आज देश को मध्ययुगीन विचार से नहीं हांका जा सकता : रामशरण जोशी

विशेष साक्षात्कार , नई दिल्ली, सोमवार , 18-09-2017


interview-ramsharan-joshi

प्रदीप सिंह

वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी स्वभाव से यायावर और विचार से वामपंथी हैं। पांच दशक से पत्रकारिता में सक्रिय जोशी भारतीय पत्रकारिता के उतार-चढ़ाव के साथ ही देश में चलने वाले आंदोलनों एवं जन संघर्षों के भी साक्षी रहे हैं। ऐसे में जब आज राजनीति का चरित्र बदल गया है, राज्य अपने कल्याणकारी भूमिका को निभा पाने में विफल साबित हुआ है। पत्रकारिता के साथ ही जन आंदोलनों पर काली पूंजी का साया मंडरा रहा है, उनके मयूर विहार स्थित आवास पर मिलकर राजनीति, पत्रकारिता और जन आंदोलनों के भविष्य के साथ ही उनके घर-परिवार के बारे में चर्चा की। रामशरण जोशी से प्रदीप सिंह की विशेष बातचीत :-  

फोटो : प्रदीप सिंह

प्रश्न- आप अपने घर-परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बतायें?

रामशरण जोशी : मैं मूलतः राजस्थान का रहने वाला हूं। जन्म अलवर जिले में 30 अक्टूबर, 1943 को हुआ था। ये मेरी असली जन्म तिथि है। लेकिन सरकारी दस्तावेजों में 6 मार्च, 1944 दर्ज है, क्योंकि पिता जी ने चार महीने कम करके मेरी जन्म तिथि लिखा दी। तब से यही जन्म तिथि चल रही है। मेरा गांव अलवर के बसवा तहसील में पड़ता था। अब यह तहसील दौसा जिले में आ गई है। बसवा अलवर से 60 किमी दूर है। मेरी शुरुआती पढ़ाई गांव में ही हुई। 

प्रश्न- आपके पिता जी क्या करते थे और परिवार में कौन-कौन है?  

रामशरण जोशी : पिता जी रेलवे में थे और उस समय उनकी पोस्टिंग जयपुर में थी। मेरी दो मां थीं। बड़ी मां से दो बहनें थी। जो हमसे उम्र में बहुत बड़ी थीं। छोटी मां से हम दो भाई थे। गांव में संयुक्त परिवार था। चाचा-ताऊ थे। प्राथमिक शिक्षा के बाद मैं पिताजी के साथ जयपुर आ गया। हाई स्कूल तक की पढ़ाई जयपुर में करने के बाद 1960 में मुंबई चला चला। मेरी शादी नवंबर 1978 में आर्य समाजी रीति रिवाज से संपन्न हुई। शादी में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, हंसराज रहबर, विष्णु नागर और पंकज बिष्ट जैसे लोग शामिल हुए। बड़ी बेटी डॉ. मनस्विता जोशी बोस्टन विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रही है। छोटी बेटी त्रीना जोशी कनाडा में है। पुत्र अमन जोशी एएनआई न्यूज में पत्रकारिता कर रहा है। 

फिल्मों के शौक में मुंबई भागे

प्रश्न- पढ़ाई छोड़ कर मुंबई जाने का क्या कारण था?

रामशरण जोशी : बचपन से ही मेरा फिल्मों में जाने का शौक था। अपने शौक को पूरा करने के लिए एक दोस्त के साथ मुंबई निकल गया। लेकिन मुंबई में बहुत सफलता नहीं मिली। चूंकि पढ़ाई बीच में ही छोड़कर घर से चल पड़ा था इसलिए 1962 में दिल्ली आ गया। स्कूल के दिनों से ही मैं नाटक और कहानी लिखता था। मेरे कई नाटक आकाशवाणी जयपुर और दिल्ली से प्रसारित हो चुके थे। फिर ‘‘बहादुर शाह जफर’’ नामक बड़ा नाटक लिखने की योजना बनाई। इसी नाटक की तैयारी के क्रम में दिल्ली आया था। तब से देखा जाये तो निवासी तो दिल्ली का हूं। लेकिन यायावर, सब कुछ बिखरा हुआ। 

प्रश्न- हाईस्कूल के बाद फिर पढ़ने के बारे में कब और कैसे सोचा?

रामशरण जोशी : हमने दिल्ली में रहते हुए अपनी पढ़ाई भी पूरी की। लेकिन फिर नियमित पढ़ाई का क्रम टूट गया। इंटर करने के बाद अनियमित ढंग से पंजाब विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया। फिर 1970 में महानंद मिशन महाविद्यालय गाजियाबाद से अंग्रेजी साहित्य में एमए. पूरा किया। पंकज बिष्ट और इब्बार रब्बी मेरे सहपाठी थे। 

फिल्म, नाटक से पत्रकारिता का सफ़र

प्रश्न- फिल्मों का शौक, नाटक और कहानी के बाद आप पत्रकारिता में कैसे आए

रामशरण जोशी : यायावरी करते हुए मैं 1964 में कोलकाता पहुंचा। उस समय हिंदुस्थान समाचार एजेंसी में नियुक्ति हो रही थी। चूंकि मैं ग्रेजुएट नहीं था। इसलिए हिंदुस्थान समाचार के मैनेजमेंट ने मुझे स्थायी संवाददाता न बना कर खबरों की टाइपिंग और डिजाइन का काम दिया। यह प्रशिक्षण काल था। बीच-बीच में रिपोर्टिंग के लिए भी भेजा जाता था। जब पंजाब विश्वविद्यालय से मेरा ग्रेजुएशन पूरा हो गया तो स्थायी संवाददाता के रूप में मेरी नियुक्ति हुई। 1967 में भोपाल ट्रांसफर हो गया। एक साल बाद ही भोपाल से लखनऊ भेज दिया गया। लखनऊ में काम कर रहा था। पत्रकारिता में मन लग गया। लेकिन इसी बीच 1969 में संसदीय संवाददाता बनाकर दिल्ली ट्रांसफर कर दिया गया। उस समय दिल्ली में विधानसभा नहीं महानगर काउंसिल होती थी। 

दिल्ली आने के बाद मेरे जीवन में एक भूचाल आया। यहां आने पर मुझे पता चला कि हिंदुस्थान समाचार में काम करने वालों पत्रकारों एवं दूसरे कर्मचारियों को पीएफ और साप्ताहिक अवकाश भी नहीं मिलता है। पूरे संस्थान में संघ एवं संघ से जुड़े लोगों का दबदबा था। चूंकि मैं संघी नहीं था। मैंने पत्रकार-कर्मचारी यूनियन बनाई। यूनियन के अध्यक्ष समाजवादी नेता एसएम जोशी थे। साप्ताहिक अवकाश, मेडिकल और पीएफ आदि की मांग को लेकर हिंदुस्थान समाचार के कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया। उस समय मंडी हाउस में हिंदुस्थान समाचार का कार्यालय था। विरोध प्रदर्शन की खबरें रोज अखबारों में प्रकाशित होने लगीं। 

मुंबई से प्रकाशित होने वाले ब्लिट्ज ने मेरे ऊपर डेढ़ पृष्ठ लिखा। वह लेख अंग्रेजी ब्लिट्ज के साथ ही हिंदी, उर्दू और मराठी ब्लिट्ज में भी छपा। पूरे देश में चर्चा हुई। प्रबंधन ने मेरा ट्रांसफर नागपुर कर दिया। इसके बाद दोस्तों के सलाह पर हमने नागपुर जाने से मना कर दिया। इस घटना से मेरे जीवन की दिशा बदल गयी। 

वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी। फोटो : प्रदीप सिंह

प्रश्न- नौकरी छोड़ने के बाद आपकी क्या व्यस्तता थी?

रामशरण जोशी : नौकरी छोड़ने के बाद मैं फ्रीलांसिंग करने लगा। एक बार फिर से यायावरी की दुनिया में लौट गया। दिनमान पत्रिका से फ्रीलांसिग शुरू की। उस समय रघुवीर सहाय संपादक थे। उन्होंने मुझे बहुत मौका दिया। 1970 में बिहार में भू हथियाओ आंदोलन शुरू हुआ। समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर, साम्यवादी जेडए अहमद आदि उस आंदोलन से जुड़े थे। एक पत्रकार के रूप में मैं पूर्णिया, भागलपुर, फारबिसगंज गया। दिनमान के लिए खबर लिखी। राजस्थान के बाड़मेर और जैसलमेर के अकाल को कवर किया। 1970 में कांग्रेस का विभाजन हो गया। 1971 के मध्यावधि चुनाव को कवर किया। सब कुछ फ्रीलांसिंग ही चल रहा था। देश के अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं के लिए खूब लिख रहा था। दिनमान ने उसी समय मुझे बस्तर भेजा। बस्तर भेजने का मकसद आदिवासियों का चुनाव के प्रति कैसा रूझान रहता है, इसका अध्ययन करके खबर बनानी थी। मैं बस्तर, जगदलपुर, दंतेवाड़ा, सुकमा गया। दिनमान, साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग आदि के लिए रिपोर्टिंग की। 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय समाचार भारती ने मुझे युद्ध संवाददाता बनाकर अगरतला भेजा। 1972 में ढाका गया। लगभग नौ महीने मैंने यु़द्ध संवाददाता के रूप में काम किया। 

इसके बाद मैं दिल्ली वापस आया और पूर्णकालिक वामपंथी कार्यकर्ता बन गया। 1972 में कुछ मित्रों के साथ मिलकर ‘‘ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी यूथ फेडरेशन’’ का गठन किया। यह संगठन अति वामपंथी विचार का था। एक तरह से कह सकते हैं कि यह संगठन नक्सलियों का मुखौटा संगठन था। आपातकाल में संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लेकिन मैं जेल जाने से बच गया। डॉ. ब्रह्म दत्त शर्मा (बीडी शर्मा) आईएएस थे। उन्होंने मेरी गिरफ्तारी को रुकवा दिया। बाद में नक्सलवादियों से मतभेद होने के बाद मैं सीपीआई (एम) का सदस्य बना। दिल्ली में लाल झंडा यूनियन का राजनीतिक सचिव बनाया गया। 

"मैं किताब पढ़कर मार्क्सवादी नहीं बना"

प्रश्न- वामपंथ की तरफ आपका झुकाव कैसे हुआ। आपके लेखन और चिंतन में वामपंथ और प्रगतिशीलता की साफ झलक मिलती है। यह आपके व्यक्तित्व में कैसे आया?

रामशरण जोशी : जीवन के यथार्थ और समय-समाज के सच से टकराते हुए मैं वामपंथी बना हूं। मैं किताब पढ़कर मार्क्सवादी नहीं बना हूं। समय एवं परिस्थितियों के साथ संघर्ष करते हुए हमने मार्क्सवाद को सीखा और जाना। युद्ध संवाददाता के रूप में गुरिल्ला युद्ध आदि को नजदीक से देखने का मौका मिला। परिस्थितियों ने मेरे मस्तिष्क को प्रभावित किया और मैं मार्क्सवाद की तरफ झुकता चला गया। मैं आज भी यह दावा नहीं कर सकता कि मैंने मार्क्सवाद को पूरा पढ़़ लिया है।

मैं मार्क्सवाद को यांत्रिक ढंग से नहीं देखता हूं। भारत के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में मार्क्सवाद को कैसे प्रासंगिक बनाया जा सके, इस पर सोचता हूं। किसी भी विचार को न मैं अंतिम मानता हूं और न ही यांत्रिक तरीके से देखता हूं। 

प्रश्न- आपने अंग्रेजी साहित्य में एमए किया है। आप उस समय चाहते तो कोई और बड़ी नौकरी कर सकते थे। क्या आपने पत्रकारिता के अलावा दूसरे विकल्पों पर ध्यान नहीं दिया। 

रामशरण जोशी : मैं जिस समय दिल्ली आया या ये कहें कि जिस समय मैं जवान हुआ उस समय नक्सल आंदोलन उरूज (ऊंचाई) पर था। उस समय के अधिकांश युवाओं की तरह मेरी आंखों में भी भारत को बदलने और समाजवादी व्यवस्था बनाने का विराट सपना पल रहा था। उस दौर में युवा आईएएस, साइंटिस्ट, प्रोफेसर और ढेर सारी अच्छी नौकरियों को छोड़कर नक्सल आंदोलन में शामिल हो रहे थे। करियर बनाने की कोई इच्छा नहीं थी। चूंकि पत्रकारिता ऐसा प्रोफेशन है जिसमें आप आम आदमी से लेकर प्रधानमंत्री तक की खबर ले और दे सकते हैं। ऐसे में हमने पत्रकारिता को चुना। 

प्रश्न- नई दुनिया में आपको राजेंद्र माथुर ने नियुक्ति दी और कहा जाता है कि आपका वेतन अपने वेतन से ज्यादा तय कर दिया। इस पर प्रबंधन में बवाल हुआ। सच्चाई क्या है?

रामशरण जोशी : जनवरी, 1980 में मैं नई दुनिया का दिल्ली ब्यूरो चीफ बना। मेरा टोटल पैकेज माथुर जी से ज्यादा था। अब मेरी नियुक्ति तो माथुर साहब ने ही की थी, जब मैनेजमेंट उनके पास गया तो उन्होंने हंसते हुआ कहा कि, ‘‘मैंने जोशीजी का बुर्जुआकरण कर दिया। वे यायावरी कर रहे थे, जंगलों की खाक छान रहे थे, अब सुख-सुविधाओं के चक्कर में फिर जंगल का रुख नहीं करेंगे।’’ मुझे जंगपुरा में फ्लैट दिलवाया गया। यह सब छजलानी, तिवारी और सेठिया परिवार के बदौलत हुआ। नई दुनिया में मैं अप्रैल 1999 तक रहा। 

वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी। फोटो : प्रदीप सिंह

"आज की पत्रकारिता में मुनाफा प्रमुख"

प्रश्न- उस दौर के पत्रकारिता और आज के पत्रकारिता में क्या अंतर देखते हैं?

रामशरण जोशी : उस दौर की पत्रकारिता से आज के पत्रकारिता की तुलना करना व्यर्थ है। हम भारतीय पत्रकारिता को तीन भागों में बांट कर देखते हैं। पहला- मिशन पत्रकारिता का दौर, दूसरा- पेशेवर पत्रकारिता का दौर और तीसरा जो आज चल रहा है वह व्यावसायिक पत्रकारिता है। तो चाहे हिंदी की पत्रकारिता हो या अंग्रेजी की सब पैसा कमाने में लगे हैं। मिशन, प्रोफेशन सब भूल गए हैं। आज की पत्रकारिता में मुनाफा प्रमुख हो गया है। आज व्यावसायिक नैतिकता, प्रतिबद्धता, संवेदनशीलता और संपादक संस्था सब हाशिये पर हैं या सुप्तावस्था में हैं। इसके विपरीत प्रोफेशनल काल में पेशे की नैतिकता, चेतना, प्रतिबद्धता, उत्तरदायित्व केंद्र में रहा करते थे।

दूसरी बात तब की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में सबसे बड़ा अंतर तकनीक और पूंजी का आया है। आज के मीडिया में तकनीक हावी है। तब की पत्रकारिता की पृष्ठभूमि में छोटी-महाजनी पूंजी और आरंभिक औद्योगिक काल की तकनीक थी। आज कॉरपोरेट पूंजी और उन्नत तकनीकी है।

प्रश्न- आज के दौर में निष्पक्ष पत्रकारिता और प्रगतिशील राजनीति के लिए कितनी जगह बची है?

रामशरण जोशी : पत्रकारिता का काम समाज को सही खबर देना है। खबर के साथ ही सही मुद्दों पर जनता को सही विचार देना और जनमत का निर्माण करना भी पत्रकारिता के माध्यम से होता रहा है। निष्पक्ष और जनवादी पत्रकारिता के साथ ही प्रगतिशील राजनीति के लिए बहुत जगह है। ये कहना कि अब सही राजनीति और सही पत्रकारिता के लिए कोई जगह नहीं है, मैं इससे सहमत नहीं हूं। जब तक समाज में विषमता रहेगी तब तक वामपंथ, जनवाद और प्रगतिशील मूल्यों की प्रासंगिकता रहेगी। ये बात सही है कि अब स्पेस थोड़ा सिकुड़ रहा है। लेकिन इसके साथ ही नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। गौरी लंकेश की हत्या के बाद जिस तरह से पूरे देश में प्रतिरोध का स्वर उभरा। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुए। उसे देख कर कहा जा सकता है कि प्रतिरोध का स्वर कमजोर नहीं पड़ा है। 

प्रश्न- पत्रकारिता और राजनीति के बीच कैसा संबंध होना चाहिए?

रामशरण जोशी : पत्रकारिता और राजनीति के बीच एक सम्मानजनक संबंध होना चाहिए। दोनों के बीच लंगोटिया यारी नहीं होनी चाहिए। राजेंद्र माथुर को मैं एक आदर्श संपादक मानता हूं। जिन्होंने नई दुनिया और नवभारत टाइम्स में संपादक रहते हुए राजनीति और राजनेताओं से सम्मानजनक दूरी बनाए रखी।

प्रश्न- पत्रकारिता के क्षेत्र में आपका अनुभव क्या रहा?

रामशरण जोशी : पत्रकारिता आज भी करियर के लिहाज से बहुत अच्छा क्षेत्र है। दूसरे क्षेत्रों के अपेक्षा यहां आज भी बहुत स्वतंत्रता है। अपनी पत्रकारिता के दौरान मैं पांच-पांच प्रधानमंत्रियों और एक राष्ट्रपति के साथ विदेश गया। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, जापान और कई देशों में खबर के सिलसिले में भेजा गया। बांग्लादेश और नामीबिया जैसे दो देशों को अपनी आंखों के सामने बनते हुए देखा। पत्रकारिता में आने पर मुझे देश और दुनिया देखने-समझने का मौका मिला। 2007 में विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ के सभागार में बोलने का मौका मिला। एक व्यक्ति जो गांव से निकला और विदेश तक पहुंचा। 

प्रश्न- आज के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश को किस तरह देखते हैं?

रामशरण जोशी : आज के परिवेश की प्रतीक चीज कमोडिटी बन चुकी है। आज राज्यसत्ता, कॉरपोरेट सेक्टर, नौकरशाह और टेक्नोक्रेट चारों के महागठबंधन को मूलतः दक्षिणपंथी राजनीति संचालित कर रही है। देश की राजनीति में पैराडाइंग शिफ्ट आ चुका है। जिसकी शुरुआत मैं जुलाई 1991 से मानता हूं। उदारीकरण के बाद भारतीय राष्ट्र राज्य के चरित्र में बहुत बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है। पहले राज्य कल्याणकारी हुआ करता था। अब का राज्य अपने को केवल फेसिलिटेटर या दूसरे शब्दों में कहें तो प्रबंधक या दल्ला का रोल अदा कर रहा है। खुले शब्दों में कहूं तो आज का राज्य सबको मंच मुहैया करा रहा है। जिसमें एक भूखा किसान, अंबानी, अडानी और दूसरे समूह एक साथ कुश्ती के लिए तैयार रहते हैं। अब आप समझ सकते हैं कि इस कुश्ती में कौन जीतेगा?

राज्य ने अपनी मूलभूत जिम्मेदारियों को तिलांजलि दे दी है। यही कारण है कि शिक्षा, स्वास्थ्य को महंगा करके दूसरे सामाजिक क्षेत्रों का बजट कम किया जा रहा है।

"मोदी एक विभक्त व्यक्तित्व"

प्रश्न- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिन लाने का वादा किया था। अब लोग उनसे पुराने दिन ही लौटाने की मांग करने लगे हैं। भाजपा शासन और मोदी को आप कैसे देखते हैं

रामशरण जोशी : नरेंद्र मोदी एक विभक्त व्यक्तित्व हैं। उनकी राजनीतिक मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। जिसकी सांसें मध्ययुग में बसती हैं। नरेंद्र मोदी आधुनिक राज्य के शासक हैं। ये बात जान लीजिए अब मध्ययुगीन विचारधाराओं के बल पर आधुनिक राज्य को हांका नहीं जा सकता है। मोदी कॉरपोरेट पूंजी और मीडिया की बैसाखी पर चल रहे हैं। जाहिर है उनके हितों की रक्षा करना उनका परम कर्तव्य और धर्म बन गया है। संघ मूलतः स्वदेशी अर्थव्यवस्था में विश्वास करता है और भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है। इसके विपरीत मोदी विदेशी पूंजी को भी खुला न्योता दे रहे हैं। जिसकी ताजा मिसाल जापानी पूंजी की मदद से चलने वाली बुलेट ट्रेन परियोजना है।

एक बात याद रखिए इस दौर में 1935 का हिटलर-मुसोलिनी मार्का फासीवाद-नाजीवाद नहीं चल सकेगा। अमेरिका में ट्रंप का विरोध शुरू हो गया है। क्योंकि चरम राष्ट्रवाद जहां शुरू में कॉरपोरेट हितैषी लगता है वहीं कालांतर में उसमें तीव्र अंतरविरोध पैदा होता है। पूंजीवाद का विस्तार सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक गतिशीलता में निहित है। पिछड़े विचार पूंजी के विकास को भी अवरुद्ध करते हैं। आज अंबानी, बिड़ला, टाटा जैसे एकाधिकारवादी पूंजीपति कभी नहीं चाहेंगे कि समाज में आदिम और मध्ययुगीन शक्तियां हावी हों।

अब ट्रंप की नीतियों का विरोध वहां के बड़े पूंजीपति कर रहे हैं। मजहबी राष्ट्रों में विकास की गति धीमी होती है। इस्लामी दुनिया में औद्योगीकरण की गति मंथर है। ईरान, सीरिया, मिस्र और अफगानिस्तान जैसे देश लगातार हिंसा की चपेट में हैं। और वे इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि धर्म राष्ट्र का निर्माण नहीं करता है। यदि ऐसा होता तो बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग नहीं होता। पश्चिम एशिया के सारे मुस्लिम देश एक राष्ट्र होते। धर्म राष्ट्र के लिए एक तथ्य है लेकिन निर्णायक कारण नहीं है।










Leave your comment