आजीवन कर्मचारियों के लिए संघर्ष करते रहे योगेश्वर गोप

हमारे नायक , श्रमिक नेता श्रृंखला, रविवार , 13-08-2017


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(1925-2007)

बिहार के राज्य सरकारी कर्मचारी आन्दोलन की संगठित शुरुआत साठ के दशक से हुई। वर्ष 1958 में राज्य सचिवालय से लेकर क्षेत्रीय स्तर के 10 सेवा संगठनों को मिलाकर ‘बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ’ का गठन किया गया। 60 के दशक से शुरू हुए और 10 दिसम्बर 2004 से लेकर 20 जनवरी 2005 तक चली 42 दिवसीय अनिश्चित कालीन हड़ताल जिसने राज्य सचिवालय से लेकर प्रखंड कार्यालयों तक का सारा कामकाज बिलकुल ठप्प कर दिया था, आदि तमाम कर्मचारी-शिक्षक आन्दोलनों के प्रणेता और अत्यंत लोकप्रिय नेता कॉमरेड योगेश्वर गोप बिहार के राज्य सरकारी अर्द्ध सरकारी कर्मचारी शिक्षकगणों के आंदोलनों के पर्याय व उपाख्यान के रूप में स्थापित हैं।

प्रख्यात कम्युनिस्ट और देश के मजदूर आन्दोलन के महान नेता कॉमरेड बी.टी. रणदिवे ने अपने एक लेख में कॉमरेड गोप को देश के हिंदी भाषा-भाषी सारे उत्तर भारत के ‘सर्वोच्च व्यक्तित्व’ के रूप में रेखांकित किया है।

प्रारंभिक जीवन

योगेश्वर गोप जी का जन्म 1 जनवरी 1925 को ग्राम – कंकौल, पोस्ट – सुहदन नगर, जिला बेगूसराय (बिहार) में एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता ईश्वर गोप और माता शैव्या देवी गांव में ही मेहनत मजदूरी करके इनकी पढ़ाई लिखाई एवं परिवार का भरण पोषण किया करते थे। सरकारी सेवा में आने के बाद सेवानिवृत्ति तक गोप जी पटना के गर्दनीबाग स्थित सरकारी कर्मचारी कालोनी में सरकारी क्वार्टर में सपरिवार निवास करते रहे। इसके बाद वे अपनी मृत्यु तक अपनी पत्नी देवकी देवी और तीन पुत्रों व पोते-पोतियों के साथ न्यू पुरन्दरपुर (जक्कनपुर थाना के पास) पटना में अपने खुद के मकान में स्थायी रूप से निवास कर रहे थे।

शिक्षा और कैरियर

गोप जी ने प्राथमिक शिक्षा मिडिल स्कूल विशुनपुर (बेगूसराय जिला) में और मैट्रिक तक की शिक्षा बी.पी.एच.ई. स्कूल बेगूसराय से प्राप्त की। आई. एस-सी. की शिक्षा उन्होंने बिहार के प्रतिष्ठित पटना विश्वविद्यालय के साइंस कॉलेज पटना से और अर्थशास्त्र, हिंदी साहित्य आदि कला विषयों में स्नातक की शिक्षा पटना कॉलेज, पटना में प्राप्त की। 3 मई 1951 को पटना स्थित राज्य सचिवालय के विधि विभाग में निम्न वर्गीय सहायक से अपने कैरियर की शुरुआत की। नियमानुसार विभागीय परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद पहले उनकी प्रोन्नति उच्च वर्गीय सहायक के पद पर हुई। बाद में प्रोन्नति पाकर वह प्रशाखा पदाधिकारी, निबंधक और फिर सरकार के अवर सचिव के पद पर कार्यरत रहते हुए ही वह 1 फरवरी 1983 को सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सरकारी सेवा का कार्यकाल राज्य सचिवालय के विधि विभाग में ही व्यतीत किया।

कर्मचारी नेता योगेश्वर गोप (फाइल फोटो)।

आंदोलन से जुड़ाव

योगेश्वर गोप एक प्रतिभाशाली छात्र थे। कक्षा 8 में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर उन्होंने सरकारी छात्रवृत्ति प्राप्त की परन्तु 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में शामिल हुए तो उनकी पढाई छूट गयी। गांधी जी द्वारा उक्त आन्दोलन के दौरान हुई हिंसा की निंदा किये जाने से गांधीवादी राजनीति से उनका मोह भंग होने लगा। बिहार में स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा किसान आन्दोलन चलाया जा रहा था। इसी दौरान छात्र योगेश्वर गोप का सम्पर्क भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के कॉमरेड ब्रह्मदेव शर्मा से हुआ और 1944 में वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए और सीपीआई के नेतृत्व में छात्र आन्दोलन में सक्रिय हो गए। वर्ष 1946 में पहली बार कॉमरेड ब्रह्मदेव शर्मा जब बेगूसराय विधान सभा से चुनाव लड़े तो उनके चुनाव प्रचार में गोप जी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

कर्मचारी नेता के तौर पर उभार

स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी शुरू कर दी। वर्ष 1957-58 में वह राज्य सचिवालय में ‘मिनिस्ट्रियल ऑफिसर्स एसोसिएशन’ पटना सेक्रेटरियट के महासचिव चुने गए। यहीं से वे कर्मचारी नेता के रूप में उभरे। 1958 में ही कई कर्मचारी संगठनों ने मिलकर एक फेडरेशन बनाया और महंगाई भत्ते को लेकर कॉमरेड गोप की अगुआई में पटना में पहली हड़ताल हुई। सफल समझौते के बाद 5 रुपया भत्ता मिला। इस आन्दोलन की सफलता से संगठन उत्तरोत्तर मज़बूत हुआ।

1966 में फेडरेशन (बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ) का छपरा में चुनाव हुआ और कॉमरेड गोप महासचिव चुने गए।1968 में महंगाई भत्ता, वेतनमान आदि मुद्दों को लेकर फेडरेशन के नेतृत्व में 15 दिन तक राज्य कर्मचारियों की हड़ताल चली। बिहार में राष्ट्रपति शासन था इसलिए बिहार के तत्कालीन राज्यपाल (नित्यानंद कानूनगो) के साथ गोप जी के नेतृत्व में कर्मचारी नेताओं से सीधे राज्यपाल की वार्ता हुई। कर्मचारियों की कुछ मांगें मान ली गईं और सम्मानजनक समझौते के साथ हड़ताल समाप्त हुई। 1969 में महासंघ के राज्य सम्मलेन (मुंगेर) में महासंघ का पहला विभाजन हुआ। गोप जी के बदले गोपाल त्रिपाठी नीत महासंघ को सरकार ने मान्यता देकर गोप गुट महासंघ को दबोचना चाहा जिसपर सड़क से लेकर उच्च न्यायालय तक तथा बाद में उच्चतम न्यायालय तक संघर्ष चला और गोप जी को जीत हासिल हुई।

37 दिन लंबी हड़ताल

वर्ष 1972 आते-आते बिहार सरकार ने सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु 58 वर्ष से घटाकर 55 वर्ष कर दी। इसको लेकर कर्मचारियों में भारी असंतोष व्याप्त हो गया। तीसरा संशोधित वेतनमान भी आ गया था परन्तु सरकार लागू नहीं कर रही थी। कर्मचारियों को अंतिम राहत देने का भी मसला जोर पकड़ रहा था। फेडरेशन की तरफ से गोप जी के नेतृत्व में सरकार को नोटिस दिया गया परन्तु जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो 8 दिसम्बर, 1972 को हड़ताल का ऐलान करना पड़ा। सरकार और सरकारी कर्मचारियों के मध्य जंग के हालात खड़े हो गए। 37 दिन की लम्बी हड़ताल में सरकार ने आदोलन को तोड़ने का हरसंभव प्रयास किया किन्तु कॉमरेड गोप के नेतृत्व में एक-एक कर्मचारी ने संगठन की चट्टानी एकता बनाए रखी। 12 जनवरी 1973 को समझौता हुआ। उक्त तीनों मांगें सरकार को माननी पड़ीं।

गोप जी ने एक सर्वमान्य नेता के रूप में ख्याति प्राप्त की तथा तमाम अन्य संगठनों के जुड़ने की प्रक्रिया तेज़ी से बढ़ने लगी। तमाम राजनीतिक विरोधी भी गोप जी की अद्भुत संगठन क्षमता का लोहा मानते थे। सरल स्वभाव, अहंकारहीन तथा एक जनसेवक की तरह जीवन बिताने वाले गोप जी को हर कोई बेहद प्यार व सम्मान करता। ‘बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ’ में 1958 में मात्र 10 कर्मचारी संगठन शामिल थे, जबकि गोप जी के अंतिम दिनों तक इसमें 50 से अधिक संगठन मजबूती के साथ एकताबद्ध थे।

1974 में फिर 9 दिन की हड़ताल चली परन्तु सीपीआई के जो साथी हड़ताल में शामिल थे उन्होंने बाद में विरोध किया और केवल इस समझौते पर कि किसी भी हड़ताली को दण्डित नहीं किया जाएगा, हड़ताल वापस ले ली गयी। कॉमरेड रामबली प्रसाद जो महासंघ के महासचिव रहे, बताया कि 1972-73 व 74 की हड़तालें एक और मायने में बहुत महत्वपूर्ण थीं कि 1969 में सरकार के इशारे पर कुछ कांग्रेसी लोगों ने एक अलग संगठन बना लिया और बिहार सरकार ने उनको ही कर्मचारियों का अधिकृत संगठन मान लिया। वार्ता का अधिकार भी उनको ही दिया, परन्तु कर्मचारियों के सशक्त आन्दोलन व बलिदानी तेवर के आगे सरकार को योगेश्वर गोप नीत फेडरेशन से ही समझौता वार्ता करनी पड़ी। 1972-73 की 37 दिनों की हड़ताल इस मायने में महासंघ के आन्दोलन में मील का पत्थर है।

1981 में बड़ी हड़ताल

वर्ष 1981 का समय था। चौथी वेतन संशोधन समिति कि सिफारिशें आ चुकी थीं। इसमें कर्मचारियों की 23 श्रेणियां बनायी गईं थीं, परन्तु राज्य सरकार के मंत्रिमंडल ने तोड़फोड़ करके कर्मचारियों की 63 श्रेणियां बना दीं। इससे कर्मचारियों को विभिन्न प्रकार से हानि हो रही थी। गोप जी के नेतृत्व में फेडरेशन फिर सक्रिय हुआ और दिसम्बर 1981 में फिर एक बड़ी हड़ताल का आह्वान किया गया। इस बार फेडरेशन के नेतृत्व में बिहार राज्य के प्राइमरी व सेकेंडरी अध्यापक भी शामिल हुए। इससे फेडरेशन का संख्या बल, जन बल और सामाजिक आधार का और अधिक विस्तार हुआ। राज्य कर्मचारियों और शिक्षकों की एक संयुक्त समन्वय समिति बनी जिसके नेतृत्व में 10 दिन तक एकताबद्ध हड़ताल चली तत्पश्चात एक समझौता हुआ और चौथी वेतन संशोधन समिति की संस्तुति ही लागू हुई।

इस सफलता के बाद तो कॉमरेड गोप के नेतृत्व में संयुक्त आन्दोलन की शुरुआत ही हो गई। वर्ष 1984 आते-आते गवर्नमेंट इम्पलाइज फेडरेशन भी समन्वय समिति में शामिल हो गए। यह संगठन बिहार के कर्मचारियों व अध्यापकों (सरकारी, अर्ध सरकारी) को मिलाकर सबसे बड़ा संगठन बन गया जिसकी कुल संख्या लगभग आठ लाख है।

लगातार संघर्ष

1984 से 1999 तक बिहार राज्य के कर्मचारियों की सभी बड़ी हड़तालें उक्त समन्वय समिति के तथा कॉमरेड गोप के ही नेतृत्व में संचालित हुईं। सन् 1988-89 का एक ऐसा दौर है जब भाकपा माले से सम्बंधित साथियों ने ‘बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी संघ’ से अलग हटकर नए संगठन का निर्माण किया तो कॉमरेड गोप के नेतृत्व में हज़ारों कार्यकर्ताओं ने ‘आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ़ ट्रेड यूनियन’ (ऐक्टू) जो कि भाकपा माले-लिबरेशन का मजदूर फेडरेशन है, से अपनी सम्बद्धता बना ली।

वर्ष 2003 में तमिलनाडु के राज्य कर्मचारियों की हड़ताल के खिलाफ तमिलनाडु उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय दोनों ने निर्णय दिया। इससे तमाम कर्मचारी संगठन सकते में आ गए परन्तु कर्मचारियों की तमाम समस्याएं हल करने का कोई रास्ता न्यायालय नहीं बता सका, अतः हड़ताल करना उनकी मजबूरी बना रहा।

केंद्र व राज्य कर्मचारियों को समान काम के लिए समान वेतन, सेवानिवृत्ति की उम्र 60 वर्ष करना आदि ऐसे मसले थे जो बिहार के कर्मचारियों को हल करना अनिवार्य था। दिसंबर, 2004 में कॉमरेड गोप की अध्यक्षता में फेडरेशन ने फिर कर्मचारी हितों को पूरा करने के लिए हड़ताल का आह्वान किया। हड़ताल 10 दिसम्बर 2004 से 21 जनवरी 2005 तक यानी 43 दिनों तक चली। हड़ताल में कई बार बिखराव के हालात भी आए परन्तु फेडरेशन के कुशल नेतृत्व ने इसे संभाल लिया और हड़ताल सफल रही। गोप जी के नेतृत्व में एक सफल समझौता हुआ, सरकारी कर्मचारियों को कुल 1100 करोड़ रुपये का लाभ मिला तथा सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष तय हुई।

1 रुपया संघर्ष फंड से बड़ा काम

कॉमरेड गोप एक बार 1964-65 की याद करते हुए बताये थे कि जब उस समय के संघर्ष में सफलता मिली थी तो फेडरेशन ने प्रत्येक व्यक्ति से 1 रुपया संघर्ष फण्ड की मांग की थी और उस समय 65 हज़ार रुपये जमा हुए थे। इस राशि से हड़ताल के दौरान निलंबित व बर्खास्त किये गए कर्मचारी नेताओं को पूरा वेतन उनकी बहाली तक दिया गया। उसी समय 9000/- रु. में महासंघ का कार्यालय बनाने की ज़मीन ली गई और जो राशि बची उसे बैंक में फिक्स कर दिया गया जो बाद में संगठन के काम आया।

एक्टू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे

गोप जी 1989 में एक्टू के मद्रास सम्मलेन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चुने गए। 1992 से 2005 तक एक्टू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। गोप जी बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के 1966 में महासचिव चुने गए और 1978 तक उस पद का दायित्व संभालते रहे। 1978 से लेकर अपने निधन तक वह महासंघ के सम्मानित अध्यक्ष रहे। गोप जी भारतीय सिगरेट कम्पनी वर्कर्स यूनियन, मुंगेर के लगातार तीन बार अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने बंदूक फैक्ट्री, मुंगेर के कर्मचारियों का भी नेतृत्व किया। गोप जी बिहार के 49 बोर्ड/कारपोरेशनों के कर्मचारियों व इसके साथ ही बिहार राज्य अर्द्धसरकारी कर्मचारी महासंघ के भी राज्य अध्यक्ष व कई अन्य संगठनों के भी सम्मानित सदस्य व अध्यक्ष रहे।

गोप जी का निधन 24 अक्टूबर, 2007 को लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर चिकित्सा विज्ञान संस्थान में हुआ। 

(यह आलेख अवधेश कुमार सिंह, पूर्व व्यवस्थापक लिबरेशन के द्वारा लिखा गया है। प्रस्तुति : मसऊद अख़्तर) 










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