बाजरे या तिल के इंतज़ार में विदा होता नवम्बर

बदलाव , , शुक्रवार , 23-11-2018


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संदीप नाईक

आज बैकुंठ चतुर्दशी है यानी त्रिपुरारी पुर्णिमा- जो दोपहर दो बजे आरंभ हो चुकी है, सब्जी बाजार में मेथी के एकदम ताजे पत्ते लिए बैठी थी वह बुढ़िया, कह रही थी कि आज का चांद कल के चांद से ज्यादा सुंदर होगा इसलिए कि कल तो पूनम है ही और चांद को होना ही है सुंदर और पूरा होने के पहले जो थोड़ी सी कमी रह जाती है वही आखिर में सबसे सुंदर होता है; पूरा होने पर तो हर कोई सुंदर कहेगा और ना भी कहे तो सुंदर होने का खिताब कोई छीन नहीं सकता उससे। 

ठीक यही समय है जब बाजार में चारों ओर हरापन बिखरा पड़ा है। हरा पालक, हरी मेथी, हरे सुये की तीक्ष्ण गन्ध वाली पत्तियां, गीला अदरक, महकता लहसुन, ताजी बालोर, चटख रंग लिए बैंगन, लाल भक्क से टमाटर या कि बहुत नरम सी मटर और यहीं कहीं मानव जीवन आस-पास बिखरा पड़ा है। 

यह जाते हुए नवंबर के आखरी दिन हैं जो साल का आखिरी महीना ले आएंगे जैसे आखरी मुहाने पर खड़ा जीवन यूं ही कुनकुनी धूप में सूखते हुए निष्ठुर कड़क हो जाएगा और फिर हम इस गुजरे हुए साल के बारे में सोचेंगे, सही भी है जीवन की पूर्णता के एक कदम पहले ही सब कुछ सुंदर होता है, पूरा साल होने पर तो खूबसूरत हो ही जाएगा क्योंकि गुजर जायेगा और किसी भी गुज़रे हुए का मातम नहीं मनाते। बस मुस्कुराकर याद कर लेते हैं और जब होंठ का तालमेल दिमाग़ की उन महीन स्मृतियों से होता है जो गुज़रते हुए अपनी जगह बना गई थीं तो बरबस ही मुस्कुराहट फ़ैल जाती है। कहीं यादों के नश्तर भले ही चुभते रहें ।

मैं नवम्बर में हिसाब कर लेना चाहता हूं ताकि शेष बचे समय में साल की गुजरती जा रही हर धूप छांह की बदली को करीब से देखूं , अपने अंदर उस ताप को महसूस करूं जो आहिस्ता से इस जर्जर हो चुके शरीर को तपाते हुए खत्म कर देगी। जाने के पहले इस साल की सभी स्मृतियों को संजोकर यूं रखना चाहता हूं जैसे खसखस, बाजरे की या तिल की पकती फसल से कोई नरम हाथ हर छोटे से चिकने दाने को बिखरने से पहले सहेज लेता है और नए साल के उत्तरायण में जाते सूर्य को अक्षत देकर विदा करता है और दिन-रात की चाल बदल जाती है।

मैं इंतज़ार में हूं नवम्बर के इन आखिरी दिनों में अपने आप से एकाकार होने को ताकि दिसम्बर जब शुरू हो तो विनम्र धूप में सब कुछ विदा कर सहेजने को औचक सा तैयार रहूं।

माहे नवम्बर के बरक्स अमरूदों से उम्मीदें 

यह अमरूदों का मौसम हुआ करता था। यह वह समय था जब बहुत छोटे से, नरम और गुदबदे से खूब सारे बीज लिए अमरूद पक जाते थे और फिजाओं में उनकी महक तैरा करती थी- लगता था पूरी धरती के सारे फल खत्म हो गए हैं और सिर्फ अमरूद  ही बचे हैं। 

किसी को हरा रंग देखना हो तो अमरूदों को देखो। जिसमें इतने भिन्न भिन्न रूप हैं कि हर अमरूद का अपना हरापन है। जीवन की भांति, हर अमरूद के भीतर अपने बीजों का एक ढांचा है - कहीं कम है, कहीं ज्यादा, कहीं लाल, कहीं सफेद और कहीं पीले से जर्द पड़ते दांतों के समान जो पायरिया से लगभग ग्रस्त हो गए हों पर उनकी चमक और महत्व बरकरार थी।

यह वही अमृत के हिस्से थे जो हमेशा जीवन में आशा बनाए रखते थे, इसके हरे हिस्से को खोलकर या चबाकर मैं बीजों को गहराई से देखने - समझने की नाकाम कोशिश करता और बीजों को देख हमेशा एक नए संसार की कामना जागृत होती थी- यह दीगर बात थी कि कई पौधे अमरूद के मैंने लगाए वे पनपे भी, सूख भी गए और कहीं फल लगें तो पक नही पाएं- काले होकर किसी सात माही बच्चे की तरह अल्प अवधि में ही खत्म हो गए। 

नवम्बर के इसी मौसम में अशोक के पेड़ के शीर्ष भी शिखरों को, नीरभ्र आसमान छूने की  कामना करते हैं- पुरानी पत्तियां गिराते हुए नई पत्तियों की होड़ के साथ ऊंचे और ऊँचे होते जाते हैं जैसे चीड़ के पेड़ मनाली में बादलों को भेदकर निकल जाना चाहते हों, कहते हैं एक अशोक का पौधा लगाने से सौ पुत्रों का सुख मिलता है- अब हंसी आती है कि इसी सोच ने अपने आसपास बेटियों की संख्या धीरे-धीरे समाज में इतने नीचे कर दी है कि अब गिनने के लिए भी एक दिन शायद ही शेष ही बचे। 

वे अमरूद के बीज बहुत उम्मीद जगाते थे उन्हें फ़ल में मौजूद पानी के साथ खाना- जो अमरूद के अंदर पर्याप्त रूप से मौजूद होता था - लगता था तृप्ति मिल गई है,  परंतु यह भी सिखाया जाता था कि अमरूद से खांसी होती है और माह नवंबर अनुशासन तोड़कर ढेरों कच्चे पक्के अमरूद खाकर खांसते-खांसते और बहती नाक पोछते दिसंबर आ जाता था, दिसंबर के आखिर की सात दिन की छुट्टियां बहुत ध्यान खींचती थीं, खुश रहते थे, सपने और उमंगों में जीते-जीते नवंबर खत्म हो जाता था। 

इस नवंबर का खत्म होना सिर्फ पीड़ा और स्मृति दंश नहीं था बल्कि अगले साल तक उम्मीदों का एक जखीरा बचाये रखने की भी भारी ज़िम्मेदारी होता, लगता था इसी नवंबर के बाद शेष बचे माह में जीवन को अगले बरस के लिए तैयार ही नहीं करना था- बल्कि शेष जीवन के लिए बीजों को सुरक्षित रख लम्बी लड़ाई लड़नी है- धरती के हर उस कोने से जो बीज के उगने में व्यवधान पैदा करता है, आसमान के हर उस हिस्से से जो उसकी धूप रोकता है और पानी से जो हर ओंस की बूंद में सुबह आता तो है पर सूरज की रश्मि किरणों की थाप पड़ते ही फुर्र हो जाता है। जैसे अच्छे पल और आवारा हवाओं से जो किसी भी दिशा से आती और कंपकपाते हुए घायल कर जातीं।

माहे नवम्बर की गुफ्तगूं दिसम्बर के गलियारों तक ही नहीं अपितु जीवन के दूर- दूर तक पसरे बरामदों और आंगन -ओसारियों में सुनाई देती है और मैं चहकता हूं कि एक चिड़िया मेरे आंगन में फुदके और पक रहे अमरूदों में चोंच लड़ा जाए, तोतों के झुंड आएं और सारे अमरूदों को झूठा कर जाएं कि बीज मीठे होंगे तो आने वाले दिसम्बर के पीछे से झांकता नया साल कुछ कोमल नवांकुर लेकर आएगा और हम फाग में मस्ती के गीत गाएंगे।

(संदीप नाईक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल भोपाल में रहते हैं।) 


 








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