अंग्रेजी के दासत्व से नहीं मुक्त हो पायी हिंदी

विशेष , , बुधवार , 10-01-2018


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डॉ. राजू पांडेय

हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का संकल्प ही विश्व हिंदी दिवस के आयोजन का मूलाधार है। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को घोषणा की थी कि अब से प्रतिवर्ष इस तिथि को विश्व हिंदी दिवस आयोजित किया जाएगा। इस तिथि का चयन इसलिए किया गया क्योंकि वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु आयोजित किए जाने वाले विश्व हिंदी सम्मेलनों की श्रृंखला का प्रथम आयोजन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में हुआ था। ऐसी बहुत सी बातें हैं जिन्हें लेकर हिंदी प्रेमी गर्व कर सकते हैं। हिंदी विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है और विवाद केवल इस बात को लेकर है कि यह किस क्रम पर है। रामचरित मानस और प्रेमचंद के साहित्य के अनुवाद की विश्वव्यापी लोकप्रियता है। 

हिंदी फिल्में और उनका गीत संगीत पूरी दुनिया को दीवाना बनाता रहा है। विश्व के 40 देशों के 600 से भी ज्यादा विश्वविद्यालयों और शालाओं में हिंदी पढ़ाई जाती है। मॉरीशस, फिजी, नेपाल, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, नार्वे, फ़िनलैंड, हंगरी, बेल्जियम, जापान, इटली, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम और अन्य कैरेबियन देशों में हिंदी का पठन- पाठन हो रहा है। इनमें से अनेक देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु विधिवत संस्थाओं का गठन किया गया है। अनेक देशों से हिंदी की पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन होता है। इन देशों में हिंदी के अध्येताओं और लेखकों की एक बड़ी संख्या उपस्थित है। इन हिंदी सेवियों की रचनात्मकता का बोध इनकी प्रकाशित पुस्तकों द्वारा होता रहता है। हाल के वर्षों में सम्मान, पुरस्कार और पुस्तक विमोचन के निमित्त आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की संख्या बढ़ी है जिनमें विभिन्न देशों के साहित्यकार भाग लेते हैं। कुछ लोग ऐसे आयोजनों को विनोदपूर्वक साहित्यिक पर्यटन के पैकेज के रूप में चित्रित करते हैं जिनमें प्रतिभागी ही आयोजक होते हैं और पारस्परिक प्रशंसा तथा महिमामंडन द्वारा एक ऐसी मनःस्थिति में पहुँच जाते हैं जिसमें द्वितीय श्रेणी की प्रतिभाएं स्वयं को विलक्षण और अद्वितीय मानने लगती हैं। हिंदी का यह विकास अथवा उपलब्धियां उन शोधग्रंथों तक सीमित रह जाती हैं जो अपनी आत्ममुग्धता के दस्तावेजीकरण के प्रयास मात्र होते हैं और हिंदी की बेहतरी से जिनका कुछ लेना देना नहीं होता। ऐसे आयोजनों की बढ़ती भीड़ में गुणवत्तापूर्ण कार्य के अनदेखा कर दिए जाने की आशंका भी बढ़ रही है।

विश्व विजय का स्वप्न देखने वाली हिंदी अपने ही घर में अपनों के द्वारा ही तिरस्कृत और उपेक्षित है। यथार्थ तो यह है कि चाहे वह -हिंदी का लेखक हो, प्रकाशक हो, पत्रकार हो, शिक्षक हो, हिंदी स्कूल का छात्र हो- हमेशा समाज द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है। हिंदी से उसका नाता जुड़ते ही उस पर बी ग्रेड का ठप्पा लग जाता है और वह अपमान एवं उपेक्षा झेलते-झेलते इतना आत्महीन और पददलित हो जाता है कि अपनी शक्ति और महत्व को भुला कर अंग्रेजी जानने वाले अपने बंधुओं की अधीनता स्वीकार कर लेता है। अंग्रेजी हमारे देश में अब भी न केवल शोषकों की भाषा बनी हुई है अपितु शोषण का एक ताकतवर औजार भी है। लोहिया ने आज से 60 वर्ष पूर्व ही इस स्थिति को भांप लिया था। उन्होंने लोकसभा में पुरजोर लहजे में अपनी बात रखी-अंग्रेजी को खत्म कर दिया जाए। मैं चाहता हूं कि अंग्रेजी का सार्वजनिक प्रयोग बंद हो, लोकभाषा के बिना लोकराज्य असंभव है। कुछ भी हो अंग्रेजी हटनी ही चाहिये, उसकी जगह कौन सी भाषाएं आती है, यह प्रश्न नहीं है। इस वक्त खाली यह सवाल है, अंग्रेजी खत्म हो और उसकी जगह देश की दूसरी भाषाएं आएं। हिन्दी और किसी भाषा के साथ आपके मन में जो आए सो करें, लेकिन अंग्रेजी तो हटना ही चाहिये और वह भी जल्दी। अंग्रेज गये तो अंग्रेजी चली जानी चाहिये। उन्होंने एक स्थान पर लिखा- माध्यम के रूप में अंग्रेजी के इस्तेमाल से आर्थिक मामलों में काम का नतीजा कम निकलता है, शिक्षा के मामले में ज्ञानार्जन कम होता है और खोज लगभग नहीं के बराबर होती है, प्रशासन में अक्षमता बढ़ती है और गैरबराबरी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। अंग्रेजी एक विदेशी भाषा है और राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुँचाती है, यह बात इस बात की तुलना में मामूली है कि आर्थिक प्रगति में वह बाधक है, गैरबराबरी को बढ़ावा देती है और अंग्रेजी का इस्तेमाल अल्पसंख्या के शासन का हथियार बनता है। 

लोहिया जानते थे कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में अंग्रेजी का प्रयोग आम जनता की प्रजातंत्र में शत प्रतिशत भागीदारी के मार्ग में बाधक है। उन्होंने इस सामंती भाषा के प्रयोग के खतरों से बारंबार आगाह किया और बताया कि यह मजदूरों, किसानों और शारीरिक श्रम से जुड़े आम लोगों की भाषा नहीं है। 

उन्होंने लिखा- जिस जबान में सरकार का काम चलता है, इसमें समाजवाद तो छोड़ ही दो, प्रजातंत्र भी छोड़ो, ईमानदारी और बेईमानी का सवाल तक इससे जुड़ा हुआ है। यदि सरकारी और सार्वजनिक काम ऐसी भाषा में चलाये जाएँ, जिसे देश के करोड़ों आदमी न समझ सकें, तो यह केवल एक प्रकार का जादू-टोना होगा। जिस किसी देश में जादू-टोना-टोटका चलता है, वहां क्या होता है? जिन लोगों के बारे में मशहूर हो जाता है कि वे जादू वगैरह से बीमारियाँ आदि अच्छी कर सकते हैं, उनकी बन आती है। ऐसी भाषा में जितना चाहे झूठ बोलिए, धोखा कीजिये, सब चलता रहेगा, क्योंकि लोग समझेंगे ही नहीं। आज शासन में लोगों की दिलचस्पी हो तो कैसे हो ।

लोहिया ने सरकार के इस विचार का हमेशा विरोध किया कि पहले हिंदी में शब्दकोष और पारिभाषिक तथा वैज्ञानिक शब्दावली निर्मित की जाए। इसे सजाया, संवारा, माँजा जाए, मजबूत बनाया जाए तब यह राज काज में पूर्णतः प्रयुक्त होने के योग्य बन पाएगी। लोहिया ने कहा-भाषा को सरल या सरस प्रशासन और विद्वान नहीं बनाया करते। पहले शब्द निर्माण हों, तब अंग्रेजी हटे। दुनिया में ऐसा न कभी हुआ और न कभी होगा।भाषा की पहले प्रतिष्ठा होती है, तब उसका विकास हुआ करता है।जिस तरह बच्चा पानी में डुबकी लगाए बिना, छपछपाने, डूबने-उठने बिना तैरना सीख नहीं सकता, उसी तरह असमृद्ध होते हुए भी इस्तेमाल बिना भाषा समृद्ध नहीं हो सकती। इस्तेमाल सब जगह हो और फौरन, विज्ञानशाला  और अदालत, अध्ययन, अध्यापन इत्यादि सभी जगह। हो सकता है कि शुरू में बेढंगा लगे, अटपटा हो और गलतियाँ हो जाएँ। संपर्क के तौर पर मैं इतना ही कह दूँ कि मौजूदा अंग्रेजी की गलतियों से हिन्दी की ये गलतियाँ कम हानिकारी होंगी। उसका सवाल और है । भाषा को संवारने-सुधारने का काम जितना भाषा-शास्त्री या शब्दकोश निर्माता करते हैं,  उससे ज्यादा वकील-जज, राजपुरुष, अध्यापक, लेखक-वक्ता, वैज्ञानिक इत्यादि किया करते हैं, अपने इस्तेमाल द्वारा। इनके इस्तेमाल से भाषा सुधरती है न कि सुधर जाने के बाद ये लोग उसका इस्तेमाल करने बैठते हैं। 

लोहिया को मातृभाषा में शिक्षा देने की महत्ता का ज्ञान था। उन्होंने कहा- आज स्कूलों व कॉलेजों में अंग्रेजी एक जहरी विषय है और उससे राष्ट्र का नुकसान हो रहा है। हमारे सत्तर-अस्सी फीसदी बच्चे औसत बुद्धि के होते हैं और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान हासिल करने के प्रयत्न में उनका इतना कचूमर निकल जाता है कि भूगोल, इतिहास, विज्ञान आदि विषय में पर्याप्त ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते। 

यह जानना अत्यंत पीड़ादायी है कि लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन(1957) को गलत ढंग से व्याख्यायित किया गया। इसे हिंदी का वर्चस्व स्थापित करने की चेष्टा माना गया। जबकि लोहिया ने बारंबार यह स्पष्ट किया था कि अंग्रेजी हटाओ का अर्थ हिंदी लाओ कदापि नहीं है। उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं की उन्नति और उनके प्रयोग की खुल कर वकालत की। उनके अनुसार अंग्रेजी हटाओ का अर्थ मातृभाषा लाओ था। लोहिया जिस 7 लाख शब्दों वाली हिंदुस्तानी की वकालत करते थे वह संस्कृत शब्दों की जटिलता से युक्त हिंदी और दुरूह फ़ारसी शब्दों से भरी पड़ी उर्दू से कहीं अलग आम अवाम की जबान थी। इस बिंदु पर लोहिया हिंदी को  हिन्दू संस्कृति की रूढ़िवादी परिभाषा के प्रतीक के रूप में स्थापित करने की हिंदुत्ववादियों की कोशिशों से बिल्कुल दूर निकल जाते हैं। एक भाषा के रूप में अंग्रेजी के लिए बहुभाषाविद लोहिया के मन में गहरा सम्मान था। लोहिया हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को केंद्रीय स्थान दिलाने की अपनी लड़ाई में सफल न हो पाए।

14 सितम्बर 1949 में हिंदी को संविधान सभा ने राजभाषा का दर्जा तो दे दिया किन्तु जब 26 जनवरी 1950 को देश लोकतंत्रात्मक गणराज्य बना तो 1965 तक राज्यों के भीतर हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी को भी संपर्क भाषा बनाए रखने का निर्णय लिया गया। अंग्रेजी, केंद्र और राज्य के मध्य भी हिंदी के साथ संपर्क भाषा के रूप में स्वीकृत की गई। किन्तु जब 26 जनवरी 1965 को 15 वर्ष पूर्ण होने वाले थे तब दक्षिण भारतीय राज्यों में लम्बे समय से चल रहे हिंसक और उग्र हिंदी विरोधी आंदोलन के कारण सरकार ने 24 जनवरी 1965 को यह घोषणा की कि अंग्रेजी, हिंदी के साथ साथ भविष्य में भी संपर्क भाषा बनी रहेगी। सरकार द्वारा 1963 में संसद में पारित कराए गए राजभाषा कानून में इसके लिए प्रावधान कर दिया गया था।

आज यदि हिंदी विश्व भाषा का रूप लेती दिखती है तो इसका कारण इसमें बाजार की बढ़ती रूचि है। भारतीय उपभोक्ताओं पर विश्व बाजार की नजर है। यही कारण है कि गूगल, ट्रांसलेशन, ट्रांस्लिटरेशन, फोनेटिक टूल्स आदि के क्षेत्र में अन्वेषण और अनुसंधान कर अपनी सेवाओं को परिष्कृत कर रहा है। हिंदी और भारतीय भाषाओं की पुस्तकों का डिजिटलाइजेशन जारी है। फेसबुक और व्हाट्स एप हिंदी और भारतीय भाषाओं के साथ अनुकूलन कर रहे हैं। यही हाल माइक्रोसॉफ्ट का है। अग्रणी मोबाइल निर्मात्री कंपनियां ऐसे हैंडसेट्स का निर्माण कर रही हैं जो हिंदी और भारतीय भाषाओं को सपोर्ट करते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी जानने वाले कर्मचारियों को वरीयता दे रही हैं। हॉलीवुड की फिल्में हिंदी में डब हो रही हैं और हिंदी फिल्में देश के बाहर देश से अधिक कमाई कर रही हैं। हिंदी, विज्ञापन उद्योग की पसंदीदा भाषा बनती जा रही है। बाजार को हिंदी के विकास से कुछ लेना देना नहीं है।

बाजार हिंदी को तकनीकी खोजों के माध्यम से अपने उपयोग के लिए सर्वसुलभ और यूजर फ्रेंडली बना रहा है। किंतु हर वैज्ञानिक आविष्कार अपने आविष्कारक की इच्छापूर्ति का साधन ही नहीं बना रहता, यह एक जीवित इकाई की भाँति व्यवहार करता है और स्वतंत्र अस्तित्व दर्शाता है। सोशल मीडिया ने हिंदी में लेखन और पत्रकारिता के नए युग का सूत्रपात किया है और बहुत थोड़े से समय में कई जनांदोलनों को जन्म देने और चुनाव जिताने-हराने में उल्लेखनीय और चकित करने वाली भूमिका निभाई है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विदेशी मालिकों के घर आंगन में उनकी बुरी नजरों का सामना करते हुए हिंदी अनाथ सी पल बढ़ रही है, वह अपनी सुंदरता और प्रतिभा से सबका मन मोह लेती है, किन्तु उसका माधुर्य और सौंदर्य, उसकी सुगठता और सुघड़ता सब बाजार में बिकने के लिए हैं, यह ख्याल मन को विचलित कर देता है और तब हिंदी भाषा के रक्षक लोहिया बहुत याद आते हैं।

(लेखक डॉ. राजू पाण्डेय विभिन्न विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)










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