आस्था के तीर्थ बने अव्यवस्था के अड्डे

धर्म-समाज , , रविवार , 17-06-2018


govardhan-brajbhumi-environmentday-mandir-greenarea

संदीप जोशी

आस्था जब निरंकुश होती है तो व्यवस्था चरमराती है। आज अपनी आस्था के तीर्थ अव्यवस्था के तीर्थ हो गए हैं। आस्था की निरंकुशता और अव्यवस्था के तीर्थ ही समाज के पर्यावरण को भी दूषित कर रहे हैं। सरकारी अव्यवस्था और मानवीय लोभ ने धरती के प्राकृतिक पर्यावरण को असहनीय बना दिया है। सरकारी अनदेखी और मानवीय नासमझी ने समाज को शर्मनाक स्थिति में ला दिया है। तीर्थों का हाल शहरों से भी बुरा हो गया है। समाज के कचरे ने कचरे के तीर्थ बना दिए हैं। इस सबके बावजूद देश भर में पांच जून को हर साल पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

आधे मई और आधे जून के महीने में अधिक मास भी आता है। अधिक मास में कैसे भी मंगलकार्य नहीं करने की प्रथा है। लेकिन आत्मि शुद्धि के लिए उपवास करना, भजन-कीर्तन और जप-तप करने का सही समय भी अधिक मास ही माना गया है।

इन्हीं दिनों में लोग तीर्थ जा कर आत्म शुद्धि और निरोगी काया के लिए जप-तप करते हैं। अपन भी पर्यावरण दिवस पर गोवर्धन परिक्रमा करने गए। भयंकर गर्मी और समय की कमी के कारण साईकल से गोवर्धन परिक्रमा करने का तय किया। गोवर्धन में भीड़ इतनी थी कि साईकल तो दूर सही से पैदल चलना भी मुश्किल था। बिना टकराव या टक्कर के पैदल चलना संभव ही नहीं था। इसलिए शनिवार को टाल कर रविवार सुबह परिक्रमा करने का मन बनाया। परिक्रमा एक तरह से समाज के प्रति सहज परिश्रम ही है।

गोवर्धन जल- जंगल- जमीन के होने और सहेजने का पौराणिक ही नहीं, आज भी ताजा उद्धारण है। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा मार्ग पर रेत के रास्ते के अलावा अच्छी सड़क, सही दिशा निर्देश और अन्यं सभी सुविधाएं थीं। गोवर्धन के चारों ओर सुंदर कुंड, तालाब और ढेर सारे जलाशय बरसों से रहे हैं। लेकिन शहर की ओर से आते सभी नाले भी इन्हीं जलाशयों में मिलते दिखे। जिसके कारण ये जलाशय कम और नाले ज्यादा रह गए हैं। अच्छी बारिश ही इन जलाशयों को साफ करती होगी। तीर्थ के बाजार में लगी जनता को इन जलाशयों को साफ-पवित्र रखने की फुरसत ही नहीं है।

अधिक मास और बच्चों  की छुट्टियां का पुराना मेल रहा है। माता-पिता की आस्था और बच्चों की आशा के कारण तीर्थ घूमने भर के बहाने रह गए हैं। बृजभूमि की कहावत ‘लगेगी रज तो बढ़ेगें गज’ के अनुरूप गोवर्धन में लाखों लोग जमा हुए थे। अधिक मास और छुट्टियों के अलावा बाजार निर्मित वीकएंड के शनिवार की शाम भी थी। ऐसा लगा कि‍ जितनी बृज में रेत नहीं बची है उससे कहीं अधिक भक्तगण वहां पहुंच गए हैं। जहां पांव रखने की जगह भी नहीं वहां परिक्रमा करना पाप जैसा लगा। इक्कीस किलोमीटर के परिक्रमा मार्ग पर लाखों लोग पैदल, लोटते हुए या घिसट कर परिक्रमा कर रहे थे। बुजुर्ग और बच्चे तो अपने अभिभावकों के सहारे और इशारे पर थे। और सारे रास्ते भर प्लास्टिक बिखरा पड़ा था।

पानी के प्लास्टिक ग्लास और पन्नियां के अलावा खाने की थरमोकोल प्लेाटों से गोवर्धन पर्वत बर्फ की सफेद चादर से घिरा लग रहा था। लेकिन यह सफेद प्लास्टिकी चादर जल्दी ही पर्वत को लील सकती है। जब कचरा करने वाले लाखों हों और सफाई करने वाले गिने-चुने हों तो व्यावस्था नगण्य हो जाती है।

पर्यावरण दिवस पर आए सप्ताह अंत में गोवर्धन में लाखों तीर्थ पर्यटकों के ही कारण व्यवस्था नाम मात्र रह गयी थी। लेकिन सरकार बनाने-बदलने वाली जनता आखिर अपने सिवा किस को दोष दे सकती है। शरीर का कर्म मन के धर्म से अलग होता है। जहां शरीर का अपना अस्तित्व होता है वहीं मन की आस्था होती है। शरीर और मन के अलग अलग कर्म और धर्म को समझना ही संपोषणीय जीवन जीना है।

समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी जनता से लेकर सबसे ऊंचे पायदान पर पसरी जनता को यह भेद सामाजिक समरसता के लिए समझना जरूरी है। और समरस समाज ही समृद्ध सृष्टि या पर्यावरण को सहेज सकता है। समरस समाज में राजनीतिक दखलअंदाजी जो हो सो तो है ही लेकिन समाज के पर्यावरण को ठेस पहुंचाने में जनता के बाजार का भी योगदान कम नहीं है। आज प्लास्टिक के कारण अपना समाज पंगु होता जा रहा है। दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजन में परिक्रमा करते हुए यह प्रार्थना होती है।

‘गोवर्धन बाबा तू बढ़ो, तुझसे बढ़ो न कोय

चार कूट को चौधरी, बन-मानस में होय

मानसी गंगा गिरिवर दे, गिरिवर की परिकरमा दे’

अपन जब अपनी आस्था में तीर्थ की परिक्रमा कर सकते हैं तो साफ वातावरण, सही पर्यावरण के लिए प्रकृति की अपने परिश्रम से परिक्रमा क्यों नहीं कर सकते। आखिर अपनी आस्था भी तभी तक है जब तक यह सृष्टि है। यही प्रार्थना है। बृज के रज की तरह पर्यावरण सहेजने की भी अपनी आस्था बने, और बड़े।

                      (संदीप जोशी पूर्व क्रिकेटर और सामाजिक-राजनीतिक विषयों के जानकार हैं।)




Taggovardhanparikarma brajbhumimathura enviromentday mandir greenarea

Leave your comment