व्यवस्था के सिर चढ़कर बोलने लगा था जंतर-मंतर

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 07-10-2017


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वीना

‘‘अरे भई, कोई गरम पानी लाओ, शहद डाल कर।’’ गद्देदार सोफे पर पसरते हुए नेता जी ने फरमाया। 

‘‘नेताजी आप आराम कीजिये, हम बाद में आते हैं।’’ होंठो-होंठो में बात करने के आदी सभ्य जंतर-मंतर रोड के बंगले के निवासी ने आवाज़ निकालने की कोशिश करते हुए कहा।

‘‘अरे बैठिये। ये तो हमारा रोज़ का काम है, गला-फाड़-फाड़ चिल्लाना पड़ता है भई, देश की जनता को जगाने के लिए।’’  

‘‘क्या चिल्लाते हैं सर आप! चिल्लाना तो कोई आपसे सीखे। कितना मधुर चिल्लाते हैं!! देश की जनता ऐसी कभी न जागी थी जैसी आपने जगाई है! ’’संरक्षक साहब ने बटरिंग की। 

संरक्षक महोदय!

जी हुजूर, फरमाएं!

‘‘इस जनता का प्रोबलम ही ये है। हम जितना फेंकते हैं सब लपक लेती है! भई कुछ छोड़ भी देना चाहिये। माना फेंकते वक़्त हम धर्मराज युधिष्ठिर के बड़े भाई लगते हैं। पर... फिर भी...कुछ तो दिमाग़ से काम लेना चाहिये कि नहीं?’’ खुद पर इतराते हुए नेताजी मुस्कराए।

‘‘जी हुजूर, एक दम सही!’’ जज साहब ने थूक निगलते हुए हां में हां मिलाई।

तो संरक्षक महोदय साहब, ये जो जनता है ना हमारी, ज़रूरत से ज़्यादा जाग गई है। आपको इसे थोड़ा सुलाना होगा।

वो कैसे नेता जी?

‘‘भई जंतर-मंतर निवासी, जरा करीब आईये।’’ दूर कुर्सी में धंसे निवासी से मुखातिब होकर नेता जी बोले। ‘‘संरक्षक साहब इनकी मदद करो यार। ये जो जंतर-मंतर पर रोज़ शोर-शराबा होता है। आपको परेशानी नहीं होती इससे?’’

‘‘होती है सर बहुत होती है! बदबूदार पसीने से तर-बतर गंदे-गंदे लोग, साल-साल भर डेरा डाले हुए पड़े रहते हैं यहां। हमारा बहुत सारा महंगा सेंट खर्च होता है, इस बदबू को भगाने के लिए।’’ 

‘‘सचमुच बहुत बड़ी समस्या है।’’  नेताजी गंभीर होते हुए बोले। ‘‘जज साहब, क्या कर रहे हैं आप? बेचारे जंतर-मंतर निवासी सेंट खरीद-खरीद कर बर्बाद हो रहे हैं और आप चुपचाप देख रहे हैं? आप लोग भी ना फ्री में प्रमोशन चाहते हैं।’’

‘‘जी...जी मैं कुछ करता हूं।’’ हड़बड़ाते हुए जज साहब ने पसीना पोंछा।

और लाउड स्पीकरों का ध्वनि प्रदूषण भी जंतर-मंतर निवासियों के कान के लिए ठीक नहीं। क्यों निवासी साहब?

जी सर। वैसे घर पर तो आवाज़ नहीं आती। पर जब मैं गाड़ी से इनके पास से निकलता हूं तो थोड़ी बहुत आती है।

आती है ना? मान लीजिये किसी दिन आपकी गाड़ी खराब हो जाए उधर से निकलते हुए। एसी बंद हो जाए, और आपको दरवाजा खोलकर बाहर खड़ा होना पड़े तब? आपके प्राण न निकल जाएंगे, इतने सारे गरीब लोगों के जिस्मों की बदबू से? 

आड़ा तिरछा कालम।

हां नेता जी! ये तो मैंने सोचा ही नहीं। अब क्या करें?

करना क्या है। संरक्षक साहब को दरख्वास्त दीजिये। प्रदर्शनकारियों की चीखम-चिल्ली, बिन सेंट का सड़ा पसीना प्रदूषण आपसे बर्दाश्त नहीं हो रहा। शांति से रहना और बेवजह अपना कीमती सेंट बरबाद न करना आपका हक़ है। इसकी रक्षा की जाए। अपने संरक्षक साहब सब ठीक कर देंगे। क्यों संरक्षक साहब?

‘‘जी...जी सर...जी सर...’’ संरक्षक साहब टाई ढीली करते हुए हकलाए। 

वैसे एक बात है,  इनके जिस्मों की गरमी और पसीने की बदबू जितना प्रदूषण करते हैं उससे कहीं ज़्यादा तो हम सब के पेट की गैस से दिल्ली का दम फूलता होगा ही...ही...ही...नेता जी पेट संभालते हुए लोट-पोट होने लगे।

ही...ही...ही...जज साहब शर्माए।

ही...ही...ही... निवासी जी ने नज़रें चुराई।

सर हम तो बीसों साल से इसीलिए चुप थे। ऐसा कौन सा प्रदूषण है जो हमने दिल्ली को नहीं दिया। घर में हर एक के पास एक गाड़ी। हमारे कुत्ते-बिल्लियों तक को एसी चाहिये। पूरी दिल्ली के हिस्से के बिजली-पानी में से आधे से ज़्यादा तो हमारे-आपके बंगलों पर खर्च होता है। और इल्जाम प्रदर्शनकारियों पर। जवाब नहीं आपका!

अरे निवासी बंधू, तंग आ गए हैं हम इनकी चिल्ल-पौं से। जिसे देखो बोरिया-बिस्तर उठाकर चला आ रहा है गलियाने! हमारे अफसरशाह भी कोई काम ठीक से नहीं करते। बोट क्लब में ये नारेबाज़ लाखों की संख्या में आकर धमकाते थे। हालांकि जंतर-मंतर पर खदेड़ने से इनकी संख्या सैकड़ों में समेट दी गई। पर ये सैकड़ों भी नाक में दम किए रहते हैं। अच्छा होता इन्हें पहले ही कहीं दूर जंगलों की तरफ हांक दिया जाता। एक ही बार में झंझट खतम होता। जितना जी चाहे नाचते-गाते वहां। 

हास्य व्यंग्य।

‘‘आप इत्मिनान रखें नेता जी,  हम सब ठीक कर देंगे।’’ संरक्षक साहब ने गर्दन सीधी की इस बार।

जज साहब इतनी दूर फेंकियेगा कि हमारी आंखों-कानों, रास्तों से न टकराएं। 

किसानों की बर्बाद फसल का हर्जाना दो। बेटियों के बलात्कार पर ख़ामोश हुक्मरान शर्म करो। लेकर रहेंगे आज़ादी। जातिवाद से आज़ादी। मनुवाद से आज़ादी। धर्म के आतंक का नंगा नाच बंद करो। रोटी-कपड़ा-मकान के वादे पूरे करो जैसे गूंजते नारे सत्ता पक्ष का हाजमा खराब कर रहे थे।

इसलिए संरक्षक साहब ने नेताजी की आज्ञा का पालन करते हुए जंतर-मंतर पर वायु, ध्वनि प्रदूषण रहित शांति कायम करने की योजना को अंजाम दे दिया। 

अब बदबूदार लोगों के ये ख़तरनाक नारे हुक्मरानों के कानों में नहीं  पड़ेंगे। साथ ही साथ 10-12 बंगलों में रहने वाले, धनी सभ्य लोगों के इंपोर्टेड सेंट का खर्चा 90 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। नेताजी इस बड़ी बचत का उदाहरण देश की प्रगति के तौर पर भी पेश कर सकते हैं। जिससे चंद रोकड़ों का आर्थिक लाभ तो होगा ही साथ ही साथ विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी। 

(वीना पत्रकार होने के साथ फिल्मकार भी हैं।)










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