गुरुदास दासगुप्ता : संघर्ष की जीवित मिसाल

हमारे नायक , श्रमिक नेता श्रृंखला, रविवार , 06-08-2017


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मसऊद अख़्तर

(1936)

हमारे देश के वर्तमान श्रमिक नेताओं में एक महत्वपूर्ण नाम श्रम मामलों के प्रति अति संवेदनशील तथा अपनी स्पष्टवादिता और आक्रामक तेवरों के लिए देशभर में मशहूर गुरुदास दासगुप्ता का है। एक लम्बे अरसे से देश के संगठित व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्याओं के निराकरण के लिए सतत संघर्षरत गुरुदास जी पूर्ण प्रतिबद्धता और समर्पण के साथ विभिन्न मंचों से देश के बहुसंख्य मजदूरों के शोषण व अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं। वह वर्ष 2001 से देश की सबसे पुरानी ट्रेड यूनियन अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के महासचिव के पद का दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।

गुरुदास दासगुप्ता का जन्म 3 नवम्बर, 1936 को बारीसाल, वर्तमान बांग्लादेश में दुर्गा प्रसन्न दासगुप्ता व निहार देवी के पुत्र के रूप में हुआ। अपनी आरम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात, आपने उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने के लिए आशुतोष महाविद्यालय कलकत्ता में प्रवेश लिया। इसके बाद यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स एंड कॉमर्स, कलकत्ता से एम.कॉम. की उपाधि प्राप्त की। युवास्था से ही सामाजिक सोच और सामाजिक सरोकार रखने वाले गुरुदास जी अपने छात्र जीवन से ही यूनियन सम्बन्धी गतिविधियों से जुड़ गए थे। 1957 के दौरान वह आशुतोष महाविद्यालय छात्र यूनियन के महासचिव तथा 1958-60 के दौरान ‘अविभाजित बंगाल प्रांत छात्र फेडरेशन’ के महासचिव व अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्वकारी गुणों से प्रभावित होकर 1970 में उन्हें बुडापेस्ट में आयोजित हुए विश्व युवा सम्मलेन में भारतीय दल का नेतृत्व करने के लिए भेजा गया, और उन्होंने इस जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभाया।

गुरुदास दासगुप्ता। साभार : गूगल

खेत मज़दूर नेता से संसद तक का सफ़र

सामाजिक सरोकारों के प्रति अटूट निष्ठा व प्रतिबद्धता रखने वाले गुरुदास जी सन 2001 में एटक के महासचिव बनाए जाने से पूर्व एक लम्बे अरसे तक पश्चिम बंगाल खेत मजदूर यूनियन के अध्यक्ष, ‘भारतीय खेत मजदूर यूनियन’ के उपाध्यक्ष तथा एटक के भी उपाध्यक्ष रहे। 2004 में सीपीआई से पश्चिम बंगाल के पंसकुड़ा संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सदस्य चुने गए। लोकसभा सदस्य चुने जाने के पूर्व वो तीन बार राज्य सभा सदस्य भी रह चुके थे। 2004 में लोकसभा में पहुँचने के बाद अपने पहले ही भाषण में गुरुदास जी ने इस बात पर बल दिया कि समाजवादी आन्दोलन एक जीवंत प्रक्रिया है और इसको पूंजीवादी प्रयासों से रोका नहीं जा सकता। इसी तरह आपने तमिलनाडु में राज्य कर्मियों की हड़ताल का क्रूर दमन और उच्चतम न्यायालय के विवादास्पद फैसले पर छिड़ी बहस में भाग लेते हुए कहा कि मजदूरों की एकता को कोई भी निर्णय छिन्न-भिन्न नहीं कर सकता। न्यायालय द्वारा हड़ताल करने के अधिकार पर की गई टिप्पणी पर भी आपने तीव्र प्रतिक्रया व्यक्त की।

गुरुदास दासगुप्ता। साभार : गूगल

1992-93 के दौरान गुरुदास जी कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय काउंसिल, प्रतिभूति घोटाले की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति, वित्त समिति, राज्यसभा की सरकारी आश्वासनों पर गठित संसदीय समिति, सार्वजनिक क्षेत्र की बीमार इकाइयों के पुनरुद्धार के लिए गठित समिति आदि के सदस्य रहे और इस रूप में आपने सरकार को दिए अपने सुझावों के माध्यम से देश व समाज के हित में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

श्रम के क्षेत्र में गुरुदास जी की प्रतिबद्धता को देखते हुए आपको राष्ट्रीय ग्रामीण श्रम आयोग और श्रम मंत्रालय की सलाहकार समिति का सदस्य बनाया गया तथा इस नाते आपने देश के श्रमिकों के हित में अनेक महत्वपूर्ण सुझाव सरकार को दिए।

ट्रेड यूनियन और राजनीति में कई देशों में प्रतिनिधित्व

वर्ष 1993 में ही गुरुदास जी को ‘भविष्य निधि फण्ड और कर्मचारी राज्य बीमा निगम के डिफाल्ट’ के अध्ययन के लिए श्रम मंत्रालय द्वारा गठित सलाहकार समिति की उप समिति के अध्यक्ष बनाए गए। इन्हीं दिनों आप निजी स्कूलों में अध्यापकों की कार्य दशाओं का ध्यान और सुधार करने के लिए गठित उप समिति के अध्यक्ष भी रहे। आपने खदान मजदूरों की संरक्षा के लिए गठित सलाहकार समिति की उपसमिति के अध्यक्ष के रूप में मजदूरों की दशा सुधारने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिया। इसके अतिरिक्त आपने वित्तीय मामलों के लिए गठित समिति और सार्वजनिक उपक्रम समिति के सदस्य के रूप में अपनी बहुमूल्य सेवाएं प्रदान कीं। आप ट्रेड यूनियन व राजनीति में फ़िनलैंड, फ़्रांस, हंगरी,इटली, इंग्लैंड तथा रूस आदि अनेक देशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

उदारीकरण की आंधी से आगाह किया

पिछले काफी समय से आप अपनी पूरी शक्ति के साथ देश में आई उदारीकरण की आंधी से देश को होने वाले नुकसान और मजदूरों पर पड़ने वाले इसके बुरे प्रभावों के सम्बन्ध में जानकारी देने और संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लामबंद करने में जुटे हैं ताकि पिछले अनेक दशकों में मजदूरों ने अपना खून बहाकर जो मौलिक श्रम अधिकार हासिल किये हैं, उनकी रक्षा की जा सके जो इस समय खतरे में नज़र आ रही।

वर्ष 1985 में राज्य सभा के लिए चुनकर आने के बाद से ही जिन मुद्दों को आपने उठाया है उनमें अनियंत्रित मूल्य वृद्धि पर रोक, कामगार हितों की रक्षा, वास्तविक मजदूरी और रोजगार में वृद्धि की मांग, अमीरी और गरीबी के बीच तेज़ी से बढ़ते अंतराल को कम करना, समावेशी आर्थिक विकास, कृषि, संरचना विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, विद्युत संयत्र आदि जैसे सामाजिक क्षेत्र व असंगठित श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बजट आवंटन में वृद्धि, कर आधार का विस्तार, सामाजिक सुरक्षा में वृद्धि, श्रम कानूनों के उल्लंघन पर रोक, मौलिक श्रम अधिकारों के प्रतिबन्ध पर रोक, श्रम कानूनों में सुधार और उनके प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए त्रिपक्षीय वार्ताओं की मांग, भविष्य निधि पर लगातार घटती ब्याज दर पर रोक तथा मजदूरों के तेज़ी से बढ़ते ठेकाकरण और उनके हितों की रक्षा, शिक्षा के व्यापारीकरण पर रोक और भारी कैपिटेशन फीस को हटाने की मांग आदि प्रमुखता से शामिल हैं। इन सभी मुद्दों को आप पूरी बुलंदी के साथ संसद और संसद के बाहर उठाकर सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट करते रहे। ये अलग बात कि सरकार इनको स्वीकारने और उसपर क्रियान्वयन से आँख चुराती रही।

गुरुदास दासगुप्ता। साभार : गूगल

असंगठित मज़दूरों के लिए भी संघर्ष

खेतिहर और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए श्रम कानून और सामाजिक सुरक्षा क़ानून की मांग भी गुरुदास जी लम्बे समय से उठाते रहे हैं। आर्थिक सुधारों के नाम पर श्रम कानूनों में बदलाव लाने के बारे में उनकी यह स्पष्ट राय है कि यह बदलाव श्रमिकों की बेहतरी के लिए होना चाहिए न कि नियोजकों को ‘हायर एंड फायर’ का अधिकार देने के लिए। उन्होंने औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) नियमों में प्रशासकीय आदेश द्वारा कामगारों की एक नई श्रेणी ‘नियत अवधी के लिए रोजगार’ (फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट) सृजित किये जाने का भी विरोध किया था। भूमंडलीकरण के बारे में गुरुदास जी की राय यह है कि यदि भूमंडलीकरण वास्तविकता है तो श्रम का गहन शोषण भी वास्तविकता है। और ऐसे में उनका मानना है कि आज श्रम कानूनों को पहले से अधिक कारगर ढंग से लागू करने की जरूरत है। नई आर्थिक नीति और इस सम्बन्ध में ट्रेड यूनियनों द्वारा अपनाई जाने वाली रणनीतियों के विषय में एक अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि ‘नई आर्थिक नीतियों के विरुद्ध ट्रेड यूनियनों का संघर्ष केवल श्रमिक वर्ग के अधिकारों की लड़ाई नहीं बल्कि विकास, राष्ट्रीय प्रगति, रोजगार और गरीबी उन्मूलन की लड़ाई है। ट्रेड यूनियनें प्रगतिशील संघर्ष का अगुआ दस्ता होते हुए केवल श्रमिक वर्ग को ही नहीं बल्कि विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा निर्दिष्ट नीतियों को परास्त करने के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र को श्रमिक वर्ग का साथ देने के लिए प्रेरित करें और देश में इन शक्तियों के आपसी संबंधों में बदलाव लायें....।’

अंग्रेजी और बांग्ला में लेखन

गुरुदास जी प्रखर वक्ता होने के साथ समय-समय पर अपनी लेखनी के माध्यम से भी अपने विचारों को व्यक्त करते रहे हैं। उनके अनेक लेख समय-समय पर मुख्यतः अंग्रेजी और बांग्ला भाषा में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। ‘सिक्योरिटीज़ स्कैंडल एंड ए रिपोर्ट टू द नेशन’ तथा ‘फेल्योर टू कम्बैट हैंगर एंड जॉबलेसनेस : कॉल फॉर अल्टरनेटिव पॉलिसीस’ गुरुदास जी के दो महत्वपूर्ण प्रकाशन हैं।

उद्योगों में से छंटनी, निष्कासन, निलंबन आदि मजदूरों की रोजी रोटी से जुड़ी सामाजिक अनदेखी के प्रति सतत जागरूक रहने वाले गुरुदास दासगुप्ता ने विदेशी कंपनियों द्वारा देशी मजदूरों के प्रति अपनाए जाने वाले अमानवीय रवैये के प्रति अपना विरोध दर्ज कराते हुए गुडगाँव के मजदूरों के पक्ष में और उनके साथ प्रदर्शन में भाग लिया। 

मानवीय पक्ष की चेतना से जुड़े और क्रिकेट तथा रविन्द्र संगीत में अभिरुचि रखने वाले गुरुदास जी अपने खाली समय में नाटकों में दिलचस्पी लेते हुए देखे जा सकते हैं। 










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