"डॉक्टर दत्ता सामंत, एक तूफ़ान"

हमारे नायक , , रविवार , 08-10-2017


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मसऊद अख़्तर

(1932-1997)

आज मुलाकात करते हैं भारत के चर्चित ट्रेड यूनियन नेता व राजनेता दत्तात्रेय नारायण सामन्त उर्फ़ दत्ता सामंत से जिन्हें लोग सामान्यतया डॉक्टर साहब कहकर पुकारते थेवह चाहे एक डॉक्टर की भूमिका में रहे या ट्रेड यूनियन नेता की, या फिर विधायक और सांसद हर रूप, हर रोल में वे गरीब मज़दूरों के मददगार ही साबित हुए।

डॉ. दत्ता सामंत। (फाइल फोटो) साभार : गूगल

मध्यवर्गीय व्यापारी परिवार में जन्म

दत्ता सामंत का जन्म एक मध्यवर्गीय व्यापारी परिवार में महाराष्ट्र के कोंकण तट के सिंधुदुर्ग जिले के देवबाग गाँव में 22 नवम्बर 1932 को हुआउनके पिता चावल व नारियल के व्यापारी थे और चाहते थे कि दत्ता भी उनके साथ व्यवसाय में लगेंवह दयालु स्वभाव के व्यक्ति थे और सांप के काटे की तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी अन्य समस्याओं की घरेलू दवा लोगों को देते थेइससे प्रभावित होकर बालक दत्ता लोगों की सेवा करने के लिए डॉक्टर बनने के लिए प्रेरित हुए

दत्ता की प्रारम्भिक शिक्षा उनके गांव में ही हुई और माध्यमिक शिक्षा टोपीवाला हाईस्कूल मालवन में हुई। यहाँ ये मालवन केंद्र में देशी भाषा की अंतिम परीक्षा में प्रथम आएइसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे बम्बई (मुंबई) आ गएयहां उन्होंने जी.एस. मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस. की परीक्षा पास की

मज़दूर बस्ती में डिस्पेंसरी

इसके बाद घाटकोपर, बम्बई के पंतनगर इलाके में औद्योगिक मजदूरों की एक हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में डॉक्टर दत्ता सामंत ने अपनी डिस्पेंसरी आरम्भ कीयहाँ चूँकि उनके अधिकतर मरीज औद्योगिक कामगार थे, इसलिए वे उनको करीब से जानने और उनकी समस्याओं से परिचित होने लगे थेवह हाउसिंग बोर्ड टेनेन्ट एसोसिएशन और घाटकोपर में एरिया समितियों से जुड़ गए और उस क्षेत्र में सामाजिक व सहकारिता संगठनों की स्थापना कीइस प्रकार धीरे-धीरे वह अनेक मोर्चों पर सामाजिक कार्यों में शामिल हो रहे थे

मुफ़्त में भी इलाज

दत्ता सामंत एक डॉक्टर के रूप में उन पत्थर खदान मजदूरों के संपर्क में आये, जो मरीज के रूप में इलाज के लिए उनके पास आया करते थेउनकी कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए डॉक्टर सामंत अपनी फीस या दवाई की कीमत के भुगतान पर दबाव नहीं देते और अक्सर पैसे भी नहीं लेतेवह जंगलों से घिरी पहाड़ियों पर उनकी कॉलोनियों में भी जाया करते थेये मजदूर दत्ता सामंत की निःस्वार्थ सेवा के लिए उनका बहुत सम्मान करते थे

डॉ. दत्ता सामंत। (फाइल फोटो) साभार : गूगल

महाराष्ट्र खान कामगार यूनियन

दूसरी तरफ मजदूरों के कार्य तथा सेवा सम्बन्धी दयनीय दशा को देखकर डॉक्टर सामंत दुखी होतेये मजदूर 2 या 3 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी पर प्रतिदिन 12 घंटे से भी अधिक समय तक काम करते थेकाम में किसी लापरवाही के लिए ठेकेदार के आदमी उन्हें पीटते थेइसलिए डॉक्टर सामंत ने कॉमरेड एस.. डांगे, यशवंत चव्हाण और अन्य ट्रेड यूनियन नेताओं से अनुरोध किया कि वे खदान मजदूरों को संगठित करेंउनसे जब प्रत्युत्तर न मिला तो अंत में उन्होंने स्वयं ही उन्हें संगठित करने का निर्णय लियाइसके उपरान्त सन् 1965 में उन्होंने महाराष्ट्र खान कामगार यूनियन बनाई जिसके साथ ही उनका ट्रेड यूनियन आन्दोलन का जीवन प्रारम्भ हो गयाआगे चलकर ट्रेड यूनियन के क्षेत्र में पूर्णकालिक काम करने के लिए उन्हें अपनी मेडिकल प्रैक्टिस भी छोड़नी पड़ी

खदान मालिकों का हमला

खदान मालिकों को यह पसंद नहीं था कि उनके मजदूर यूनियन के रूप में संगठित होंअतः वे किसी न किसी तरीके से उन्हें तोड़ना चाहते थेइसलिए एक दिन जब डॉक्टर सामंत खदान क्षेत्र में अपने मरीजों को देखने जा रहे थे, उनपर हमला हुआ जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ाअस्पताल में कई दिन भर्ती रहने के दौरान उन्होंने स्थिति पर गम्भीरता से विचार किया और हार न मानने का फैसला कियाअतः अस्पताल से घर वापस आने के पश्चात उन्होंने और अधिक शक्ति और दृढ़ता के साथ काम करना आरम्भ कर दिय़ाउन्होंने पत्थर खदान मजदूरों के मोर्चे निकाले और हड़ताल का आह्वान कियाइसके परिणामस्वरूप ही यूनियन, खदान मजदूरों के लिए वेतन में पर्याप्त बढ़ोत्तरी और अन्य लाभ प्राप्त कर सकी।  

खदान मजदूरों का नेतृत्व करने में डॉक्टर सामंत के उग्रपंथी व्यक्तित्व ने अनेक अन्य लोगों को आकर्षित कियाशीघ्र ही प्रीमियर ऑटोमोबाइल, डोम्बीवली, ए पी आई, गोदरेज अदि जैसे अन्य उद्योगों के मजदूर उनके पास आये और उनसे अनुरोध किया कि वे उनकी यूनियन का अध्यक्ष पद स्वीकार कर लें

डॉ. सामंत की गिरफ्तारी

सितम्बर 1972 में जब गोदरेज कंपनी के मजदूर डॉक्टर सामंत के नेतृत्व में आन्दोलन कर रहे थे, पुलिस द्वारा उनपर गोलियां चलाई गयीं जिसके कारण उनके बीच लड़ाई-झगड़ा हुआयह लड़ाई इतनी हिंसक हो गई कि इसमें दो पुलिस अधिकारियों और दो मजदूरों की मृत्यु हो गईइसकी वजह से डॉक्टर सामंत को लगभग 100 मजदूरों और यूनियन के पदाधिकारियों के साथ हत्या तथा अन्य गंभीर आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गयामुकदमा चलने के बाद डॉक्टर सामंत बरी हो गए, परन्तु अनेक मजदूरों को 2 से 4 साल की कैद की सजा और उनमें से एक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गईइसका परिणाम यह हुआ कि डॉक्टर सामंत की छवि एक जुझारू नेता की बन गई और अधिक से अधिक संख्या में मजदूर उनके नेतृत्व तथा परामर्श के लिए उनके पास आने लगे

डॉ. दत्ता सामंत। (फाइल फोटो) साभार : गूगल

विधानसभा में प्रवेश

1967 में वह पहली बार विपक्षी दलों के समर्थन से निर्दल प्रत्याशी के बतौर विधानसभा चुनाव में भाग लिया और विधानसभा सदस्य बने। इसके बाद 1972 के चुनावों में, वह कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा के लिए चुने गए और एक विधायक के रूप में सेवा की। सामंत को 1975 में भारतीय आपातकाल के दौरान एक उग्रवादी यूनियन के रूप में प्रतिष्ठित होने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया,  हालांकि वे तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए थे। सामंत की लोकप्रियता 1977 में उनकी रिहाई के साथ और बढ़ गई।

शीघ्र ही महाराष्ट्र जनरल कामगार यूनियन और सिल्क मजदूर सभा जैसी अनेक ट्रेड यूनियनें डॉक्टर सामंत के नेतृत्व में पंजीकृत की गईंइसलिए उनका अधिकाँश समय भिन्न भिन्न स्थानों पर जाने, बैठकें करने, चर्चाएँ करने आदि में लग जाता थाजो मजदूर उनके पास आते थे, वे केवल बम्बई, ठाणे, कल्याण और आस-पास के इलाके के ही नहीं होते थे बल्कि पुणे, जलगांव, औरंगाबाद और यहाँ तक कि दक्षिण गुजरात के वापी जैसे स्थानों से भी आते थे

मज़दूरों की वेतन वृद्धि की लड़ाई

कुर्ला और वाडला स्थित प्रीमियर ऑटोमोबाइल के कर्मकार सन 1979 में डॉक्टर सामंत की यूनियन में शामिल हो गए। परिणाम यह हुआ कि 14 महीने तक तालाबंदी रही। आखिर में एक समझौता हुआ जिसके द्वारा मजदूरों को 7000 से 8000 रुपये प्रतिमास औसत वेतन मिला। इसके बाद कुछ अन्य इकाइयों में इसी प्रकार के समझौते हुए जिनके तहत मजदूरों को अभूतपूर्व वेतन बढ़ोत्तरी दी गई जिसकी कल्पना औद्योगिक क्षेत्र में पहले नहीं की गई थी।

ऐतिहासिक आंदोलन और हड़ताल

वर्ष 1982 में डॉक्टर सामंत की महाराष्ट्र गिरनी यूनियन के नेतृत्व में दो से तीन लाख टेक्सटाइल्स मजदूरों द्वारा ऐतिहासिक आंदोलन और हड़ताल की गई। हड़ताल में भागीदारी में जबरदस्त सफलता और वेतन बढ़ोत्तरी की मांग माने जाने तक हड़ताल जारी रखने के मजदूरों के दृढ़ निश्चय के कारण एक समय तो मिल मालिक डॉक्टर सामंत के साथ समझौता करने के कगार पर आ गए थे, परन्तु केन्द्र और राज्य सरकार के नेताओं की पहल पर उसे समझौते की मूर्त रूप नहीं लेने दिया गया। यह हड़ताल एक साल से भी अधिक समय तक चलती रही और पूरे विश्व में औद्योगिक मजदूरों की सबसे लम्बी हड़ताल के रूप में 'गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में दर्ज की गई।

लाल निशान पार्टी

डॉक्टर सामंत ने कामगार अघाड़ी के नाम से मजदूरों की यूनियन और अशोक मनोहर के साथ लाल निशान पार्टी बनायी जिसने उन्हें साम्यवाद और भारतीय साम्यवादी पार्टियों के नज़दीक लाया। उस पार्टी के एक प्रत्याशी के रूप में अधिकांशतः बम्बई के टेक्सटाइल और अन्य मजदूरों के समर्थन के कारण वह 1984 में 8वें लोकसभा में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के लिए उपजे सहानुभूति के दौर में जहां कांग्रेस ने एकतरफा जीत हासिल की, कांग्रेस के विरुद्ध लोकसभा के सदस्य चुने गए।

सक्रिय सांसद

संसद सदस्य के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान डॉक्टर सामंत संसद के सदन में बहुत सक्रिय रहे और वहाँ उन्होंने अनेक मुद्दे उठाये। उनमें से प्रमुख मुद्दे थे: सरकार की श्रम नीति, विशेषरूप से टेक्सटाइल उद्योग के संबंध में, बोनस अधिनियम में संशोधन, उद्योगों में बढ़ती बीमार इकाइयों की संख्या, जिसके कारण नौकरियों में कमी आ रही थी, बंबई के नागरिकों की समस्याएं, मुस्लिम व्यक्तिगत क़ानून और विभिन्न प्रकार के अनेक मुद्दे. उन्होंने सदन में चालीस से भी अधिक भाषण दिए और एक दिन में तीन भाषण देने का रिकॉर्ड कायम किया।

डॉक्टर सामंत की यूनियन ने 300 मजदूरों की एक सहकारी सोसायटी के जरिये, एच.ई.एस. लिमिटेड, जो घड़ी बनाने वाली एक कंपनी थी और पिछले चार साल से बीमार हो जाने के कारण बंद थी, का प्रबन्धन भी अपने हाथ में ले लिया। डॉक्टर सामंत उस सोसायटी के अध्यक्ष थे और दो मजदूर उस सोसायटी के निदेशक। यूनियन ने उस कंपनी को चलाने के लिए 25 लाख रूपये की प्रारम्भिक पूंजी का भुगतान किया।

लगातार संघर्ष

डॉक्टर सामंत ने नई आर्थिक नीति के खिलाफ, खासतौर पर इकाइयों के बंद होने, छंटनी, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजनाओं और विस्तृत रूप से फ़ैल रही ठेका प्रणाली के खिलाफ एक मिशन आरम्भ किया। वह 90 के दशक में उद्योगपतियों द्वारा अधिभूमि की बिक्री किये जाने की अनुमति देने और उद्योगों तथा श्रमिक वर्ग को बंबई से बाहर धकेलने की राज्य सरकार की नीति के खिलाफ बड़े प्रदर्शनों के साथ लगातार संघर्ष कर रहे थे।

21 नवम्बर 1992 को डॉक्टर सामंत द्वारा 60 वर्ष पूरे कर लेने पर उनकी यूनियनों के हज़ारों मजदूरों ने एक भव्य समारोह आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता भूतपूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा की गई। उस अवसर पर उनके जीवन पर "डॉक्टर दत्ता सामंत, एक तूफ़ान" शीर्षक से मराठी में एक पुस्तक का विमोचन भी किया गया।

डॉक्टर सामंत चार लाख से भी अधिक सदस्यता वाली लगभग 500 ट्रेड यूनियनों के उपाध्यक्ष रहे हैं। साठ साल से अधिक आयु में भी इतना व्यस्त रहने के बावजूद वह इतने उत्साहपूर्ण दृढ़ निश्चयी और चुस्त थे जितने वह उस समय थे जब पच्चीस साल पहले उन्होंने अपना ट्रेड यूनियन कैरियर शुरू किया था।

1997 में हत्या

16 जनवरी 1997 को 11:10 अपरान्ह में चार बंदूकधारियों द्वारा मुंबई में घर के बाहर ही डॉक्टर सामंत की हत्या कर दी गई।  माना जाता है कि हत्यारे भाड़े के थे जो इनकी हत्या के बाद मोटरसाइकिल से भाग गए। दरअसल सामंत मुंबई के पवई उपनगर में अपने घर से टाटा सूमो में चले थे, लगभग 50 मीटर की दूरी पर ही एक साइकिल चालक ने बाधा पहुंचाई, जिससे उनकी गाड़ी की गति धीमी हो गई। गाड़ी के धीमे होने के बाद हत्यारे अंधाधुंध गोलियां दागकर फरार हो गए। उन्हें कंजुरमार्ग के अनिकेत अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनके सिर, सीने और पेट से 17 गोलियां निकाली गयीं। और इस तरह एक जुझारू नेता हमेशा के लिए सो गया।










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