर्फ लोकप्रियता की बुलंदियों तक पहुंचे बल्कि कई दशकों तक उन्होंने बुलंदियों को ही अपना मुकाम बनाए रखा। इस मामले में दूसरे कवि-गीतकार उनसे रश्क कर सकते हैं। कविता एवं गीत के अलावा वे मुंबइया फिल्म जगत के भी जाने-पहचाने शख्सियत थे। कई फिल्मों के लिए उन्होंने बेहतरीन गीत लिखे। लेकिन जब वे फिल्मी लेखन के कॅरियर में बुलंदियों पर थे,अपना पैर वापस खींच लिए। इसका कारण उन्होंने अपने मनपसंद संगीतकार जयकिशन और एसडी वर्मन का निधन बताया था। इससे साफ जाहिर है कि सिर्फ पैसा और नाम के लिए वे कोई काम नहीं करते थे बल्कि काम से संतुष्टि भी एक शर्त होती थी। 

सफलता और लोकप्रियता के शिखर तक की उनकी यह यात्रा इतनी आसान नहीं थी। लेकिन राह की हर बाधा को अपने हौसले से पार करते गए। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली गांव में 4 जनवरी 1925 को उनका जन्म हुआ। नाम रखा गया गोपलादास सक्सेना। छह वर्ष की अवस्था में ही पिता के असमय निधन के बाद पूरे परिवार का जीवन संघर्षों एवं कष्ट से भर गया। आर्थिक अभाव में उनको पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर कच्ची उम्र में पेट पालने के लिए नौकरियां करनी पड़ी। लेकिन संघर्षों के बीच भी शिक्षा के प्रति उनका अनुराग बरकरार रहा। नौकरी करते हुए उन्होंने हिंदी में एमए किया। इस दौरान वे  ‘‘नीरज’’ उपनाम से कविता और गीत लिखते रहे। अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी साहित्य के प्रोफेसर नियुक्त हुए। संघर्ष एवं अभाव उनके व्यक्तित्व को निखारते रहे। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने नीरज को 1991 में पद्मश्री और 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। 

बचपन से ही जीवन और व्यवस्था के यथार्थ से टकराने के कारण उनके गीतों में न सिर्फ सत्य की झलक मिलती है बल्कि पूरे जीवन का फलसफा होता है। जीवन संघर्ष में उनके आंखों में पलने वाले कई सपने टूटे लेकिन कुछ सपनों के टूटने और आखों से अश्रु के कुछ बूंद गिरने पर वह हार मान कर बैठने के बजाय नए सपनों को देखना शुरू कर देते। तभी तो वह लिखते हैं कि-

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों

कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है, नयन सेज पर

सोया हुआ आंख का पानी

और टूटना है उसका ज्यों

जागे कच्ची नींद जवानी

गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों

कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

जीवन की कठिनाइयों को नजदीक से देखने समझने और संघर्ष का संदेश देने वाले नीरज राजनीति के चरित्र से भलीभांति वाकिफ थे। तभी तो वह कहते हैं कि-

जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं

मुश्क़िल में इन्सान रहेगा।

‘नीरज’ तो कल यहां न होगा

उसका गीत-विधान रहेगा।

नीरज की पहचान फिल्मी गीतकार के रूप में भी है। उन्होंने बॉलीवुड के लिए कई सुपरहिट गाने लिखे। ’मेरा नाम जोकर’, ’प्रेम पुजारी’, ’तेरे मेरे सपने’ और ’गैंबलर’ जैसी फिल्मों के गाने आज भी लोगों की जुबान पर होते हैं। प्रेम पुजारी के लिए ’शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब...’ और ’फूलों के रंग से...’ जैसे गाने लिखे। नीरज के पांच मशहूर गानों में शामिल हैं- ’कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे...’ (फिल्म ’नई उम्र की नई फसल’ साल 1965 ), ’फूलों के रंग से दिल की कलम से... (फिल्म ’प्रेम पुजारी’ साल 1970), ’ऐ भाई ज़रा देख के चलो...’ (फिल्म  ’मेरा नाम जोकर’ साल 1970), ’खिलते हैं गुल यहां मिलके बिछड़ने को...’ (फिल्म  ’शर्मीली’ साल 1971), ’दिल आज शायर है, ग़म आज नगमा है...’ (फिल्म ’गैंबलर’ साल 1971) शामिल है। 

पंकज चतुर्वेदी

नीरज जी बेहद स्वाभाविक गीतकार थे। गीत जैसे उनकी सांस थे। उसके लिए उन्हें कोई श्रम या प्रयत्न नहीं करना पड़ता था। अपनी साधना की बदौलत वाणी पर यह सहज अधिकार उन्होंने अर्जित किया था और जब वे डूबकर गीत गाते, तो महफ़िल चाहे हज़ारों की हो, गूंजता सिर्फ़ उनका गीत था, बाक़ी सबका अस्तित्व उसमें लय हो जाता था, ख़ुद उनका भी। गीत मानो उनके लिए समूची ज़िंदगी थे---एक ऐसा सात्त्विक नशा, जो दूसरों के भी ज़ेहन पर छा जाता और नतीजतन उन्हें ’दूसरा’ रहने नहीं देता था।

लोकप्रिय गीतकार के साथ एक मुश्किल यह होती है कि उसे अक्सर ’रोमैंटिसिज़्म’ या शृंगार से जोड़कर देखा और प्रचारित किया जाने लगता है और इस हल्ले में ज़िंदगी के यथार्थ की उसकी समझ और संजीदगी की अवहेलना होती रहती है। नीरज को इसकी शिकायत थी और ज़रा आत्ममुग्ध लहजे में सही, पर उन्होंने अपने रचना-कर्म का मर्मस्पर्शी सिंहावलोकन किया है: कभी यह कहकर कि “आज भले कुछ भी कह लो तुम, पर कल विश्व कहेगा सारा / नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था, पर प्यार नहीं था।“ और आप इसे निरी रोमैंटिसिज़्म न समझ लें, इसलिए फिर यह कहकर भी:

“पद लोभी आलोचक कैसे करता दर्द पुरस्कृत मेरा 

मैंने जो कुछ गाया, उसमें करुणा थी, शृंगार नहीं था।“

इसी बिंदु पर लगता है कि वह प्यार की अहमियत और अपरिहार्यता पर बराबर इसरार करते रहे और वास्तविक जीवन में उसे असंभव जानकर उसकी करुणा से भी आप्लावित रहे। यथार्थ का एहसास न होता, तो यह शोक कहाँ से उपजता ? अहम बात यह है कि इसका उन्हें मलाल नहीं, गर्व है; क्योंकि यह पीड़ा उनके नज़दीक सच्ची मनुष्यता या जन-पक्षधरता और उससे भी अधिक जन से एकात्म होने की निशानी है:

“इसीलिए तो नगर-नगर बदनाम हो गये मेरे आंसू 

मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नहीं था।“

इस सिलसिले में एक और गीत का हिस्सा ग़ौरतलब है:

“आंसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा।

जहां प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा।

मान-पत्र मैं नहीं लिख सका, राजभवन के सम्मानों का

मैं तो आशिक़ रहा जन्म से, सुंदरता के दीवानों का।

लेकिन था मालूम नहीं ये, केवल इस ग़लती के कारण

सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा।“

मुझे लगता है कि ’शृंगार’ और ’रोमैंटिसिज़्म’ की ख्याति के कोलाहल या अपनी लोकप्रिय स्टार छवि की चकाचौंध में वास्तविक रचनाकार और उसके भीतर का मनुष्य हमसे बिछुड़ जाता है और हम उसे चाहने के नाम पर उसकी एक सुघड़ क़िस्म की उपेक्षा करते रहते हैं। हम यह जान नहीं पाते कि वह इस अत्याधुनिक सभ्यता में हमारे, यानी सामान्य मनुष्य के अकेलेपन का एक बड़ा रचनाकार है:

“सुख के साथी मिले हज़ारों ही, लेकिन

दुःख में साथ निभानेवाला नहीं मिला ।

मेला साथ दिखाने वाले मिले बहुत,

सूनापन बहलाने वाला नहीं मिला।“

एक बर्बर पूंजीवादी निज़ाम में---जिसमें हम सांस लेने को विवश हैं---इंसान जब होश संभालता है, तो यही पाता है कि लगातार लालच, छीनाझपटी, झूठ, लूट, बेईमानी, छल-कपट और हिंसा से उसका सामना है और इसमें उसे वंचित और लहूलुहान ही होते रहना है। यही वजह है कि प्रेम ऐसे परिदृश्य में एक स्वप्निल या असंभव स्थिति है। इस सचाई का जैसा मार्मिक और प्रभावशाली चित्रण नीरज ने किया, हिंदी कविता में वह बेमिसाल है:

“मैं जिस दिन सोकर जागा, मैंने देखा,

मेरे चारों ओर ठगों का जमघट है,

एक इधर से एक उधर से लूट रहा,

छिन-छिन रीत रहा मेरा जीवन-घट है,

सबकी आंख लगी थी गठरी पर मेरी,

और मची थी आपस में तेरी-मेरी, 

जितने मिले, सभी बस धन के चोर मिले,

लेकिन हृदय चुराने वाला नहीं मिला।

सुख के साथी मिले हज़ारों ही, लेकिन

दुःख में साथ निभाने वाला नहीं मिला।“

उनका जाना हिंदी कविता के लिए बहुत बड़ी क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि। शत शत नमन

 

 








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