अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:महिलाओं के बिना अधूरा है युद्ध और शांति का विमर्श

आधी आबादी , , शुक्रवार , 08-03-2019


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डॉ. राजू पाण्डेय

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक उपयुक्त अवसर है जब हम उस आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण विश्वव्यापी प्रवृत्ति की पड़ताल करें जो यह दर्शाती है कि किस तरह समाज न केवल युद्ध के विमर्श में अपितु शांति स्थापना के प्रयासों में भी महिलाओं की अनदेखी करता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा 31 अक्टूबर 2000 को पारित प्रस्ताव (1325) सर्वसम्बन्धित पक्षों से यह अपेक्षा करता है कि वे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा संचालित शांति और सुरक्षा अभियानों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करेंगे और इन गतिविधियों में लैंगिक पहलू का ध्यान रखेंगे। अनेकानेक बार यह सुझाव दिया गया है कि शांति सेनाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लिए समयबद्ध ठोस लक्ष्य रखे जाएं तथा शांति सेनाओं को युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में नारी अधिकारों के लिए कार्य करने वाले गैर सरकारी संगठनों के साथ समन्वय स्थापित करने के स्पष्ट निर्देश दिए जाएं और इसके लिए एक स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की जाए। यह भी सुझाव दिया जाता रहा है कि शांति सैनिकों द्वारा नारियों पर किए जाने वाले अत्याचारों की जिम्मेदारी तय करने और दोषियों को दंडित करने को प्राथमिकता दी जाए। किंतु इन सुझावों के क्रियान्वयन में पुरुषवादी दृष्टिकोण बाधा बन रहा है।

महिलाएं युद्ध अत्याचारों की सर्वाधिक शिकार होती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ से संबंधित विभिन्न संस्थाएं अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर युद्ध प्रभावित देशों में महिलाओं की दयनीय स्थिति को रेखांकित करती रही हैं। युद्ध प्रभावित देशों में लाखों महिलाएं यौन हिंसा और बलात्कार का शिकार होती हैं। मूलभूत चिकित्सा सुविधाएं न मिलने के कारण इनकी मृत्यु तक हो जाती है। रेड क्रॉस की एक रिपोर्ट के अनुसार गर्भावस्था या शिशु जन्म के दौरान असमय मृत्यु को प्राप्त होने वाली महिलाओं में सर्वाधिक संख्या उन दस देशों की महिलाओं की होती है जहां युद्ध जारी है या हाल ही में समाप्त हुआ है। इन देशों में अफगानिस्तान, कांगो, सोमालिया आदि प्रमुख हैं।

आदिकाल से ही पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था में महिलाओं को एक अजीवित वस्तु की भांति समझा जाता रहा है। युद्ध विजेता अपने सैनिकों के मनोरंजन हेतु या फिर उन्हें पुरस्कृत करने के लिए उनको नारी शरीर का पाशविक उपभोग करने के लिए प्रेरित करते रहे हैं। समय बदला है लेकिन शायद पुरुष की मानसिकता नहीं बदली है।

युद्ध के दौरान यौन हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं को आज भी सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। जब इराक की यजीदी कार्यकर्ता और स्वयं बलात्कार का शिकार रही नादिया मुराद और कांगो के डॉक्टर डेनिस मुकवेगे को नोबल शांति पुरस्कार दिया गया तब इस अवसर पर उनका भाषण युद्ध क्षेत्र में फंसी महिलाओं और बच्चों की समस्याओं के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की उदासीनता पर ही केंद्रित था। उन्होंने कहा, ‘अपने जीवन के अहम दौर से गुजर रही किशोरियों को बेचा गया, खरीदा गया, बंधक बनाकर रखा गया और रोजाना उनके साथ बलात्कार किया गया। यह कल्पनातीत है कि इन सब के बावजूद 195 देशों के नेताओं का जमीर नहीं जगा कि वह इन्हें मुक्त कराने के लिए कार्य करें।' मुराद ने कहा, ‘अगर यह लड़कियां कोई व्यापारिक समझौता होतीं, तेल वाली भूमि होतीं या विध्वंसक हथियारों से भरा हुआ जहाज होतीं तो निश्चित रूप से इन्हें मुक्त कराने का हर प्रयास कर लिया गया होता।‘

किंतु महिलाओं की युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में भूमिका को - सर्वाधिक पीड़ित एवं प्रभावित समुदाय की दयनीय स्थिति - तक सीमित कर देना उनकी रचनात्मकता, सृजनशीलता और सकारात्मकता की अनदेखी करना है। रेड क्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति की डिप्टी डायरेक्टर ऑपरेशन्स मैरी वेरण्टज़ के अनुसार महिलाएं परिवर्तन की प्रतिनिधि हैं। वे युद्ध ग्रस्त क्षेत्रों में शांति और स्थिरता की स्थापना की मुख्य कारक हैं। वे युद्धकाल में न केवल अपने परिवारों को अपितु युद्ध प्रभावित समुदायों को भी एक सूत्र में बांधे रखती हैं। युद्ध महिलाओं की असीमित क्षमताओं को उजागर करने का जरिया भी बनता है। युद्ध में परिवार प्रमुख की मृत्यु के बाद महिलाएं घर की चहारदीवारी से बाहर निकल कर आजीविका अर्जन की जद्दोजहद में लगी नजर आती हैं। हम उन्हें खेतों और कारखानों में कठोर श्रम कर अपने परिवार के भरण पोषण और शिक्षा आदि की जिम्मेदारी निभाते देखते हैं। 

शांति सेनाओं में कार्यरत महिलाओं के प्रदर्शन का आकलन यह बताता है कि महिला शांति सैनिक स्थानीय लोगों से जल्दी घुल मिल जाती हैं। स्थानीय महिलाओं को सशक्त बनाने और स्थानीय समाज के इन महिलाओं के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण को बदलने में महिला शांति सैनिकों की भूमिका प्रशंसनीय रही है। इसके बावजूद अभी भी विश्व के 15 से अधिक देशों में कार्यरत शांति सेनाओं और इनके द्वारा संचालित शांति प्रक्रिया में महिलाओं का प्रतिनिधित्व चिंताजनक तथा असंतोषजनक रूप से कम है। शांति सैनिकों के रूप में इराक और अफगानिस्तान जैसे देशों में कार्यरत अमेरिकी महिला सैनिकों को स्थानीय निवासी पुरुष सैनिकों जैसा विश्वसनीय मानते हैं। 

3 दिसंबर, 2015 को अमेरिकन डिफेंस सेक्रेटरी एश्टन कार्टर ने यह घोषणा की कि 1 जनवरी, 2016 से अमेरिकी सेना में महिलाओं को हर प्रकार की युद्धक गतिविधियों का भाग बनाया जाएगा। किंतु यूनिवर्सिटी ऑफ कैनसास का एक हालिया अध्ययन यह बताता है कि साथी अमेरिकी सैनिक और उच्च सैन्य अधिकारी आश्चर्यजनक रूप से अभी भी महिलाओं को कमतर आंकते हैं। विकसित कहे जाने वाले पाश्चात्य समाज में भी सेनाओं में महिलाओं की आक्रामक और युद्धक भूमिका को लेकर संदेह व्याप्त रहा है। लगभग दो दशकों से महिलाएं कनाडा की सेना में हर तरह का रोल निभाती रही हैं, वे इन्फैंट्री का हिस्सा रही हैं और उनका प्रदर्शन शानदार रहा है। प्रथम विश्व युद्ध में 6000 रूसी महिलाएं बटालियन ऑफ डेथ का हिस्सा रहीं थीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 8 लाख महिलाएं सोवियत सशस्त्र सेना का भाग रहीं, फिर भी यह पुरुषवादी सोच बदलने का नाम नहीं लेती जिसके अनुसार महिलाओं में मारक क्षमता, आक्रामकता और हिंसक प्रवृत्ति का अभाव होता है। नाटो देशों में अभी भी ब्रिटेन, टर्की और स्लोवाकिया जैसे देश सेना में महिलाओं को सीमित उत्तरदायित्व देने के पक्षधर रहे हैं।

जहां तक भारत का प्रश्न है हमारा अतीतजीवी समाज उन वीरांगनाओं की गौरव गाथाओं के गायन में कोई कोताही नहीं बरतता है जिनके शौर्य के सम्मुख हम सब नतमस्तक हैं। रानी लक्ष्मीबाई, चित्तूर की रानी चेनम्मा, चांद बीवी, गोंड रानी दुर्गावती, झलकारी बाई, उदादेवी पासी जैसी वीरांगनाओं की वीरगाथाओं के गायन में हम सब एक स्वर हैं। किंतु हमारे आधुनिक समाज का दकियानूसी और पितृसत्तात्मक चेहरा भी जगजाहिर है। कुछ माह पहले सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने यह कहा कि महिलाओं को कॉम्बैट रोल्स नहीं दिए जा सकते क्योंकि उन पर बच्चों के लालन पालन का उत्तरदायित्व होता है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर जवान ग्रामीण इलाकों से आते हैं और एक महिला सैन्य अधिकारी का नेतृत्व स्वीकार करना उनके लिए कठिन होगा। उन्होंने कहा कि महिला सैनिकों के लिए कपड़े बदलना भी एक कठिन कार्य होगा और वे अपने पुरुष सहयोगियों पर ताक झांक का आरोप लगा सकती हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान मातृत्व अवकाश न देने पर विवाद खड़ा हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय समाज अभी शहीद वीरांगनाओं के ताबूत देखने हेतु तैयार नहीं है। पता नहीं जनरल विपिन रावत समाज और सेना में व्याप्त धारणाओं को अभिव्यक्ति दे रहे थे अथवा वह उनका निजी मत था। सेना में महिलाओं की भूमिका के संबंध में इस प्रकार की राय नई नहीं है। ब्रिटिश सेना की वरिष्ठतम महिला अधिकारी रही निक्की मोफ्फाट ने इस तरह के विचारों को- सेक्सिजम ड्रेस्ड अप एज कंसर्न- की संज्ञा दी थी। भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना में महिलाएं केवल अधिकारी के रूप में कार्य कर सकती हैं। वायु सेना की प्रत्येक शाखा में महिला अफसरों की नियुक्ति होती है और वे युद्धक विमान भी उड़ा सकती हैं। थल सेना और नौसेना में महिलाएं शार्ट सर्विस कमीशन के जरिए नियुक्त होती हैं और युद्धक भूमिकाओं के अतिरिक्त अन्य भूमिकाओं में देखी जाती हैं। इनकी सेवा अवधि में वृद्धि का प्रस्ताव सरकार के सम्मुख विचाराधीन है।

आज जब कश्मीर में आतंकवाद को लेकर भारत और पाकिस्तान के मध्य तनाव चरम पर है और युद्ध की आशंका से प्रत्येक शान्तिकामी चिंतित है तब कश्मीरी महिलाओं के हितों, उनकी समस्याओं और उन पर हो रहे अत्याचारों की भी चर्चा होनी चाहिए। कश्मीर में अशांति और रक्त संघर्ष का लंबा दौर चला है। ह्यूमन राइट्स वॉच एवं एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संगठनों ने सुरक्षा बलों और आतंकवादियों द्वारा महिलाओं पर किए जा रहे अत्याचारों का डॉक्यूमेंटेशन किया है। चाहे वह सुरक्षा बल हों या आतंकवादी, पारस्परिक हिंसक संघर्ष में बलात्कार और नारियों पर अत्याचार एक सुविचारित रणनीति का हिस्सा रहे हैं। कश्मीर समस्या के समाधान के हर प्रयत्न में जब तक नारियों की भागीदारी नहीं होगी - चाहे वे सैन्य प्रयास हों या सामाजिक राजनीतिक प्रयास- तब तक शायद हिंसा का यह कुचक्र जारी रहेगा। कश्मीर की महिलाओं के सम्मान की रक्षा की जानी चाहिए और उनकी रचनात्मक सोच का कश्मीर के नव सृजन में उपयोग किया जाना चाहिए। कश्मीर में हिंसा की जड़ों को परिवार और समाज से उखाड़ फेंकने में महिलाओं की अहम भूमिका रह सकती है।

(डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र विश्लेषक हैं और छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)

 








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