सूनी सूनी सी रहीम की मज़ार

धरोहर , नई दिल्ली, बुधवार , 20-12-2017


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राजीव कटारा

निजामुद्दीन की ओर से गुजरता हूं, तो लगता है कोई बुला रहा है। हाल ही में निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से गुजरते हुए ठिठका था, लेकिन रुक नहीं पाया। जिंदगी के कुछ और ‘जरूरी’ काम ठिठकन को रुकने नहीं दे रहे थे। 

करीब 35 साल पहले यों ही घूमते हुए इस मकबरे को देखा था। तब जानने की इच्छा हुई थी कि यह किसका है? लेकिन न तो वहां कोई पट्टी लगी थी। न ही वहां घूमते या आराम फरमाते लोगों को पता था कि यह किसका है? 

काफी देर बाद एक बुजुर्गवार मिले थे। लेकिन पूछते ही खिसियाहट के साथ बोले थे, 'बरखुरदार, जान कर भी क्या करोगे? इस एहसान फरामोश शहर में किसे फुरसत है कि इसके बारे में जाने!'

काफी देर मान मनुहार के बाद उन्होंने बताया था कि यह रहीम का मकबरा है। वही रहीम जो कभी अकबर के नवरत्नों में एक थे। वही रहीम जो भक्तिकाल के महान कवियों में शुमार होते हैं। वही रहीम जिनके दोहे लोगों के दिलों में इस कदर बस गये हैं कि वे लोक का हिस्सा हो गये हैं। उन बुजुर्गवार की तमाम बातें आज भी जेहन में बसी हुई हैं। उनको आज की भाषा में रहीम का जबर्दस्त ‘फैन’ कह सकते हैं। और कुछ पुरानी शब्दावली में रहीम के भक्त। 

रहीम के दोहे।

 

उन्होंने तल्ख अंदाज में कहा था, 'बदनसीब सिर्फ बहादुरशाह ज़फ़र ही नहीं था। रहीम क्या कम बदनसीब थे? मुसलमान उन्हें इसलिए नहीं मानते कि वह राम और कृष्ण से जुड़ाव महसूस करते थे। हिंदू इसलिए अपना नहीं मानते कि उनका नाम अब्दुल रहीम खानखाना था।'

 

उसके बाद न जाने कितनी बार उन रहीम भक्त अब्दुल बारी से मिला था। आखिरी बार जब मैं उनके घर पहुंचा था, तो वह दुनिया छोड़ चुके थे। जब भी मैं उस रहीम पर सोचता हूं, तो वही याद आते हैं। 

रहीम ने भी क्या जिंदगी जी थी। अकबर की सल्तनत तक तो सब ठीक था। लेकिन जहांगीर ने एक दौर के बाद उनसे सब छीन लिया। तमाम उम्र शान-ओ-शौकत देखने के बाद रहीम को अपने आखिरी दिनों में इसी इलाके में दर-दर घूमते थे। एक बार उनसे किसी ने मदद मांगी। दानी रहीम की आंखों में आंसू आ गये थे। तभी यह दोहा जन्मा होगा-

 

ए रहीम दर-दर फिरहिं, मांगि मधुकरी खाहि।

यारो यारी छोड़िए, वे रहीम अब नाहिं॥

 

न जाने कहां-कहां की खाक छाननी पड़ी उनको। एक बार वह चित्रकूट में थे। तुलसीदास भी वहीं थे। वह चुपचाप शॉल लपेट कर तुलसी की रामकथा सुनने चले आते थे। राम भी तो ऐसे ही किसी दौर में चित्रकूट आए थे। तुलसी को बनारस के पंडितों ने भगा दिया था। रहीम को जहांगीर ने दर-दर भटकने को मजबूर कर दिया था। तो राम, रहीम और तुलसी तीनों को चित्रकूट में रमना ही पड़ा। उसी रमने में वह कह पाए होंगे- 

 

चित्रकूट में रमि रहे, ‘रहिमन’ अवध-नरेस ।

जा पर बिपदा परत है , सो आवत यहि देस॥ 

 

कमाल की भटकन के बाद रहीम साहब को इसी निजामुद्दीन में लौटना पड़ा था। लाहौर में उन्होंने आखिरी सांस ली थी। कभी अच्छे वक्त में उनकी बीवी के लिए यह मकबरा बनाया गया था। लेकिन सुपुर्दे खाक के लिए उन्हें यहीं लाया गया था। इस मजार पर आते ही मुझे कचोट होती रही है। यहां कोई चादर चढ़ाने क्यों नहीं आता? यहां न कोई उर्स होता है? और न ही कोई कव्वालियों का दौर। कितनी अलग है यह निजामुद्दीन की और मजारों से? वहां तो मेले लगते रहते हैं। लेकिन यहां...। 

रहीम पर सोचते हुए अक्सर उनका ‘ट्रेडमार्क’ दोहा याद आता है-

 

रहिमन चुप ह्वै बैठिए, देख दिनन के फेर।

जब नीके दिन आइहैं, बनत न लागत देर॥

 

लेकिन और कितने दिन चुप बैठना पड़ेगा? तब दिन फिरेंगे। कल (17 दिसंबर) रहीम साहब का जन्मदिन था। सोचता हूं कब ऐसा होगा कि निजामुद्दीन आने वाले हजरत की दरगाह और अमीर खुसरो की मजार के साथ-साथ रहीम की इस मजार पर भी चादर चढ़ाने आएंगे?

(राजीव कटारा वरिष्ठ लेखक-पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)










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