नागरिकता के न्यूनतम अधिकारों से महरूम दर-बदर जिंदगियों का सच

हमारा समाज , , बृहस्पतिवार , 11-10-2018


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धीरेश सैनी

गुजरात से मार-मार कर खदेड़े जा रहे बिहारियों और पुरबियों का कोई नहीं है। वह बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश भी नहीं, जहां से निकल कर भूख, बेगारी और अपमान की आग में झुलसते हुए ये लोग दुनिया भर में `मालिकों` के घरों, खेतों और कारखानों में खटने पहुंचते रहते हैं। उनके अपमान पर ख़ुश होने वाले अलग-अलग हिस्सों और बिरादरियों के लोग यह नहीं देख पा रहे हैं कि इन कमबख्त `बिहारियों` में उनके अपने लोगों की तादाद भी मिलती ही जाती है। उदारवादी कही जाने वाली नई आर्थिक नीतियों की बर्बरता ने जितना कहर बरपा किया है, उतना ही लोगों के दिल-दिमाग़ और आंखों को पत्थर कर दिया है।

देश की राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के निठारी गांव को याद कीजिए। 2006 में यहां मनिंदर सिंह पंधेर नाम के एक धनपशु की कोठी के पीछे नाले, कोठी परिसर और आसपास से बच्चों और महिलाओं के कंकाल व अवशेष बरामद हुए थे। बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे गायब हो रहे थे तो यह किसी के लिए कोई मसला नहीं था। होता कैसे, पीड़ित बंगाल, बिहार औऱ पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि इलाकों के प्रवासी मजदूर किसी के लिए `नागरिक` नहीं हुआ करते हैं। बड़ी संख्या में कंकाल बरामद हुए तो राजधानी में मीडिया पर हावी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के लिए भी यह उनका अपना दर्द नहीं था।

मीडिया का बड़ा खेल सही तथ्यों पर परदा डालकर मानवभक्षी, रक्तपिपासु जैसी सनसनी बेचने और पंधेर को बचाकर पूरा मामला उसके नौकर सुरेंद्र कोली पर केंद्रित करने तक सीमित था। इस खेल में सिस्टम के दूसरे ताकतवर भी शामिल थे। दिल्ली के एक अखबार के संपादकीय अधिकारी की बेशर्म हंसी को मैं कभी नहीं भूलता। पीड़ितों को मुआवजे की किसी खबर को लेकर वह कह रहा था कि इन लोगों की मौज़ आ गई है। उसका कहना था कि ये लोग हम मीडिया वालों को यूज कर पैसे बना लेने में माहिर होते हैं। मैं सिर्फ इतना कह सका था कि ऐसे भयावह अपराधों का शिकार हमारा अपना बच्चा होता है तो ही हम उस दर्द को समझ पाते हैं। 

बिहार के कुछ पत्रकार उस पंजाबी मूल के अधिकारी से इस कदर संतुष्ट थे कि उन्हें उसकी बात अपने ही दिल की बात लग रही थी। 1999 में `अमर उजाला` ने हरियाणा भेजा था तो मेरे लिए करनाल जाना सिर्फ पुल पार कर जमना के इस पार से उस पार चले जाना था। लेकिन, तब पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के अखबारों के नेटवर्क और काम करने के ढंग में ज़मीन-आसमान का अंतर था। बरसात के दिनों में खेत में कोठरे की छत गिरने से तीन लोगों की मौत की खबर मिली तो मैं इस बात पर हैरान था कि कोई साथी मौके का मुआयना कर लेने के लिए तैयार नहीं था। मैं अकेला ही उस खेत में पहुंचा तो पाया कि मिट्टी-गारे से चिनी गईं दीवारों पर बिजली के टूटे खंभे को शहतीर की तरह रखकर छाप दिया गया था।

बरसात में दीवारों का गारा घुलने लगा और बिजली का खंभा भीतर सोते मजदूरों पर जा गिरा था। यह बिहारी मजदूर परिवार था जो धान को रोपाई के लिए यहां रखा गया था। खेत का चौधरी बिजली निगम का अफसर था। इस तरह एक अपराध बिजली के सरकारी खंभे की चोरी का भी बनता था। पोस्टमॉर्टम हाउस पर एक पत्रकार ने कहा कि यार इतना बड़ा मामला नहीं है। मरने वाले यहां के नहीं हैं। प्रशासन की भी यही अप्रोच थी। मृतकों के परिजनों का कोई नहीं था। कौन नहीं जानता कि हरियाणा और पंजाब की समृद्धि की नींव की ईंटों में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इन सस्ते श्रमिकों का ही लहू सना है?

करनाल में जितने भी रिक्शा वाले मिलते, वे या तो समस्तीपुर के होते थे या फिर बेगुसराय के। उनसे बात कर मन भीग जाया करता था। एक बुजुर्ग थे जो कभी जवानी के दिनों में करनाल आए थे। अपनी माँ और बहन की बीमारी के इलाज पर आए खर्च की वजह से पिता पर हो गए 10 हजार रुपये का कर्ज उतारना उनका एकमात्र मकसद था। वे न कर्ज उतार पाए और न पिता की मौत के समय उनका मुंह देख सके। जैसा वे बताया करते थे कि गांव के देनदार दबंगों ने बदतमीजी की तो मां ने जहर खा लिया।

फिर उस गांव में रहने का मन नहीं किया। बहन को लेकर करनाल ही आ गए और अपने प्रदेश के एक रिक्शा चलाने वाले से ही उसकी शादी कर दी। करनाल में घंटाघर चौक पर जगदीश के ठेले पर रात-बिरात उनके साथ चाय पीते हुए ये बातें टुकड़ों-टुकड़ों में सुना करता था। एक सुबह देखा, दयाल सिंह कॉलेज के पास इन बुजुर्ग को दो लोग पीट रहे हैं। मैंने छुड़ाने की कोशिश की तो वे मुझे भी पीटने पर आमादा हो गए। राह चलते लोग उनके ही पक्ष में थे। हुआ यह था कि इस बुजुर्ग ने उन्हें रोडवेज बस स्टैंड से वहां तक लाने के लिए जान-बूझकर बड़ा रास्ता तय कर उन से ज्यादा पैसे मांग लिए थे। लोग इसी बात पर अड़े थे कि बिहारी यहां का खाते हैं और यहीं के लोगों को बनाने की कोशिश करते हैं। संयोग से वन विभाग के एक परिचित अफसर उधर से गुजर रहे थे तो उनके गार्ड्स की मदद लेकर बुजुर्ग को छुड़वा सका।

एक रात एक अंतरराज्यीय चोर गिरोह के पुलिस की पकड़ में आने की खबर भेजकर घर लौटा था। सुबह पास ही स्थित ऐतिहासिक जनरैली कोठी (जिसे अब प्रशासन की मिलीभगत से मिस्मार किया जा चुका है।) के बरामदे में रहने वाली एक गरीब बिहारी महिला को पास के एक कुरियर ऑफिस के कर्मचारी लेकर मेरे पास आए। पता चला कि उसके रिक्शा चलाने वाले पति को इस गिरोह का सदस्य बताकर पकड़ लिया गया था। गिरोह के बाकी सदस्य भी उड़ीसा, एमपी और पूर्वी उत्तर प्रदेश से यहां आए रिक्शा चालक ही थे। पेट के बल रेंग रहे बेबस लोगों को पकड़ो, जुतियाओ और अंतरराज्यीय गिरोह के नाम पर जेल में ठूंसकर गुड वर्क का तमगा हासिल कर लो। बात कितनी सच है पर कई दोस्तों ने बताया कि विकास नारायण राय करनाल के एसपी थे तो ऐसे निरीह लोगों को पुलिस कम सताती थी।

गुजरात से पलायन करते लोग।

पूरे देश की तरह करनाल की कोठियों में झाडू-पोंछे से लेकर कपड़े धोने जैसे काम करने के लिए हर सुबह इतनी सारी बच्चियां, सुंदर से जर्द होती जातीं युवा स्त्रियां और समय से पहल जर्जर हो चुकीं औरतें जाने कहां से आतीं और काम खत्म कर कहां गुम हो जाया करती थीं? एक दिन लक्ष्मी नहीं आई तो आसपास कोहराम मच गया। मैं उसकी तलाश में गया। पुरानी पुलिस लाइन से ठीक सामने दयाल सिंह कॉलेज के सामने वाली सड़क पर एक किनारे बहुत सारी झुग्गियां सी कोठरियां थीं। मैं पहली बार उनमें घुसा था। सिर-कमर नीचे किए लक्ष्मी की छोटी सी कोठरी तक पहुंचा तो पता चला कि वह बुखार में बेसुध पड़ी हुई थी। वह जरा आराम आते ही खांसते हुए काम पर लौट आई थी।

एक दिन जिला उपभोक्ता फोरम के एक माननीय मित्र अपने सीनियर के साथ मेरे पास आए। वे कोर्ट और अपनी पार्टी से जुड़ीं एक्सक्लुसिव दिया करते थे, विनम्र व्यवहार करते थे और हर रोज कचहरी में चाय-पकौड़ा हासिल हो जाने का भी बड़ा सहारा थे। उन्होंने अधिकार के साथ शिकायत की कि इतनी बढ़िया कॉलोनी में सड़क के किनारे पड़ी गंदगी साफ होनी चाहिए पर आप का रोल निगेटिव रहता है। मज़दूर इंसान परिवारों को गंदगी कहने को लेकर मेरी उनके साथ तीखी बहस हो गई। एक रात `शॉर्ट सर्किट` से लगी आग से उस कथित कर्ण की नगरी की `गंदगी` को साफ कर दिया गया। कोठियों में काम करने वाली बच्चियां और औरतें फिर भी आती रहीं। वे किसी अदृश्य खोह से आतीं और उनमें लौट जातीं।

करनाल में ही रहते हुए एक दोपहर अचानक ट्रांसपोर्ट से जुड़े एक दोस्त राहुल राणा का फोन आया। रोडवेज बस अड्डे के पास स्थित टैक्सी स्टैंड पर एक लड़की को कहीं ले जाने की कोशिश कर रहे कुछ लोगों को टैक्सी ड्राइवरों ने हिम्मत करके पकड़ लिया था और पुलिस लाइन को सौंप दिया था। लड़की नाबालिग थी और बंगाल के किसी जिले की थी। कई बार बेचे जाने के बाद अब किसी नए ठिकाने पर बेचे जाने के लिए ले जाई जा रही थी। पकड़े गए लोगों की सिफारिश में फोन आ चुके थे और डीएसपी दबाव में था। डीएसपी एक बड़े प्रतिष्ठित प्रोग्रेसवि घराने से ताल्लुक रखता था जिसका उसने हवाला दिया। वह और कई मित्र चाहते थे कि मामला मीडिया में न आए। आखिरकार डीएसपी ने कहा कि लड़की की उम्र पर मत जाओ। ये बिहारन-बंगालन खूब खेली-खाई होती हैं। उनसे तीखी बहस हुई तो उन्होंने कहा कि वे ऊपर से मजबूर हैं।

खबर ठोक कर लिखी दी गई थी पर यह नाकाफी था। जैसे कि करीब दो साल पहले रोहतक की महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर के घर से किसी तरह भाग निकली नाबालिग लड़की के मामले में हुआ। इस लड़की को प्रोफेसर की पत्नी ने प्रेस गर्म करके जगह-जगह दाग रखा था। बर्तन टूटने या कोई और गलती हो जाने पर उसके सिर के बाल जगह-जगह से नोंच दिए गए थे। यह भयानक मामला सुर्खियों में आता ही नहीं अगर इंडियन नेशनल लोकदल की स्टूडेंट विंग इनसो के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप देशवाल लड़की के पक्ष में अड़ न जाते। तीनों प्रमुख पार्टियों की लीडरशिप की प्रोफेसर से सहानुभूति थी पर देशवाल की ज़िद की वजह से जैसा-तैसा मुकदमा दर्ज करना पड़ा। प्रोफेसर इस बात पर अड़ा था कि ऐसा अकेले उसके घर में नहीं है, बहुत सारे प्रोफेसरों के घरों में होता है। कोई नागरिक समाज, कोई प्रोफेसर इस `परदेसी` लड़की के लिए खड़ा नहीं हुआ और पता चला कि लड़की को उसके किसी रिलेटिव के सुपुर्द कर दिया गया।

रोहतक में ही एक भयावह मामला सामने आया जब एक बच्ची किसी तरह क़ैद से निकलकर पुलिस के पास पहुंच गई। इस परदेसी बच्ची को खरीद कर लाया गया था और यौन शोषण का शिकार बनाया जा रहा था। इस केस को ईमानदारी से डील किया जाता तो रोहतक के आसपास के इलाके में इस तरह के बड़े नेटवर्क का खुलासा होता पर जहां स्थानीय लड़की के मामले में कोई खड़ा न होता हो, परदेसी लड़की के लिए किसे सहानुभूति होनी थी। कन्या भ्रूण हत्या में आगे रहने वाले इन इलाकों में वंश चलाने के लिए परदेसी औरतों को खरीद कर लाने के मामले और ऐसी बहुत सी औरतों को बाद में बेच दिए जाने क मामले तो सामने आते ही रहे हैं।

2003 में सहारा इंडिया टीवी जॉइन किया तो रात में 9, 10, 11, 12 किसी भी वक़्त नोएडा से रोहतक निकल पड़ना लगभग रुटीन था। महाराणा प्रताप इंटरस्टेट बस टर्मिनल (आईएसबीटी) पर मज़दूर परिवारों के जत्थे बैठे मिला करते थे। अपने माँ-बाप के साथ छोटे-छोटे बच्चे भी होते थे। कोई सिर्फ निक्कर में, कोई सिर्फ बनियान में। कोई नंगे पांव, कोई घिसी-सिली चप्पल में। कोई माँ की मैली-कुचैली गोदी में रो-रोकर कोहराम मचाते हुए। कोई दुल्हन लाल सस्ती साड़ी में अपने पति के साथ 'बिदेस' चली आई थी। जाने अपने देस में इस अकेली दुल्हन का कोई न हो?

परेशान हाल लोग।

और हो भी तो जाने वहां क्या माहौल हो? मान लेते हैं, 'सती सीता' अपने 'राम' के साथ ही 'वन गमन' पर अड़ गई हो और उसे दिल्ली पहुंचते-पहुंचते समझ में आ रहा हो कि यह नया संसार अपने देस-अपने ग्राम से कम निर्दयी नहीं है। कुछ ऐसे किशोर जो पहली बार अपने बाप के साथ किसी यात्रा पर निकले हैं और घूमने के लिए नहीं निकले हैं। बाप के साथ मजदूर जीवन शुरू करने के लिए निकले हैं। गजब यह कि रोडवेज बस का स्टाफ इन्हें नागरिक मानने के लिए तैयार नहीं है। टिकट विंडो पर उन्हें बार-बार दुत्कार दिया जा रहा है। अगली सीटों के टिकट बिक जाने के बाद उन्हें किसी अहसान की तरह पिछली सीटों पर बैठने की इजाजत दी जाती है। 

वे रेल में इसी तरह ठुंसे हुए आए होंगे। उन्हें भी थोड़े से आराम की जरूरत है। वे टिकट के पैसे दे रहे हैं तो उन्हें भी पिछली सीट पर उछलते हुए जाने के बजाय आगे की सीटों पर बैठकर ऊंघते हुए सफर करने का हक है। लेकिन, मैं देखता कि उन्हें यह हक नहीं है। इसी रूट की बस का एक वाकया मेरे लिए भूल पाना नामुमकिन है। बस पंजाबी बाग से निकल चुकी थी। मेरे बराबर की सीट पर एक मजदूर लड़का नींद में बार-बार मेरे ऊपर गिर रहा था। वह बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसी जिले से दिन-रात जैसे-तैसे सफर करता आया होगा। अचानक एक महिला ने उसे उसका सिर झिंझोड़ कर जगाया और उसे खड़ा होने के लिए कहा। फटी-फटी आँखों से देखते हुए उसे होश में आने में थोड़ा सा वक़्त लगा। फिर वह अपने झोले से टिकट निकाल कर उस महिला को दिखाने लगा। महिला ने अपने पति से ठेठ पंजाबी में कुछ बात की और फिर उस लड़के पर बरस पड़ीं कि वह `लेडीज` के लिए सीट नहीं

छोड़ रहा है। मैंने सीट छोड़ते हुए उस महिला को कहा कि एक तो यह लड़का लेडीज सीट पर नहीं बैठा हुआ है और दूसरे आप इतनी सारी सवारियों में से इसी सोते हुए लड़के को जगाकर क्यों उठाने के लिए चुनती हैं। कोई जवाब आता, इससे पहले ही हमारे से पिछली सीट पर बैठीं एक बुजुर्ग महिला ने खड़े होकर उस लड़के को दो-तीन चांटे जड़ दिए। बुजुर्ग महिला ने खांटी हरियाणवी में बिहारियों के लिए खरी-खोटी चिल्लाते हुए कहा कि सीट इसी लड़के को छोड़नी पड़ेगी। इस बुजुर्ग महिला के रौब और फरमान को उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि के चलते कोई चुनौती मुमकिन नहीं थी। मैंने कहा कि मैं सीट छोड़ चुका हूँ और यह लड़का भी आपके पोते की तरह है। आपको तो इस पर प्यार आना चाहिए। 

बुजुर्ग महिला ने कहा, ``अं रै, तू बी युप्पी का लाग्गे?`` मैंने झूठ बोला कि हरियाने का ही हूं और बोली में यथासंभव हरियाणवी टच लाने की कोशिश की। बुजुर्ग महिला ने कहा, ``ना रे, बोली तेरी युप्पी की सै।`` मैंने फिर झूठ बोला कि बचपन से शामली में अपने मामा के यहां रहकर पढ़ा हूँ। जातिगत आधार पर खासी ईर्ष्या रखने वाले अलग-अलग समुदायों की दोनों महिलाएं और आसपास के यात्री मजदूर लड़के की `धृष्टता` को लेकर एकमत थे।

दिल्ली में फ़िरोज़ शाह कोटला के किले की बगल में एक कोटला मोहल्ला है। देश के बंटवारे के वक़्त नेहरू आदि नेताओं ने पाकिस्तान से विस्थापित आकर आए परिवारों को यहां बसाया होगा। आसपास कई मेडिकल कॉलेज व अस्पताल होने की वजह से यहां जैसे-तैसे कमरे भी काफी महंगे किराये पर चढ़ते हैं। नवभारत टाइम्स का दफ्तर पैदल दूरी पर होने की वजह से मैं भी उन दिनों यहीं रहता था। पुराने शहरों के अलसाये से मुहल्ले जैसे इस कोटले की गली के दरवाजे से पहले कुछ दुकानें हैं। यहां कुछ रिक्शा वाले, कपड़ों पर प्रेस करने वाली आंटी, साइकल मिस्त्री और कुछ कुत्ते दिल्ली की बेदिली से इस कोटले की छवि की हिफाजत में तल्लीन रहते हैं। उस दिन हल्की बूंदा-बूंदी अचानक दौंगड़े (दौंगरे) में तब्दील हो गई। हर कोई किसी शेड, किसी छज्जे के नीचे दौड़ पड़ा। हम बहुत सारे लोग उस दरवाजे के नीचे खड़े थे जो कभी किले के ही अपनी बाहरी बस्ती के विस्तार का हिस्सा रहा होगा।

मेरी अमीर मकान मालकिन की युवा बेटी अचानक रिक्शा वाले पर जोर देने लगी कि वह उसे बाहर मेन रोड तक छोड़ दे। रिक्शा वाला आनाकानी करता रहा तो युवती आदेश का पालन कराने की मुद्रा में आ गई। रिक्शा वाले ने हार कर कहा कि 30 रुपये लगेंगे। 10 रुपये की जगह 30 रुपये की मांग पर सफाई देते हुए उसने कहा कि इतनी तेज बारिश हो रही है। आप तो छाता लगाकर बैठ जाएंगी। युवती के सब्र का जवाब दे चुका था। रिक्शा वाले को झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ने के बाद वह चिल्लाए जा रही थी, ``साले, हरामजादे बिहारी कुत्ते, हमारे टुकड़ों पर पड़े रहेंगे और हमें ही गुर्राएंगे।`` 

मैंने उस युवती को न चाहते हुए भी तल्ख़ी दिखाते हुए इस ट्रैजिडी का अहसास कराने की कोशिश की कि जिस तरह विस्थापित होकर दिल्ली आए आप लोगों को आज तक भी रिफ्युजी पुकारते रहना बेशर्मी है, उसी तरह अपने राज्य से परिस्थितियों की वजह से विस्थापित होकर यहां रिक्शा चला रहे इस मजदूर के साथ इस तरह की बकवास करना बेशर्मी है। मुश्किल वक़्त में एक जरूरी मदद ने आपके परिवार को फिर से इस तरह खड़ा किया कि आज इतने सारे किरायेदारों के मकान मालिक होने की हैसियत ही काफी है। अपनी मेहनत का खाने वाले इस रिक्शा वाले के लिए कोई सरकारी या सामाजिक मदद नहीं है। मैं थोड़ा ख़ुशक़िस्मत रहा कि मुझे गालियां अंग्रेजी में मिलीं। देख लिए जाने की चेतावनी भी। 

आसपास के बाकी लोगों को भी मेरी बात पसंद नहीं आई।  मैंने वह रूम छोड़ दिया जिसमें यूं भी छत टपकने से बहुत सारी किताबें और लगभग सभी पुराने फोटो बरबाद हो गए थे। बिहार के कुछ दोस्तों से इस वाकये का जिक्र किया तो बाबू लोगों को गुस्सा तो आया पर रिक्शा वाले पर। उनका कहना था कि साले बिहार को बदनाम कराते हैं। दिल्ली आ जाएंगे जैसे लाल किला इनकी ही प्रतीक्षा कर रहा हो। रिक्शा ही खींचनी है तो बिहार में ही नहीं खींच सकते? मैंने कहा कि समझिए, वहां गांवों में क्या हाल होगा। बेगार और गालियां खाता आदमी रिक्शा चलाने के लिए भी उस दुनिया से दूर निकल जाना चाहता होगा। हम अपने इलाके में भी दबंगों के सताये लोगों को इसी तरह निकलते नहीं देखते क्या?

एक साल अखबारों में ये खबरें बहुत ज्यादा थीं कि पानीपत आदि रेलवे स्टेशन से मजदूरों को धान आदि की कटाई के लिए जबरन खींचा जा रहा है। बहुत से उदार माने जाने वाले दोस्त इस हरकत को यह सवाल खड़ा कर उचित मान रहे थे कि फसल तैयार खड़ी हो तो जमींदार और क्या करे। देश के सभी हिस्सों में दूसरे राज्यों के मजदूरों के अज्ञात शव मिलने या उनकी मजदूरी मार लिए जाने और उन्हें चोरी जैसे आरोपों में अंदर करा देने जैसे मामले भी होते ही होंगे। सिंगल कॉलम में सिमट जाने वाले इन मामलों को कभी ईमानदरी से खंगाला जाए तो शायद सच कुछ और ही निकले। जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था कि मजदूर जहां से खटने-पिटने निकले हैं, वहां के समर्थ लोगों के दिलों में उनके लिए जगह नहीं है। उनके दिलों में इन अपने `देस` के लोगों के लिए नफरत ही बढ़ती जाती है। दूसरे राज्यों में यूपी-बिहार वालों की भी लॉबी तो बनती हैं पर वे बड़े लोगों की बातें हैं।

मज़दूरों के हितों से उनके स्वार्थ मेल नहीं खाते। शासक वर्ग इस बात को पहचानता है और उसे लगता है कि मज़लूमों पर हमले चुनाव का मुद्दा नहीं बन सकते हैं। नफ़रत पर ही पलने वाली सियासत तो अलग-अलग राज्यों में वहां के हिसाब से इस तरह के उन्माद भड़काती है। मुझे याद है कि करनाल में बरसों पहले मुंबई में उत्तर भारतीयों पर हमले की वारदातों पर केंद्रित बातचीत में एक नेता हमलावरों को सही ठहराने लगा था। वह बोला, हरियाणा में भी यही होना चाहिए। मैंने उसकी देश और समाज विरोधी इस अमानवीय बात पर हैरानी जताई तो उसने कहा कि भाई साहब, आप भी तो यहां दूसरे राज्य से आकर पत्रकारिता कर रहे हैं। मैंने उसे यही कहा कि भाई, इस तरह की उन्मादी बातों पर ही दुनिया चलती तो आप कहीं न होते।

एक बहुत समझदार दोस्त ने भी एक बार हंसते हुए कहा था कि भाई साहब, मुंबई में शिव सेना वाले यूपी-बिहार वालों के खिलाफ हैं, हरियाणा वालों के नहीं।  मैंने कहा, भाई, बाहर हर हिंदी वाला उत्तर भारतीय है जैसे तंग-नज़र उत्तर भारतीयों के लिए हर दक्षिण भारतीय `मद्रासी` और नार्थ ईस्ट के हर राज्य का बाशिंदा `चिंकी`। आज तो यह कहता कि जैसे हर मुसलमान `पाकिस्तानी`। मजदूर तो मुंबई से लेकर गुजरात और उत्तर से पूर्वोत्तर तक हमलों और पलायन के लिए अभिशप्त हैं लेकिन आग फैलती है तो उसकी आंच खुद को सुरक्षित समझने वालों तक पर भी पहुंचती ही है। यूं भी नई बर्बर राजनीति और क्रूर आर्थिक नीतियों के गठजोड़ ने खुद को आला समझने वालों को भी दर-बदर कर रखा है। अपने राज्यों की फैक्ट्रियों में उन पर दमन होता है और बाहर वे भी `बिहारियों` की भीड़ में भर्ती होते जा रहे हैं। गुजरात से खदेड़े जाने वालों में भी ऐसे लोग कम नहीं हैं पर अभी यह बात समझने की कोशिश नहीं की जा रही है।

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं। आप की पत्रकारिता का अच्छा खासा वक्त पश्चिमी यूपी, हरियाणा और दिल्ली में बीता है।)

 










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Amit Dharmsingh :: - 10-13-2018
धीरेश भाई भारत में विस्थापितों की समस्या को लेकर जो आपने तथ्य प्रस्तुत किये हैं व दिल दहला देने वाले हैं। ये बताते हैं कि लोकतंत्र के 70 वर्षों बाद भी सामाजिक न्याय और समानता की समस्या जस की तस है। बल्कि कहें कि यह समस्या और अधिक विकराल होती जा रही है। आपके लेख में कुछ घटनाएँ बहुत मार्मिक हैं जिन्हें पढ़कर कलेजा भरकर आता है। भारतीय राजनीति यह कौन से समाज के निर्माण के लिये प्रतिबद्ध है जिसमें दबा-कुचला वर्ग और अधिक दबाया और कुचला जा रहा है। ऊपर से सामान्य दिखने वाले समाज की सरंचना दिन पर दिन और अधिक जटिल व त्रासदीपूर्ण होती जा रही जिसमें जीवन जीना निरंतर दूभर होता जा रहा है। आपकी दृष्टि घटनाओं और दृश्यों का बड़ा गहन और तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करती है जिससे भारत में शोषित वर्ग की वास्तविक स्थिति उभरकर सामने आती है।

Umesh chandola :: - 10-11-2018
Death of any real Left political forces inside parliament made it possible that ". Grace of the Labour " is not established. 10 M P are still there in N C R .But they aren't able to do Even one day annual ritualistic strike honestly. Last Summer we saw thm coming out of a/c cars for 10 minutes. Back to car. Even that drama didn't last few hours. Nandigram , NGO Communist parties. Their cadres are least worried either.