एक मालिक जिसने चुना मजदूरों का पक्ष

हमारे नायक , , रविवार , 26-11-2017


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मसऊद अख्तर

                                                           होमी दाजी

                                                         (1926-2009)

कॉमरेड होमी दाजी का जन्म एक पारसी परिवार में 5 सितम्बर, 1926 को तत्कालीन बम्बई में हुआ था। उनके जन्म के समय उनके पिता के पास एक कॉटन गिनिंग मिल थी। परन्तु जब 1930 के दशक की मंदी ने भारत में अपना असर दिखाया तो दाजी का परिवार भी इसकी चपेट में आ गया और आर्थिक रूप से तबाह हो गया। इस पूंजीवादी संकट ने दाजी के बचपन में ही उनके परिवार को आर्थिक विपन्नता में ला दिया।

कुछ दिनों बाद होमी दाजी का परिवार बम्बई से इंदौर आ गया और होमी ने सेंट राफेल स्कूल में अपनी शिक्षा आरम्भ की, जो इंदौर का सर्वोत्तम स्कूल में गिना जाता था। उन्होंने मैट्रिक परीक्षा की तैयारी अपने दोस्तों से पुस्तकें उधार मांग कर की। कॉलेज में भी जब यह समस्या बरकरार रही तो होमी दाजी ने एक किताब की दुकान से करार किया कि वे दुकान के लिए पाठ्य पुस्तकों के आर्डर लायेंगे और पुस्तकें ग्राहकों के सुपुर्द करने का भी काम करेंगे और इसके बदले में उन्हें उस पुस्तक की दुकान में बैठकर उन्हें पुस्तकें पढ़ने की अनुमति दी जायेगी। यह उनका असाधारण अध्यवसाय ही था जिसके कारण होमी दाजी इतिहास की स्नातकोत्तर डिग्री प्रथम श्रेणी में (आगरा विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान) प्राप्त किया और इसके बाद उन्होंने कानून की डिग्री भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 

होमी का प्रारम्भिक जीवन बहुत हद तक उनकी माता से प्रभावित था। वह बहुत साहसी महिला थीं। सभी कठिनाइयों के बावजूद उन्हें विश्वास था कि होमी की शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपेक्षा की थी कि उनका प्रतिभाशाली पुत्र परिवार में आर्थिक सुख समृद्धि वापस लाएगा, परन्तु जब होमी ने व्यवस्था में बदलाव करने के जीवनपर्यंत संघर्ष को अपनाया तो उन्होंने इसे भी ख़ुशी से स्वीकार कर लिया और हर संभव सहायता भी प्रदान किया।

होमी का राजनीतिक कैरियर बहुत ही कम उम्र में ही शुरू हो गया। 16 वर्ष की अल्प आयु में उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के अंतर्गत इंदौर में आयोजित प्रदर्शन में भाग लिया। वे पुलिस द्वारा एक बार बहुत बुरी तरह पीटे भी गए। 1943 में वह अखिल भारतीय छात्र परिसंघ में शामिल हो गए। जब 1945 में कांग्रेस, छात्र परिसंघ से बाहर चली गयी तो कॉमरेड दाजी साम्यवादी वर्ग के साथ हो गए। 1 मई 1946 को कॉमरेड दाजी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए और उन्हें श्रमिक वर्ग के आन्दोलन का प्रभारी बनाया गया।

इंदौर एक महत्वपूर्ण कपड़ा केंद्र था। शहर में सात संयुक्त कॉटन मिलें थीं, जिनमें लगभग 30,000 श्रमिक काम करते थे। जब दाजी पार्टी में शामिल हुए ठीक उसी समय कपड़ा मिलों में 12 दिनों की हड़ताल हुई। वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी हुई और दाजी को इस आन्दोलन का चार्ज लेना पड़ा। उन्होंने श्रमिक वर्ग की कॉलोनियों और मिलों के दरवाजों पर अनेक सभाओं को संबोधित किया। होमी बहुत ही सशक्त वक्ता थे और शीघ्र ही मिल श्रमिकों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए।

कलकत्ता में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी दूसरी बैठक (28 फरवरी – 6 मार्च, 1948) में एक उग्रपंथी राजनीतिक अभिधारणा अपनाई। परिणामस्वरूप अनेक प्रांतीय सरकारों ने पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस पर इंदौर में भी होलकर सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इसके अनेक नेता भूमिगत हो गए। यह प्रतिबन्ध गणतंत्र दिवस के दिन 26 जनवरी 1950 को हटाया गया। उसी वर्ष कॉमरेड दाजी को मई दिवस समारोह में भाग लेने के लिए एटक के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में मास्को भेजा गया।

1950 के दशक में दो छात्र आंदोलनों से दाजी निकटता से जुड़े थे। ग्वालियर में छात्रों नें 1950 में आन्दोलन किया और वहां गोलिया चलीं। कॉमरेड दाजी ने जांच आयोग के समक्ष छात्रों की ओर से मामले पर बहस की। पुनः 1954 इंदौर में छात्र आन्दोलन हुआ और इस बार फिर पुलिस ने गोली चलाई और निर्दोष छात्र मारे गए। इस माले की जांच करने के लिए वांचू आयोग का गठन किया गया। दाजी ने इस मामले में भी छात्रों की जोरदार पैरवी की।

1957 में दाजी को मध्य प्रदेश विधान सभा में चुन लिया गया। श्रमिकों को बिना किसी स्पष्टीकरण मांगे नौकरी से बर्खास्त करने व उत्पीड़न के खिलाफ दाजी ने भोपाल में सरकार के सामने आन्दोलन की अगुवाई की जिसमें 200 – 300 तक मजदूरों की एक साइकिल रैली इंदौर से भोपाल तक आयोजित की गयी। 1958 में दाजी को टेक्सटाइल मिल वर्कर्स यूनियन का सचिव चुन लिया गया। ट्रेड यूनियन के मोर्चे पर कम्युनिस्ट नेतृत्व की गतिशीलता ने सरकार को हतोत्साहित कर दिया। वर्ष 1960 में मध्य प्रदेश औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम पारित किया गया। यह अधिनियम बम्बई औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम, 1946 के पैटर्न पर बनाया गया था। इस अधिनियम के अनुसार केवल प्रतिनिधि यूनियन को ही यह अधिकार था कि वह मजदूरों की ओर से प्रबंधन के साथ वार्ता कर सकें। इंटक को कपड़ा मिलों का प्रतिनिधि यूनियन बनाया गया और प्रबंधन के साथ सीधी बातचीत करने के लिए एटक की संभावना ही समाप्त कर दी गयी। परन्तु यह सरकारी बाधा एटक की स्थिति को कम करने में बाधक बनने में सफल न हो सकी। हालांकि मजदूरों ने इंटक की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की, परन्तु उनकी मांगों को एटक द्वारा भी उठाया गया। एटक द्वारा बड़ी हड़तालों की योजना बनायी गई और बहुत बार प्रबंधन को इंटक के प्रतिनिधियों के साथ औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले गैर-आधिकारिक रूप से एटक के साथ भी समझौता करना पड़ा। कॉमरेड दाजी के नेतृत्व में कपड़ा मिल के मजदूरों द्वारा किये गए कुछ प्रमुख आन्दोलन निम्न हैं; 

1. कताई विभाग में एक वर्कर को दो करघों का चार्ज दिया गया था। 1964 में हुकुमचंद मिल ने निर्णय लिया कि एक वर्कर को 4 करघों का चार्ज देकर वर्कलोड को बढ़ाया जाए। इसका अर्थ था कि आधी जनशक्ति की छंटनी की जाएगी और शेष आधी जनशक्ति पर अनुचित रूप से कार्यभार बढ़ा दिया जाएगा। इसके खिलाफ कॉमरेड दाजी और वर्कर 14 दिन की भूख हड़ताल पर गए।

2. 1972 में राज्य में सभी कपड़ा मिलों में हड़ताल का आह्वान किया गया। इंदौर में दस दिन की एक सफल हड़ताल की गई, जिसमें मजदूरों की मांग मान ली गयी। कपड़ा मजदूरों के लिए सात दिन की आकस्मिक छुट्टी स्वीकृत की गई। मजदूरों को मूल्य सूचकांक के साथ जुड़े महंगाई भत्ते को मान लिया गया।

3. 1979 में कपड़ा मिलों में 32 दिन की एक सफल हड़ताल की गयी जिसमें वेतन संशोधन की मांग की गयी थी।

4. 1984 में होप टेक्सटाइल मिल ने एक गैर कानूनी तालाबंदी की घोषणा की। कॉमरेड दाजी द्वारा 8 घंटे की एक भूख हड़ताल की गई। प्रबंधन को न केवल मिल खोलने के लिए ही बाध्य नहीं किया गया बल्कि मजदूरों की भविष्य निधि भी सार्वजनिक भविष्य निधि लेखा में शामिल की गयी।

1960 से लघु उद्योग इकाइयां इंदौर के पोलो ग्राउंड औद्योगिक क्षेत्र में आ गईं। एटक ने इस नए औद्योगिक क्षेत्र में अपने संगठनात्मक कार्यों को फैलाया। 100 से कम मजदूरों वाली लघु उद्योग इकाइयों में प्रतिनिधि यूनियन का उपबंध लागू नहीं था जिसने ट्रेड यूनियन की गतिविधियों के लिए अच्छा दायरा प्रदान किया। 

एटक की इंदौर इकाई को वर्कर-प्रबंधन वार्ता के मुकाबले एक बड़े क्षेत्र में ट्रेड यूनियन की गतिविधियां फैलाने का श्रेय जाता है। इस दिशा में कॉमरेड दाजी का योगदान बहुत अधिक था। एक नागरिक समिति गठित की गयी। यूनियन के सदस्यों को स्थानीय चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने और श्रमिक हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। नगर निगम में यूनियन सदस्यों की उपस्थिति म्युनिसिपल शासन को प्रभावित करने के लिए एक बड़ी शक्ति बन गई। 1958 में यूनियन से संबद्ध कॉर्पोरेटरों ने सफलतापूर्वक साइकिलों पर म्युनिसिपल टैक्स और गन्दी बस्तियों पर म्युनिसिपल हाउस टैक्स समाप्त कर दिया। इससे दाजी को बहुत ख्याति मिली और उन्हें ‘साइकिल कर समाप्त करने वाला’ कहा जाने लगा। 

1958 में दाजी ने इंदौर के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण योगदान दिया। होलकर के महल के बाहर का स्क्वायर राजबाड़ा के नाम से जाना जाता था, जिसे दाजी ने लोगों को समर्पित करने पर जोर दिया और कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सबकुछ है और उसका नाम जनता चौक कर दिया गया।

1974 में दाजी ने महंगाई के खिलाफ एक बहुत प्रभावशाली नागरिक आन्दोलन आयोजित किया। बड़ी संख्या में मिल मजदूरों ने इसमें भाग लिया और गिरफ्तारियां दीं। उनकी संख्या इतनी अधिक थी कि मिलों में रूटीन उत्पादन चलाना भी असंभव हो गया। मिलों को बंद करना पड़ा। इस आन्दोलन ने जब गति पकड़ी तो प्रशासन को मजबूरन शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा। 

1962 में दाजी संसद के लिए चुने गए। दाजी के स्पष्ट दृष्टिकोण और वाद-विवाद की उनकी विशेष क्षमता का अवलोकन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी किया और यही वजह थी कि चीन के आक्रमण के बाद कॉमरेड दाजी को उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया जो गुट निरपेक्ष देशों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात करने के लिए कोलम्बो गया था। इस प्रतिनिधिमंडल को भारत-चीन विवाद के भारतीय पक्ष को स्पष्ट करने के लिए भेजा गया था। 1972 में दाजी एक बार फिर मध्य प्रदेश विधान सभा के लिए चुने गए।

यह बात विशेषरूप से ध्यान देने योग्य है कि विधान सभा व संसद में अपने कार्यकाल के दौरान दाजी ने अपनी ट्रेड यूनियन की जिम्मेदारियों को किसी और पर नहीं छोड़ा। बल्कि वे उसी तरह जिम्मेदारी के साथ बढ़चढ़कर भाग लेते रहे।

1964 में कॉमरेड दाजी को एटक की मध्य प्रदेश इकाई का महासचिव बनाया गया और 1980 में उन्हें एटक का अखिल भारतीय महासचिव चुना गया। 1974 से 1978 तक वह भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय सचिवालय के सदस्य थे। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर भारत के बाहर पार्टी और एटक का प्रतिनिधित्व किया।

कॉमरेड दाजी का राजनैतिक कैरियर उस समय अचानक धीमा पड़ा जब 1992 में उन्हें ब्रेन हैमरेज हो गया और इस कारण उन्हें लकवा मार गया। उन्हें इससे ठीक होने में एक लंबा समय लगा और तब भी वो आंशिक रूप से ही ठीक हो सके। 

कॉमरेड दाजी के व्यक्तिगत जीवन में बड़े उतार चढ़ाव रहे हैं। उन्होंने अपने छोटे भाई को भी कम उम्र में ही खो दिया था। उन्होंने अपने दोनों बच्चों को भी उस समय खो दिया था जब वह अपने कैरियर के उच्च शिखर पर थे। उनके पुत्र वकील थे और पुत्री डॉक्टर थीं। उनके दोनों बच्चों न केवल विचारधारात्मक रूप से अपने पिता के पदचिन्हों को अपनाया बल्कि उन्होंने अपने जीवन को भी उसी दिशा में मोड़ दिया था। दोनों बच्चों का असामयिक निधन वास्तव में दाजी परिवार के लिए एक बहुत बड़ा आघात था। 

1992 के पक्षाघात के बाद उनके आन्दोलनों में गंभीर बाधाएं आ गईं। वे इसके बावजूद मानसिक रूप से सक्रिय रहते थे और जहां तक संभव था शारीरिक रूप से भी। उन्होंने जीवन के प्रति अपना उत्साह बरकरार रखा। 

2 मई 2009 को उनको निमोनिया और फेफड़ों के संक्रमण के चलते गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। दाजी पिछले कई साल से लकवा, मधुमेह और हृदय रोग से भी जूझ रहे थे। यहीं पर इलाज के दौरान 14 मई 2009 को उनकी मृत्यु हो गयी।          










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