भारतीय लोकतंत्र और समाज के माथे पर कलंक का टीका हैं राजस्थान की रुदालियां

हमारा समाज , , रविवार , 31-12-2017


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अखिलेश अखिल

कौन कहता है कि देश आजाद है? फिर कौन कहता है कि आजाद भारत में दलितों की हालत बदल गयी। क्या अपनी मर्जी से आज भी वो समुदाय कुछ कर सकता है? देश में आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहां दलितों को सामंतों के लिए वो हर काम रिवाज के नाम पर  करना पड़ता  है। जिसके लिए वो तैयार नहीं है। जबकि न ही ये काम संविधान में कहीं दर्ज हैं और ना ही किसी समाज की बाध्यता है। लेकिन देश के तमाम हिस्सों में ये मानव विरोधी रवायतें तरह-तरह से जिंदा हैं। इन्हीं में से एक रुदाली प्रथा है। जो राजस्थान में न केवल अपने पूरे वजूद बल्कि पूरे रूप और पहचान के साथ जारी है। 

राजस्थान में आज भी दलितों के लिए बाध्यता है कि वो किसी के मरने पर सामंतों के घर रुदाली का काम करेंगे। यानी उनके शोक में दलित रोएंगे। कानून कुछ भी कहता हो। लेकिन यहां प्रथा पूरे कानून पर भारी है। अचरज की बात ये है कि  जो तबका देश में आरक्षण की समीक्षा की बात कर रहा है वो जातिवाद का दंश खत्म करने की बात कभी नहीं करता। कई लोगों का तो यहां तक कहना है कि आरक्षण इसलिए खत्म कर देना चाहिए क्योंकि जातिवाद खत्म हो चुका है। जबकि आज भी मोहल्ले के नाम जातियों के नाम पर रखे जाते हैं।

 वसुंधरा सरकार के राजस्थान में आज भी सामंतों (कथित ऊंची जाति को लोग) के यहां किसी की मौत पर वो खुद नहीं रोते। उनके यहां मौत पर दलित समाज की महिलायें रुदाली करती हैं और वो भी दहाड़ें मारकर। अगर दहाड़ मारती महिलायें रुदाली नहीं करेंगी तो उनकी सामत आ जाएगी। अपनों के लिए तो आंसू सब बहाते हैं लेकिन राजस्थान में रुदालियां गैरों के लिए दहाड़ मार कर रोती हैं और उनके  पुरुष मुंडन करवाते हैं। रोना-हंसना ये सब एक भावना है लेकिन राजस्थान में दलित महिलाओं को जबरन अपने दुख में रूलाया जाता है। दुःख सामंतों का लेकिन रुदाली दलित महिलाओं की। क्या समाज है? अशिक्षित और बेगैरत समाज। जो अपने लोगों की मौत पर आंसू भी नहीं बहा सकते वो मानवों की श्रेणी में किस नजरिये से रहने के हकदार हो सकते हैं !

सामतों के घर कोई मर जाए तो कई दिनों तक उन्हीं के घरों पर जाकर मातम मनाना पड़ता है। इन रुदालियों का रुदन आज भी राजस्थान के आदिवासी और पिछड़े जिलों में गूंजता है। अभी भी यहां सैकड़ों रुदालियां हैं।

राजस्थान के सिरोही जिले में आज भी ऐसे दर्जनों  गांव हैं जहां रुदालियां रहती हैं और वो सामंतों के दुःख में जाकर रुदाली करती हैं।  रेवदर इलाके में धाण, भामरा, रोहुआ, दादरला, मलावा, जोलपुर, दवली, दांतराई, रामपुरा, हाथल, वड़वज, उडवारिया, मारोल, पामेरा में रुदालियों के सैकड़ों परिवार रहते हैं।

इतना ही नहीं दलित पुरुषों को भी ऐसा ही दंश झेलना पड़ता है। अगर किसी कथित ऊंची जातिवालों के यहां कोई मर जाता है तो पूरे गांव के दलितों को सिर मुंडवाना पड़ता है। दलित परिवार के बच्चों से लेकर बूढ़ों तक का जबरन मुंडन करवाया जाता है। अगर कोई रुदाली रोने न जाए या दलित सिर न मुंडाए तो उस परिवार के लिए प्रताड़नाओं का दौर शुरू हो जाता है।

माना जाता है कि रुदाली की यह परम्परा राजस्थान में करीब दो सौ साल से है।  चूंकि इस बारे में कोई कानून नहीं है इसलिए यह परम्परा जारी है। लोगों का कहना है कि राजा-राजवाड़ों और जमींदारों के यहां जब किसी की मौत हो जाती थी तो मातम मनाने के लिए दलितों को लाया जाता था।  इसके पीछे की कहानी यह थी कि चूंकि रोने से कमजोरी की आशंका रहती है और चेहरा विकृत हो जाता है इसलिए अपने चेहरे की सुंदरता बचाये रखने के लिए गरीब और दलित जातियों को यह काम दे दिया गया। 

लोकतंत्र का यह परिहास मात्र है।  मरे कोई और रोये कोई। अजब कहानी और गजब प्रथा है। इस प्रथा को ख़त्म करने की जरूरत है। दलितों के साथ यह सिर्फ अन्याय नहीं बल्कि अत्याचार है। यह भारत जैसे देश के लिए किसी कलंक से कम नहीं है। 

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)










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Suraj Sharma :: - 03-30-2018
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