असली इतिहास को समझने और मिथिहास से मुक्ति का समय

विवाद , , बुधवार , 13-03-2019


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मदन कोथुनियां

जो इतिहास हमें पढ़ाया जा रहा है वो ब्रिटिश गुलामों की सहमति से तैयार कपोल कल्पित कहानियों का एक पिटारा मात्र है। जो भी लिखित इतिहास हमें पढ़ाया जा रहा है उसके नायक व खलनायक एक ही वर्ग विशेष के लोग हैं। अब तक भारतीयों को जो इतिहास पढ़ाया गया था वो शांति, अहिंसा, पाप-पुण्य के तराजू में रखकर भावी बगावत की उम्मीदों का गला घोंटकर संतुष्टि का पाठ पढ़ाने वाला रहा है! मानव सभ्यता पर धर्म के माध्यम से नियंत्रण का जो षड्यंत्र दुनियाभर में चल रहा था उससे पश्चिम ने 15वीं सदी में मुक्ति पा ली थी मगर भारतीय जनता अब भी लोकतंत्र के बजाय धर्म से ज्यादा नियंत्रित होती है।

देश की आजादी के लिए सबसे ज्यादा कुर्बानी किसान कमेरों ने दी थी लेकिन उनके शहादत को भारतीय आधिकारिक इतिहास में कोई जगह नहीं है। समय-समय पर भगतसिंह,राजगुरु, सुखदेव,बिरसा मुंडा, तिलका मांझी को भले ही भाषणों में याद कर लिया जाता हो या चुनावी लाभ लेने के लिए अस्थायी टेबल पर फोटो लगाकर माल्यार्पण कर दिया जाता हो मगर वो भारतीय इतिहास के हीरो के बजाय सरकारी दस्तावेजों में आतंकी ही हैं।

झारखंड के गोड्डा जिले में अडानी पावर प्लांट के लिए अधिगृहित जमीन के साथ उन आदिवासी धरतीपुत्रों की खड़ी फसलों पर जेसीबी चलाई जा रही थी जिन्होंने अपनी जमीन को देने से इनकार कर दिया था, उसको देखकर मेरे दिमाग में दो सवाल अर्थात आजादी के बाद की हकीकत के दो नजारे खड़े हुए।

क्या भूमि सुधार आंदोलन को तत्कालीन सरकार ईमानदारी से लागू करती तो 1967 में नक्सलबाड़ी गांव में भूमि के एक छोटे से टुकड़े को लेकर पैदा विवाद आज 10 राज्यों में हथियारबंद क्रांति का आधार बन पाता।केरल सरकार ने ईमानदारी के साथ भू-सुधार कानून को लागू किया और शिक्षा,स्वास्थ्य व महिला अधिकारों के लिए वो आज रोल मॉडल है। दुनिया की एकमात्र चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार को तत्कालीन केंद्रीय कांग्रेस सरकार ने बर्खास्त कर दिया था।

दूसरा सवाल यह आया कि जब देश की आजादी में सबसे ज्यादा बलिदान देने वाली कौम के साथ केंद्रीय सत्ता वादाखिलाफी करती है तो उस कौम में नाराजगी का ज्वार उबल पड़ता है क्योंकि वतन के लिए जिन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया उसी के साथ सत्ता गद्दारी करती है तो परिणाम खालिस्तान के रूप में सामने आता है। विपक्ष उस समय भी भारतीय इतिहास के कर्णधारों को दफन करने के लिए सेना बुलाकर कुचलने की मांग करते हुए जुलूस निकाल रहा था और जब एक कौम 2002 में कुचली जा रही थी तब भी विपक्ष सहयोग करने के बजाय तमाशबीन बनकर देख रहा था।

मैं आपको इतना ही कहना चाहता हूं कि आप प्राचीन इतिहास में मत जाइए क्योंकि इतनी झूठ फरेब की परतें डाल दी गई है कि उधेड़ने में समय जाया करोगे तो अगली तीन पीढियां बर्बाद हो जाएगी। हो सके तो मध्यकालीन इतिहास पर सरसरी नजर डाल लीजिये मगर असली इतिहास समझने की भूल कतई मत करिए। आजादी के बाद का इतिहास ढंग से पढ़ लीजिये और उसकी करतूतों को समझते हुए पीछे जा सकते है। हमें इतिहास सदा प्राचीन, मध्यकालीन व आधुनिक की क्रमबद्धता में पढ़ाया जाता रहा है लेकिन इतिहास वर्तमान से कड़ी दर कड़ी पीछे जाने का विषय है।खुद को एक जगह खड़ा करके पीछे विश्लेषण करते जाओगे तो बेईमानी की करतूतों से आपका मोहभंग हो जाएगा।

जो आज विश्वगुरु,महान प्राचीन विरासत, स्वर्ण युग, रामराज्य आदि के रूप में हसीन पर्दे की महिमा पेश की जा रही है वो भारतीय मानव सभ्यता के बदनुमा पेज हैं जिनको समेटने से ही भविष्य की उजलत महफूज रह पाएगी!आज जिस प्रकार किसानों,आदिवासियों आदि के साथ व्यवहार किया जा रहा है वो भविष्य के बदनुमा इतिहास की रूपरेखा तैयार कर रहा है। हज़ारों वर्षों से जिस जल-जंगल-जमीन को लोग अपनी अस्मिता, वजूद मानकर पूजते आये है और जिनके लिए लाखों की संख्या में कुर्बानियां दी है,इतनी आसानी से वेदांता, जिंदल, अडानी,अम्बानी रूपी लुटेरों के हवाले कैसे कर देंगे?

 








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Umesh Chandola :: - 03-13-2019
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