घिसे-पिटे फॉर्मूले और गुजरात चुनाव

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य, शुक्रवार , 17-11-2017


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डॉ. राजू पाण्डेय

गुजरात चुनाव के पूर्व जारी घटनाक्रम किसी फार्मूला फिल्म की याद दिलाता है। फार्मूला फिल्मों की यह विशेषता थी कि उन्हीं घिसे पिटे दृश्यों, संवादों और पटकथा के बावजूद वे दर्शक को सिनेमा हॉल तक न केवल खींच लाती थीं बल्कि तीन घंटे तक बाँधे रहती थीं। 

संभवतः इसका कारण यह था कि ये फ़िल्में दर्शक की आदिम प्रवृत्तियों काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, प्रेम, करुणा, वात्सल्य आदि को उतने ही आदिम और अनगढ़ ढंग से झंझोड़ती थीं और दर्शक संस्कारजन्य वर्जनाओं से मुक्ति का अनुभव कर आनंदित होता था।

 

फॉर्मूला फिल्मों में आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय संयोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। और यहाँ तो संयोगों की झड़ी लग गई है!


गुजरात चुनाव भारतीय लोकतंत्र की ऐसी ही आदिम प्रवृत्तियों को उजागर करने का अवसर बन गया है। ऐसा लगता है कि फार्मूला फिल्मों के किसी दक्ष पटकथा लेखक की फिल्म का मंचन हो रहा है। भारतीय लोकतंत्र के जटिल व्यक्तित्व की प्रत्येक विशेषता यहाँ देखी जा सकती है। उग्र हिंदुत्व और धार्मिक बहुसंख्यकों के आधिपत्य की स्पष्ट स्वीकारोक्ति ने भाजपा को हालिया चुनावों में सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और कोई कारण नहीं वह इस फॉर्मूले पर और दृढ़ता से काम न करे। 

साभार : गूगल


हमें गर्व होना चाहिए कि हम भारतीय राजनीति की उन दो विभूतियों के युग में रह रहे हैं जिन पर सर्वाधिक व्यंग्य चित्र बनाए गए हैं और चुटकुलों की रचना की गई है।


कांग्रेस यह जानती है कि भाजपा के इस प्रत्यक्ष हिन्दू आधिपत्य के उद्घोष से विचलित अल्पसंख्यकों को अंततः उसके पास आना ही है क्योंकि क्षेत्रीय दल अल्पसंख्यकों के अस्तित्व की लड़ाई में वह सहायता नहीं दे सकते जो कोई राष्ट्रीय दल दे सकता है। कांग्रेस यह भी जानती है कि बहुसंख्यक हिंदुओं के समर्थन के बिना चुनाव नहीं जीता जा सकता। यही कारण है कि सॉफ्ट हिंदुत्व के फार्मूले पर काम करते हुए राहुल गाँधी मंदिरों के चक्कर लगा रहे हैं। 

पूजा पाठ और मंदिर दर्शन की इस होड़ ने मध्ययुगीन सामंती धार्मिक परम्पराओं को साकार किया है जब राजा-महाराजा युद्ध में प्रवृत्त होने के पूर्व मंदिरों में अपने इष्ट देवों का आशीर्वाद प्राप्त करते थे। लोकतंत्र के चुनावी युद्ध में मंदिरों की यात्रा दैवी कृपा प्राप्त करने से अधिक अपनी धार्मिक प्रतिबद्धताओं को जन सामान्य के सम्मुख रेखांकित करने हेतु की जाती है। 

धर्म की राजनीति के पुराने फॉर्मूले के प्रस्तुतिकरण में कुछ नयापन है। मुस्लिम धर्म गुरुओं द्वारा जारी किए जाने वाले फतवों के समानांतर हिन्दू धर्म गुरुओं के फतवे सामने आ रहे हैं। सैद्धांतिक रूप से कट्टरता का जवाब कट्टरता नहीं होता और ऐसी रणनीति का दीर्घकालिक परिणाम आत्मघाती हो सकता है किंतु तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि हेतु इसे लाभदायक माना जा रहा है। 

पार्श्व संगीत की फिल्मों की सफलता में अहम भूमिका होती है क्योंकि यह सामान्य दृश्यों और संवादों को प्रभावकारी बनाने में अपना योगदान देता है। उत्कृष्ट पार्श्व संगीत लाउड हो यह आवश्यक नहीं। यह अपने स्वतंत्र अस्तित्व से अधिक दृश्य के साथ एकाकार हो जाने में अधिक प्रभावकारी होता है। ऐसा ही पार्श्व संगीत बज रहा है- यह राम मंदिर और रोहिंग्या जैसे रागों पर आधारित है। 

राम मंदिर का मुद्दा न्यायालय के समक्ष है। रोहिंग्या का मामला एक अंतर्राष्ट्रीय विषय है। किंतु दोनों के समर्थन और विरोध की सिम्फनी जारी है और इसमें टीवी चैनलों के एंकर और उनके द्वारा बुलाए गए धर्मगुरु नुमा राजनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञ नुमा धर्मगुरु अपने समन्वित प्रयासों से विवादों की धुन उत्पन्न कर रहे हैं। 

भारतीय चुनावों की फिल्म में जाति की राजनीति का फार्मूला न हो यह संभव ही नहीं है। जातिवाद के फार्मूले का एक नया वैरिएंट यहाँ प्रयुक्त हो रहा है। 

जब बिहार और उत्तरप्रदेश में जातिवाद की राजनीति का सूत्रपात हुआ था तो इसे प्रगतिशील चश्मे से देखा जा सकता था क्योंकि इसमें जो जातियाँ शामिल थीं वे दलित और पिछड़े वर्ग से सम्बंधित थीं और आर्थिक रूप से कमजोर तथा सामाजिक रूप से दमित, शोषित और वंचित भी थीं। किन्तु हरियाणा के जाट आंदोलन के बाद जातिवाद का जो नया फार्मूला दिख रहा है उसमें आरक्षण माँगने वाली जातियाँ किसी भी दृष्टि से सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर नहीं हैं। 

गुजरात का पाटीदार आंदोलन इसी जातिवाद की एक कड़ी है। यहाँ एक सशक्त जाति अपने जुझारूपन और गुजरात के विकास में अपनी भूमिका के बदले में अतिरिक्त प्रोत्साहन और पुरस्कार माँग रही है। 

यह कन्हैया कुमार के जय भीम लाल सलाम के फार्मूले वाला जातिवाद नहीं है। वामपंथ की अपनी पारिभाषिक शब्दावली है और इसका प्रयोग वामपंथियों को अत्यंत रुचिकर भी लगता है। वे जातिवाद के इस स्वरूप को प्रगतिशील जातीय संघर्षों में मनुवाद की सेंधमारी कह सकते हैं। यदि जातिवाद का यह नया फार्मूला सफल हो जाता है तो फिल्म पद्मावती के विरोध के बहाने इसका अभ्यास करते राजपूत इसका लाभ उठाने के लिए तैयार हैं। 

बुनियादी मुद्दा यह है कि यदि जाति के विमर्श को सामाजिक समानता लाने में सहायक मान भी लिया जाए फिर भी यह प्रश्न तो बना ही रहेगा कि क्या इससे सामाजिक समरसता भी प्राप्त की जा सकती है? किन्तु यह बुनियादी मुद्दों को हाशिए पर डालने का युग है। प्रादेशिक चुनाव हो और प्रांतवाद का फार्मूला न अपनाया जाए यह हो ही नहीं सकता। तो इसीलिए गुजरात के गौरवमयी अतीत, शानदार इतिहास और गुजराती स्वाभिमान के नारे तेजी पकड़ते जा रहे हैं।

गुजरात पारंपरिक रूप से व्यापार, उद्योग और कृषि में एक उन्नत प्रदेश समझा जाता है। पिछले एक वर्ष में सरकार ने अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण के ग्लोबल और कॉर्पोरेट एजेंडे को क्रियान्वित करने हेतु दो बड़े कदम उठाए- नोट बंदी और जीएसटी। इन दोनों कदमों के विषय में आम धारणा यह है कि जहाँ नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र के उद्योग धंधों को नुकसान पहुँचाया जिससे कितने ही लघु एवं कुटीर तथा कृषि आधारित उद्योग बन्द हुए और बेरोजगारी तथा गरीबी को बढ़ावा मिला वहीं जीएसटी छोटे एवं मझोले व्यापारियों तथा उद्यमियों हेतु नुकसानदेह सिद्ध हुआ। गुजरात इन दोनों कदमों से सर्वाधिक प्रभावित रहा और आम लोगों का असंतोष इतना व्यापक है कि सरकार समर्थक कहे जाने वाले मीडिया को भी दबे स्वर में- इसे नकारने के लिए ही सही- इस असन्तोष की चर्चा करनी ही पड़ी है। 

नोटबन्दी के बाद हुए विभिन्न चुनावों में मिली सफलता-जिसमें उत्तरप्रदेश की हैरतअंगेज रूप से विशाल जीत भी सम्मिलित है- से उत्साहित भाजपा ने इन क़दमों के समर्थन की अपनी लाइन में जरा भी परिवर्तन नहीं किया है। और इन्हें देश के भ्रष्टाचारियों एवं काले धन के मालिकों को सबक सिखाने के सरकारी संकल्प को देश के ईमानदार और राष्ट्रभक्त नागरिकों द्वारा दिए जा रहे समर्थन के प्रमाण के रूप में पेश किया जा रहा है। 

फॉर्मूला फिल्मों में आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय संयोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। और यहाँ तो संयोगों की झड़ी लग गई है। विश्व बैंक ने इज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस के आकलन में भारत के शानदार प्रदर्शन को चर्चा में ला दिया है। 

नोटबंदी और जीएसटी से न केवल देह व्यापार में कमी आना पाया गया है बल्कि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम हो गया है। 

जीएसटी काउंसिल की बैठक में ढेर सारी चीजों पर जीएसटी कम करने के लिए सर्वसहमति बन गई है। अक्षरधाम के हमले का मास्टरमाइंड पकड़ा गया है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मोदी जी की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए भारत की बढ़ती ताकत को स्वीकारा है। 

प्यू रिसर्च सेंटर ने बताया है कि मोदी जी भारतीय जनता के चहेते हैं और गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार और सुरक्षा के मुद्दे पर शानदार कार्य कर रहे हैं। 

कोई कितना भी अविश्वास करे, चाहे तो अपने सिर के बाल नोच ले किन्तु ये विचित्र संयोग फिल्म की पटकथा को अकल्पनीय घुमाव प्रदान कर रहे हैं। 

गुजरात के लोगों का निर्णय भारतीय लोकतंत्र के सम्मुख उपस्थित हो रहे एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देगा। यह प्रश्न है- भारतीय जनमानस को सांस्कृतिक-धार्मिक-जातीय अस्मिता और आर्थिक-सामाजिक आत्मनिर्भरता में कौन अधिक प्रिय है? क्या रोटी-कपड़ा-मकान, सड़क-बिजली-पानी और स्कूल-अस्पताल की बुनियादी जरूरतों को भुला कर जनता अपनी धार्मिक और जातीय पहचान के आधार पर चयन कर सकती है? 

किन्तु बुनियादी मुद्दे लोकतंत्र की इस फार्मूला फिल्म में कॉमेडी हेतु प्रयुक्त हो रहे हैं, चर्चा इस बात पर हो रही है कि विकास पागल हो गया है या गुम गया है। 

चर्चा यह होनी चाहिए कि विकास का गुजरात मॉडल अमीर और गरीब के बीच की खाई को क्या बढ़ा नहीं रहा है? क्यों यह एनआरआईज़ तथा कॉर्पोरेट्स को प्रिय है? क्यों आम गुजराती व्यापारी हताश और निराश है? 

जिस व्यक्ति का विकास हुआ है वह अपने विकास की कहानी खुद बखान करेगा या उसे आंकड़ों के जरिए समझाना पड़ेगा कि वह विकसित हो चुका है? 

क्या गुजरात के विकास का लाभ हर जाति और हर धर्म के लोगों तक समान रूप से पहुंचा है? किन्तु इन मुद्दों पर चर्चा होती नहीं दिखती। अपने सर्वश्रेष्ठ दौर में अमिताभ बच्चन जबरदस्त कॉमेडी भी किया करते थे और उन्होंने सारे कॉमेडियन्स की छुट्टी कर दी थी। आज भी सत्तापक्ष के नायक नरेंद्र मोदी जी और विपक्ष के नायक राहुल गाँधी जी की चुनावी रैलियों के दौरान कॉमेडी देखते ही बनती है। इनके कई कॉमिक सीन्स तो सोद्देश्य और सप्रयास अभिनीत होते हैं किंतु इन महानुभावों की कथनी और करनी के विरोधाभास के कारण जो सिचुएशनल कॉमेडी पैदा होती है वह हँसाती भी है और रुलाती भी है।

हमें गर्व होना चाहिए कि हम भारतीय राजनीति की उन दो विभूतियों के युग में रह रहे हैं जिन पर सर्वाधिक व्यंग्य चित्र बनाए गए हैं और चुटकुलों की रचना की गई है। फार्मूला फिल्मों में नायक, प्रतिनायक और खलनायक ही छाए रहा करते थे। सामाजिक सरोकारों की चर्चा या तो होती ही नहीं थी या इन लार्जर दैन लाइफ कैरेक्टर्स की अतिरंजनापूर्ण गतिविधियों में कभी कभार इनकी हल्की सी झलक दिख जाती थी। 

गुजरात चुनाव को भी धीरे धीरे मोदी, राहुल, अल्पेश, जिग्नेश, हार्दिक जैसे व्यक्तित्वों के इर्दगिर्द समेटा जा रहा है। 

चुनाव प्रचार का स्वरूप भी फार्मूला फिल्मों की याद दिलाता है। जब सुपरस्टार के करिश्मे पर निर्माता को विश्वास नहीं होता था और उसके पास पर्याप्त बजट भी होता था तो वह मल्टी स्टारर फिल्मों का निर्माण करता था किंतु छोटे निर्माताओं की फिल्मों को सुपरस्टार अपने दम पर हिट कराने का सफल असफल प्रयास करता था। 

भाजपा और कांग्रेस के चुनाव प्रचार के उदाहरण सामने हैं। अंग प्रदर्शन और सेक्स का तड़का लगाए बिना फार्मूला फ़िल्में सफल नहीं हो पाती थीं। ऐसे आपत्तिजनक दृश्यों के विषय में सफाई दी जाती थी कि ये पटकथा की माँग हैं। एक के बाद एक प्रकट होने वाले सेक्स सीडी आधुनिक चुनावों की पटकथा की माँग हैं। 

हिंसा के बिना फार्मूला फ़िल्में सफल नहीं हो पाती थीं। गुजरात चुनाव में शारीरिक हिंसा भले ही राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच झूमाझटकी तक सीमित रही हो लेकिन वैचारिक हिंसा जम कर हो रही है। विभिन्न दलों के सोशल मीडिया और आई टी सेल वैचारिक निंदा, नफरत और नकारात्मकता के नश्तर खूब चुभा रहे हैं। हिंसा के दृश्यों के फिल्मांकन के लिए स्टन्टमैन और डुप्लिकेट्स तथा एक्स्ट्रा कलाकारों की जरूरत पड़ती थी। सोशल मीडिया और आई टी सेल में भी कुछ पेशेवर पत्रकार, संवाद लेखक और विज्ञापन निर्माता अर्ध बेरोजगार नवयुवकों को अपनी कुंठाओं को निकालने के साथ साथ धन कमाने की कला का प्रशिक्षण देते दिखते हैं। भौतिक हिंसा से मानसिक हिंसा अधिक खतरनाक होती है भले ही इसका असर तत्काल नहीं दिखता। जाने कब भारतीय लोकतंत्र को इन घिसे पिटे फॉर्मूलों से मुक्ति मिलेगी।

(डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र रूप से लेखन करते हैं और आजकल रायगढ़, छत्तीसगढ़ में रहते हैं।)










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